स्नेहा सिंह
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर जाना हर पर्वतारोही का सपना होता है और इसे पूरा करने के लिए हर साल हजारों लोग वहां पहुंचते हैं। हाल ही में 53 वर्षीय अरुण कुमार तिवारी और 47 वर्षीय संदीप अरे ने क्रमशः 20 और 21 मई को एवरेस्ट शिखर फतह किया था। इसके बाद नीचे उतरते समय उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। रिपोर्टों के अनुसार, जब अरुण तिवारी 8790 मीटर की ऊंचाई पर हिलेरी स्टेप पर पहुंचे, तब उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। शेरपा ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। उनकी मृत्यु हो गई। जानकारों के अनुसार उन्हें हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा हुआ था, जिसके कारण उनके फेफड़ों में पानी भर गया और उनकी मौत हो गई। दूसरी ओर संदीप अरे भी 20 मई को एवरेस्ट पहुंच गए थे। वहां पहुंचने के बाद उन्हें स्नो ब्लाइंडनेस हो गई थी। उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। उस समय पांच शेरपाओं ने उन्हें बचाकर साउथ समिट से नीचे उतारा। लेकिन कुछ ही समय बाद कैंप-2 में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। इससे पहले 11 मई को 20 वर्षीय फुरा ग्याल्जेन शेरपा की मौत हो गई थी। पर्वतारोहण के दौरान उनका पैर फिसल गया था। इससे पहले 10 मई को बिजया घिमिरे खुम्बू भी आइसफॉल में गिर गए थे और उनकी मौत हो गई थी। उससे पहले 3 मई को कोल्पा डेंडे शेरपा की भी बेस कैंप लौटते समय मौत हो गई थी। हकीकत यह है कि हर साल हजारों लोग माउंट एवरेस्ट फतह करने आते हैं और अनेक कठिनाइयों का सामना करते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि अब माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना लोगों में फैशन बन गया है। इसके कारण एवरेस्ट की ओर भीड़ बढ़ रही है। यहां के डेथ ज़ोन का तापमान हमेशा शून्य से नीचे रहता है। यहां 200 से अधिक शव पड़े हुए हैं। अत्यधिक ठंड के कारण शव सड़ते नहीं हैं, लेकिन लोग उन्हें वापस नहीं ले जाते। यहां ग्रीन बूट्स और स्लीपिंग ब्यूटी नाम से प्रसिद्ध शव भी पड़े हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां कर्मचारी मौजूद रहते हैं और वे हर मौत का रिकार्ड रखते हैं, लेकिन शव नीचे लाने की जिम्मेदारी नहीं लेते। यही बात लोगों को सबसे अधिक आश्चर्यचकित करती है। यहां कचरे के साथ-साथ डेडबॉडी की भी भरमार हो गई है। एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचना जितना महंगा है, उतना ही खतरनाक भी है। यहां हर साल पांच से दस लोगों की मौत हो ही जाती है। इन सभी शवों को नीचे लाने का खर्च एवरेस्ट पर चढ़ाई के खर्च से दो से तीन गुना अधिक होता है। हाल ही में डेथ जोन में जिन अरुण कुमार तिवारी की मौत हुई थी, उनके परिवार ने शव नीचे लाने से मना कर दिया था। ऐसा लगता है कि शव नीचे लाने में आने वाली परेशानियों और भारी खर्च के कारण उन्होंने यह फैसला लिया। जिस कंपनी ने अरुण कुमार तिवारी का शव नीचे लाने का प्रयास किया था, उसका कहना था कि एवरेस्ट से शव नीचे लाने में भारी खर्च आता है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षित शेरपाओं को भेजना पड़ता है। इसका खर्च लगभग 1.15 लाख डालर यानी करीब 1.15 करोड़ रुपए तक होता है। यही कारण है कि अधिकतर शव वहीं छोड़ दिए जाते हैं।read more:https://pahaltoday.com/railway-crossing-structure-damaged-by-overloaded-truck-near-kharia-railway-overbridge/
जानकारों के अनुसार, एवरेस्ट में 8 हजार मीटर से ऊपर के क्षेत्र को डेथ जोन कहा जाता है। समुद्र तल पर जहां वायुदाब 1 होता है, वहीं एवरेस्ट की चोटी पर यह केवल 0.33 रह जाता है। डेथ जोन में आक्सीजन का स्तर भी केवल 50 से 60 प्रतिशत के बीच होता है।यहां आने वाले पर्वतारोहियों में आमतौर पर दो बड़े खतरे होते हैं। पहला हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा, जिसमें फेफड़ों में पानी भर जाता है और सांस लेने में दिक्कत होती है। दूसरी समस्या हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा है, जिसमें मस्तिष्क में सूजन आ जाती है और तंत्रिका तंत्र काम करना बंद कर देता है। इसमें धड़कन 160 तक पहुंच जाती है, पाचन प्रक्रिया रुक जाती है, नींद नहीं आती और मांसपेशियां अकड़ जाती हैं। ऐसे मामलों में, खासकर डेथ जोन में फंसने पर पर्वतारोही केवल 16 से 20 घंटे तक ही जीवित रह सकता है।