स्कूल की दीवार का काला फ्रेम

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कसबा शिवपुरी के प्राथमिक विद्यालय की तीसरी मंजिल के गलियारे में टँगा वह लकड़ी का काला फ्रेम पूरे गाँव के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ था। चमचमाते काँच के पीछे सफेद पन्ने पर सुनहरे अक्षरों में एक नाम उकेरा गया था जिसके नीचे हर महीने की पहली तारीख को बड़े साहब आकर लाल फूल की ताज़ा माला चढ़ा जाते थे। स्कूल में नए आए मास्टर जी जब भी उस फ्रेम के पास से गुजरते तो उन्हें एक अजीब सा सुकून और गर्व महसूस होता था कि इस दूर-दराज के छोटे से स्कूल ने देश को इतना बड़ा नाम दिया है। मास्टर जी अक्सर बरामदे में बच्चों को इकट्ठा करके उस काले फ्रेम की तरफ उँगली उठाकर कहते “बच्चों देखो और सीखो कि गरीबी और अभाव में भी जब कोई बच्चा हिम्मत नहीं हारता तो इतिहास के पन्नों पर अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवा लेता है।” बच्चे अपनी बालसुलभ आँखों से उस सुनहरे नाम को ताकते और तालियाँ बजाने लगते थे। स्कूल के पुराने चपरासी भवानी काका उस दीवार के पास एक पुरानी चटाई बिछाकर दिन भर बैठे रहते थे। भवानी काका का काम सिर्फ उस काँच को अपने गमछे से पोंछकर शीशे की तरह चमकाए रखना था। जब भी कोई आगंतुक उस फ्रेम के बारे में पूछता तो भवानी काका अपनी सूखी आँखों से उस चमचमाती पट्टी को देखते और एक लंबी साँस भरकर खामोश हो जाते थे।महीने का पहला दिन स्कूल के लिए किसी उत्सव की तरह होता था जब जिले के शिक्षा अधिकारी अपनी चमचमाती लाल बत्ती वाली गाड़ी से उतरकर सीधे उस काले फ्रेम के सामने खड़े हो जाते थे। गाँव के सरपंच और मास्टर जी साहब की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ते थे और चाय का दौर शुरू हो जाता था। अधिकारी साहब हर बार अपने भाषण में उस सुनहरे नाम का जिक्र करते हुए कहते “यह काला फ्रेम हमारे पूरे जिले के लिए एक मिसला है जिसने एक मामूली मजदूर के घर जन्म लेकर पूरी दुनिया में इस देश का डंका बजा दिया।” सरपंच जी तुरंत अपनी बात जोड़ते हुए कहते “साहब यह हमारे शिवपुरी की माटी का प्रताप है कि यहाँ का हर बच्चा उस महान आत्मा को अपना आदर्श मानकर पढ़ाई में जी-जान लगा देता है।” मास्टर जी भी सिर हिलाकर सहमत होते और कहते “जी साहब बिल्कुल सही कहा आपने, जब बच्चे उस दीवार के पास से गुजरते हैं तो उनके अंदर एक अलग ही ऊर्जा भर जाती है।” लेकिन इस पूरे तमाशे के बीच भवानी काका चुपचाप एक कोने में खड़े होकर चाय की खाली प्यालियाँ समेटते रहते थे और उनकी नजरें बार-बार उस काले फ्रेम के पीछे जमी धूल पर जाकर अटक जाती थीं जिसे किसी ने सालों से पोंछने की जहमत नहीं उठाई थी।एक दिन दोपहर की कड़कती धूप में जब पूरा स्कूल शांत था और बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में पढ़ रहे थे तब मास्टर जी ने भवानी काका को उस दीवार को साफ करते हुए देखा। मास्टर जी के मन में काफी दिनों से एक सवाल उमड़ रहा था इसलिए वे धीरे से काका के पास पहुँचे और आत्मीयता से उनके कंधे पर हाथ रखकर बोले “काका आप इस काले फ्रेम की सेवा इतने जतन से करते हैं जैसे इसमें कोई साक्षात ईश्वर वास करता हो, आखिर इस महान नाम से आपका क्या नाता है जो आप दिन-रात इसकी हिफाजत में लगे रहते हैं?” भवानी काका ने अपने झाड़ू को दीवार से टिकाया और अपनी झुर्रियों से भरे चेहरे को मास्टर जी की तरफ घुमाया। काका ने अपनी कांपती हुई आवाज में उत्तर दिया “मास्टर जी यह कोई ईश्वर नहीं बल्कि इस माटी का वह चिराग है जिसने अपने उजाले से दूसरों की जिंदगी रोशन कर दी लेकिन अपनी जड़ों को हमेशा के लिए अंधेरे में छोड़ गया।” मास्टर जी को काका की बात कुछ उलझी हुई लगी इसलिए उन्होंने