लोकतंत्र में आंदोलन सत्ता की हार नहीं, संवाद की कमी का संकेत

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भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति केवल संविधान, संसद या चुनाव नहीं हैं, बल्कि वह विश्वास है जो जनता को यह भरोसा देता है कि उसकी बात सुनी जाएगी। जब यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तब लोकतंत्र की धड़कन संसद से निकलकर सड़कों पर सुनाई देने लगती है। आंदोलन उसी धड़कन का स्वर हैं। वे लोकतंत्र के शत्रु नहीं, बल्कि उसकी चेतना हैं।स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और निर्भया आंदोलन तक भारत का इतिहास गवाह है कि जनआंदोलनों ने समय-समय पर व्यवस्था को आईना दिखाया है। कई बार इन आंदोलनों ने सरकारों को निर्णय बदलने पर विवश किया, तो कई बार लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक जवाबदेह बनाया।

2014 के बाद आंदोलनों का नया दौर

पिछले एक दशक में भारत ने अनेक बड़े जनआंदोलन देखे। किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शन, अग्निपथ योजना के खिलाफ युवाओं का आंदोलन, महिला पहलवानों का धरना, विभिन्न राज्यों में आरक्षण संबंधी आंदोलन, नीट परीक्षा को लेकर छात्रों के प्रदर्शन और जातीय जनगणना की मांग—ये सभी अलग-अलग मुद्दे थे, लेकिन इन सबके केंद्र में एक समान प्रश्न था—क्या सरकार जनता की बात सुन रही है?हर आंदोलन उचित या अनुचित हो सकता है। हर मांग स्वीकार करना संभव नहीं होता, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मानकर, उसे सामाजिक और राजनीतिक संवाद का अवसर समझना है।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/

किसान आंदोलन : केवल कानून नहीं, विश्वास का प्रश्न

तीन कृषि कानूनों के विरोध में चला किसान आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे लंबे आंदोलनों में से एक था। आंदोलन के दौरान अनेक किसान संगठनों ने सैकड़ों किसानों की मृत्यु का दावा किया। सरकार और आंदोलनकारी संगठनों के बीच लंबे समय तक मतभेद बने रहे, अंततः सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की।इस पूरे घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ा—यदि प्रारंभ में ही व्यापक संवाद और भरोसे का वातावरण बनता, तो क्या इतना लंबा संघर्ष टाला जा सकता था?
लोकतंत्र में कानून बनाना सरकार का अधिकार है, लेकिन जनता का विश्वास जीतना उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है।

छात्र आंदोलन : जिनके पास संघर्ष का समय सबसे कम है

किसान अपने खेत, परिवार और ग्रामीण सामाजिक ढांचे के कारण अपेक्षाकृत लंबे समय तक आंदोलन जारी रख सकते हैं। यह आसान नहीं होता, पर उनके पास जीवन-निर्वाह का एक आधार रहता है। छात्रों की स्थिति अलग है। एक प्रतियोगी परीक्षा छूट गई तो पूरा वर्ष समाप्त। आयु सीमा निकल गई तो अवसर समाप्त। नौकरी की भर्ती रुक गई तो भविष्य अनिश्चित। इसलिए छात्र आंदोलन लंबा नहीं चल सकता। उनके पास संघर्ष का समय सीमित होता है।हाल के वर्षों में नीट परीक्षा, भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर छात्रों का आक्रोश सामने आया। अनेक छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ने और आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं ने पूरे समाज को झकझोरा। इन घटनाओं के कारण अलग-अलग रहे, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, समयबद्धता और संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है।

पहलवान आंदोलन : जब सम्मान भी मुद्दा बन जाए

दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश के अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता पहलवान न्याय की मांग लेकर बैठे। यह आंदोलन केवल खेल का नहीं था, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता, शिकायतों की सुनवाई और खिलाड़ियों के सम्मान से जुड़ा प्रश्न बन गया।जब देश के लिए पदक जीतने वाले खिलाड़ी सड़क पर बैठते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि शिकायतों का समाधान संस्थाओं के भीतर हो, न कि सड़कों पर।