उल्लेखनीय है कि नेपाल आर्मी में रहे शेरपाओं के अनुभवों के आधार पर कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई थी। उसमें बताया गया था कि धरती से 8000 से 9000 मीटर की ऊंचाई अत्यंत भयावह होती है। इस ऊंचाई पर यदि दो लोग केवल 8 किलो आक्सीजन सिलेंडर लेकर जाएं, तब भी उनकी हालत खराब हो जाती है। ऐसे में 70 या 80 किलो वजनी शव को नीचे लाना लगभग असंभव कार्य बन जाता है।दूसरी ओर लगातार बर्फ जमने के कारण 80 किलो का शव कब 100 किलो का हो जाता है, यह समझ ही नहीं आता। ऐसी परिस्थितियों में शव को वहीं छोड़ दिया जाता है।इसके अलावा इतनी ऊंचाई पर डेथ जोन में हवा इतनी पतली होती है कि हेलिकाप्टर के रोटर ब्लेड ठीक से काम नहीं कर पाते। हेलिकाप्टर केवल एवरेस्ट के बेस-2 कैंप तक ही जा सकते हैं। उससे आगे जाना हेलिकाप्टर के लिए भी खतरनाक है।एक और तथ्य यह है कि एवरेस्ट से शव नीचे लाने में लगभग 50 हजार डालर से लेकर 2 लाख डालर तक का खर्च आता है। भारतीय मुद्रा में यह खर्च लगभग 50 लाख से 2 करोड़ रुपए तक बैठता है।कोलोराडो के एक पर्वतारोही ने कुछ समय पहले सीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि यहां से जीवित वापस लौट आना ही सौभाग्य की बात है। ऐसे में शव को नीचे लाना बेहद खतरनाक और खर्चीला काम है।हालांकि 2017 में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा एक व्यक्ति का शव नीचे लाया गया था। इस अभियान को पूरा करने में लगभग 75 लाख रुपए खर्च हुए थे।इसके अलावा शेरपाओं की जान को भी खतरा रहता है। आज से चालीस साल पहले की एक घटना आज भी चर्चा में है। उस समय एक जर्मन पर्वतारोही को शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। इसी तरह शेरपाओं की भी हालत हो जाती है।1984 में स्थिति और भी खराब थी। उस समय एक जर्मन पर्वतारोही के शव को नीचे लाने और सुरक्षित रखने के प्रयास में दो शेरपाओं की मौत हो गई थी। इसके अलावा 2019 में मकालू पर्वत से शव नीचे लाने के मिशन के दौरान एक नेपाली सैनिक को एल्टीट्यूड सिकनेस हो गई थी, जिसके कारण अभियान अधूरा छोड़ना पड़ा था।एक और गंभीर बात यह है कि एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान अनुकूल मौसम केवल थोड़े समय के लिए ही मिलता है। मई महीने में मुश्किल से दो हफ्ते मौसम अच्छा रहता है। इसके बाद 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने लगती हैं। साथ ही तापमान माइनस 40 डिग्री से भी नीचे चला जाता है।अंधाधुंध कमाई, बड़े कमीशन और खुली लूट के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ रही हैसूत्रों के अनुसार, एवरेस्ट पर जाने वालों की संख्या लंबे समय से बढ़ती जा रही है। नेपाल पर्यटन विभाग ने वर्ष 2026 में 500 लोगों को अनुमति दी थी। यह अब तक की सबसे अधिक संख्या थी। यहां एक परमिट की कीमत लगभग 15 हजार डालर से 20 हजार डालर तक होती है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 12 से 13 लाख रुपए होती है। इससे नेपाल सरकार को हर साल लगभग 7.20 मिलियन डालर की कमाई होती है।वर्ष 2026 में एक ही दिन में 274 पर्वतारोहियों को एवरेस्ट शिखर पर जाने की अनुमति दी गई। यह एक दिन में दिया गया अब तक का सबसे बड़ा रिकार्ड था। एक्सपेडिशन आपरेटर्स एसोसिएशन आफ नेपाल के अनुसार, इससे पहले एक दिन में 223 लोगों को अनुमति दी गई थी। यह संख्या उससे काफी अधिक थी।22 मई, 2019 को एक ही दिन में 223 लोगों को अनुमति दी गई थी। जानकारों का मानना है कि वर्तमान में अधिक से अधिक लोगों को एवरेस्ट पर जाने की अनुमति दिए जाने के कई नकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।विशेषकर डेथ जोन में घंटों तक पर्वतारोहियों की लाइनें लग जाती हैं या भारी भीड़ हो जाती है। कई बार पर्वतारोहियों या शेरपाओं के पास मौजूद आक्सीजन खत्म होने की स्थिति पैदा हो जाती है।
कुछ समय पहले कामी रीता शेरपा ने अपना अनुभव साझा किया था। वे अब तक 32 बार एवरेस्ट पर चढ़ चुके हैं। उनके अनुसार स्थानीय सरकार केवल कमाई के लिए परमिट देती है और लोग भी अपनी स्वास्थ्य क्षमता की जांच किए बिना एवरेस्ट पर चढ़ने पहुंच जाते हैं, जिससे वे अपनी जान गंवा बैठते हैं।