आगे पूछा “काका गाँव के लोग कहते हैं कि इस नाम की बदौलत ही हमारे स्कूल को हर साल बड़ा सरकारी बजट मिलता है, तो क्या आप भी उस महान हस्ती से कभी मिले हैं या सिर्फ दूर से ही उनके गुण गाते हैं?”read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/भवानी काका ने अपने पुराने गमछे से अपनी आँखों के कोने में जमी नमी को पोंछा और एक गहरी ठंडी साँस खींचकर बोलना शुरू किया। काका बोले “मास्टर जी मिलने की बात करते हैं आप, इस नाम को अपने हाथों से इस दीवार पर उकेरने वाला भी यही अभागा भवानी है।” मास्टर जी यह सुनकर चौंक पड़े और उन्होंने अचरज से पूछा “क्या आप कह रहे हैं कि इस सुनहरे नाम वाले महान इंसान को आप बचपन से जानते हैं?” काका ने बहुत ही मार्मिक ढंग से मुस्कुराते हुए कहा “हाँ मास्टर जी जब यह छोटा सा था और नंगे पैर इस स्कूल की पथरीली जमीन पर दौड़ता था तो इसके पैरों में चुभे काँटे मैं अपने हाथों से निकाला करता था, जब इसके पास तख्ती खरीदने के पैसे नहीं होते थे तो मैं अपनी तनख्वाह से इसके लिए खड़िया लाया करता था।” मास्टर जी की उत्सुकता अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी और उन्होंने अधीर होकर पूछा “तो फिर काका वह महान इंसान आज इतने बड़े पद पर पहुँचकर आपको भूल कैसे गया, उसने आपको इस बदहाली से निकालने के लिए कभी कोई मदद क्यों नहीं भेजी या फिर कभी इस गाँव में वापस आकर आपका हालचाल क्यों नहीं पूछा?”भवानी काका ने काँच के फ्रेम पर छपी अपनी ही परछाईं को देखा और सहमी हुई आवाज में बोले “मास्टर जी उसने तो अपना फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाया था लेकिन यह दुनिया बहुत ही निर्दयी है।” मास्टर जी ने हैरान होकर पूछा “मैं कुछ समझा नहीं काका, जब वह इंसान जिंदा है और सफलता के शिखर पर है तो वह दुनिया के डर से अपने गाँव और अपने स्कूल से मुँह कैसे मोड़ सकता है?” काका ने लाचार होकर मास्टर जी के हाथ पकड़ लिए और रोते हुए बोले “मास्टर जी जब इस स्कूल की छत गिर रही थी और बच्चों के पास बैठने को टाट-पट्टी भी नहीं थी तब सरकार ने कहा था कि किसी बड़े नामी शहीद या महान हस्ती के नाम के बिना इस स्कूल को कोई फंड नहीं मिलेगा, तब गाँव वालों ने और साहब लोगों ने मिलकर तय किया कि शहर में बड़े अफसर बन चुके मेरे बेटे का नाम ही इस दीवार पर लिखकर उसे इस दुनिया के लिए मृत घोषित कर दिया जाए ताकि स्कूल को सरकारी अनुदान मिल सके।” मास्टर जी का कलेजा यह कड़वा सच सुनकर कांप उठा और वे सुन्न होकर उस काले फ्रेम को ताकने लगे।भवानी काका ने बिलखते हुए मास्टर जी के सामने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ लिफाफा निकाला और बोले “मेरा बेटा रोज मुझे शहर से खत लिखता है और बुलाता है कि पिताजी मेरे पास आ जाओ लेकिन मैं इस दीवार के सामने से हट नहीं सकता क्योंकि जिस दिन मैं यहाँ से चला गया उस दिन यह सरकारी अनुदान बंद हो जाएगा और सैकड़ों बच्चों का भविष्य अंधेरे में डूब जाएगा।” काका ने अपने कांपते हाथों से उस काले फ्रेम पर लगी फूल की माला को ठीक किया और रोते हुए बोले “हर महीने जब साहब आकर मेरे जिंदा बेटे के नाम पर यह माला चढ़ाते हैं तो एक बाप का कलेजा छल्ली हो जाता है मास्टर जी, मैं रोज अपनी ही औलाद के श्राद्ध का तमाशा देखता हूँ ताकि इन गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए सरकारी खजाने का दरवाजा खुला रहे।” मास्टर जी की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली और वे बिना कुछ कहे उस बेबस बाप के कदमों में बैठ गए जबकि दीवार पर टँगा वह काला फ्रेम पूरी शिक्षा व्यवस्था और आधुनिक समाज के मुँह पर एक तमाचा बनकर हँस रहा था।

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