आरक्षण और सामाजिक न्याय के आंदोलन

भारत में आरक्षण केवल नीति नहीं, सामाजिक न्याय का प्रश्न है। मराठा, जाट, पटीदार, गुर्जर और अन्य समुदायों के आंदोलनों ने यह स्पष्ट किया कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के साथ नई अपेक्षाएँ भी जन्म लेती हैं।जातीय जनगणना की मांग भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। कोई इसे सामाजिक न्याय का आधार मानता है, तो कोई इसे समाज में नए विभाजन की आशंका के रूप में देखता है। ऐसे विषयों का समाधान केवल राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि व्यापक विमर्श और तथ्य आधारित नीति से संभव है।

लोकतंत्र में विरोध का सम्मान क्यों आवश्यक है?

लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है। यह असहमति के सम्मान का भी नाम है।विरोधी दल शत्रु नहीं होते। वे लोकतंत्र के दूसरे पहिए हैं। यदि विपक्ष कमजोर होगा तो सत्ता का आत्ममंथन भी कमजोर होगा। यदि सत्ता विपक्ष को केवल विरोधी मानने लगे और विपक्ष हर निर्णय का केवल विरोध करने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। यही कारण है कि परिपक्व लोकतंत्र संवाद को दमन से अधिक महत्व देता है।

अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति से सीख

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को केवल एक सफल राजनेता नहीं, बल्कि संवाद की राजनीति का प्रतीक माना जाता है। वैचारिक मतभेदों के बावजूद वे विपक्ष का सम्मान करते थे। संसद में तीखी बहस होती थी, लेकिन व्यक्तिगत कटुता नहीं।आज जब राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तब वाजपेयी की शैली याद आती है—मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं।

सरकार और विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी

सरकार को यह स्वीकार करना चाहिए कि हर आंदोलन केवल राजनीतिक साजिश नहीं होता। कई बार वह वास्तविक सामाजिक पीड़ा का परिणाम होता है।
उधर विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह जनता की भावनाओं को लोकतांत्रिक दिशा दे, न कि केवल राजनीतिक लाभ का माध्यम बनाए।आंदोलन यदि हिंसा में बदल जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन संवाद यदि बंद हो जाए तो लोकतंत्र और भी अधिक कमजोर होता है।

राष्ट्र सबसे बड़ा है

सरकारें बदलती रहती हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। लेकिन राष्ट्र और लोकतंत्र स्थायी हैं।इसलिए किसी भी सरकार का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं होना चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास जीतना भी होना चाहिए।एक मजबूत सरकार वह नहीं होती जो विरोध को दबा दे; मजबूत सरकार वह होती है जो विरोध को सुनकर समाधान खोज ले।किसानों की पीड़ा हो, छात्रों की चिंता, खिलाड़ियों का सम्मान या सामाजिक न्याय की मांग—हर आंदोलन अपने भीतर एक संदेश लेकर आता है। उस संदेश को केवल सुरक्षा, राजनीति या प्रचार के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।लोकतंत्र में सड़क और संसद प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। संसद नीति बनाती है और सड़क समाज की नब्ज़ बताती है। जब दोनों के बीच संवाद बना रहता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। जब संवाद टूटता है, तब असंतोष बढ़ता है।आज भारत को किसी नए टकराव की नहीं, बल्कि नए विश्वास की आवश्यकता है। ऐसा विश्वास जिसमें सरकार जनता की सुने, विपक्ष जिम्मेदारी निभाए, संस्थाएँ निष्पक्ष रहें और नागरिक संविधान पर भरोसा बनाए रखें।लोकतंत्र की सबसे बड़ी विजय तब नहीं होती जब आंदोलन समाप्त हो जाए, बल्कि तब होती है जब आंदोलन की आवश्यकता ही न पड़े, क्योंकि जहाँ संवाद जीवित रहता है, वहाँ लोकतंत्र भी जीवित रहता है।डॉ सुनील कुमार (राजनीतिक विश्लेषक)
असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग कबीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।

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