गंज मेला जाहर दीवान का इतिहास

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गंज । ऐतिहासिक व पौराणिक छड़ी जाहर दीवान मेले की एक अलग विशेषता है ।श्रद्धालु सबसे पहले गंगा स्नान करते हैं फिर माढ़ी पर प्रसाद व झंडी चढ़ाते हैं । यहां से प्रसाद चढ़ाने के बाद लगभग 2 किलोमीटर दूर गांव जहानाबाद में नौलखा बाग जाते हैं । नौलखा एक पुराना किला है । इसमें सैयद शुजात अली की मजार पर प्रसाद और झाड़ू व मुर्गा चढ़ाते हैं । श्रद्धालु काफी संख्या में पहुंचकर मजार पर प्रसाद चढ़ाने के बाद माढ़ी पर आते है । यह मौसम बरसात का होने के कारण सांप का प्रकोप ज्यादा होता है। इसलिए भी भक्त बचाव के लिए इनकी माढ़ी पर प्रसाद चढ़ाने आते हैं । जात देने वाले बच्चे व व्यक्ति खादी के मोटे पीले कपड़े पहनकर आते हैं । जात देने वाले के हाथ में जाहर दीवान का झंडा होता है और गर्मी से राहत देने के लिए परिवार के सदस्य पंखों से हवा करते हैं । सावन में हरियाली तीज से भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तक गोगा जाहरवीर उर्फ जाहरपीर की माढ़ी पर श्रद्धालु जाकर निशान चढ़ाकर पूजा अर्चना करते हैं । गोगा को हिंदुओं में जाहरवीर कहते हैं । तो मुसलमानों में जाहरपीर कहते हैं । दोनों संप्रदायों में इनकी बड़ी मान्यता है । राजस्थान में जन्मे गोगा उर्फ जाहरवीर की ननसाल बिजनौर जिले के रेहड़ गांव में है व इनकी मां बाछल जिले में जहां-जहां गई वहां वहां आज मेले लगते हैं । जाहरवीर के नाना का नाम राजा कोरापाल सिंह था । गर्भावस्था में काफी समय बाछल पिता के घर रेहड़ में रही । रेहड़ के राजा कुंवर पाल की बेटी बाछल और काछल का विवाह राजस्थान के चुरू जिले के ददरेजा गांव में राजा जेवर सिंह व उनके भाई राजकुमार नेवर सिंह से हुआ । जाहरवीर के इतिहास के जानकारी के अनुसार, बाछल ने पुत्र प्राप्ति के लिए गुरु गोरखनाथ की लंबे समय तक पूजा की। गोरखनाथ ने उन्हें झोली में गूगल नामक औषधि दी और कहा कि जिन्हें संतान न होती हो उन्हें यह खिला देना। रानी बाछल ने सिर्फ थोड़ा-थोड़ा गूगल पंडिताइन ,बांदी और घोड़ी को देकर बचा काफी भाग खुद खा लिया ।औषधि के नाम पर उनकी संतान का नाम गोगा हो गया। जैसे रानी ने बेटे का नाम जाहरवीर रखा। पंडिताइन के बेटे का नाम नरसिंह पांडे और बांदी के बेटे का नाम भज्जू कोतवाल पड़ा। घोड़ी के नीले रंग का बछड़ा हुआ। गोगा की मौसी के भी गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से दो बच्चे हुए। यह सब साथ-साथ खेल कर बड़े हुए। बाछल ने जाहरवीर को वंश परंपरा के अनुसार शस्त्र कला सिखाई और विद्वान बनाया। जाहरवीर नीले घोड़े पर चढ़कर निकलते और मिलजुल कर रहते। गुरु गोरखनाथ के ददरेजा आने पर जाहरवीर ने उनकी सेवा की और फिर उनकी जमात में निकल गए। गुरु के साथ वह काबुल, गजनी ईरान, अफगानिस्तान आदि देशों में घूमे। उनके उपदेश हिंदू मुस्लिम एकता पर आधारित होते थे। भाषा के कारण वह मुसलमानों में जाहरपीर हो गए। जाहरपीर का नीला घोड़ा और हाथ में निशान उनकी पहचान बन गई। मां बाछल ने किसी बात पर इन्हें घर में न आने की शपथ दी थी किंतु रेहड़ में जाहरवीर गोगा की माढी होने के कारण यह पत्नी से मिलने छिपकर महल आते। श्रावण मास की हरियाली तीज पर मां ने इन्हें देख लिया और पीछा किया तो यह हनुमानगढ़ के निर्जन स्थान में घोड़े समेत जमीन में समा गए। उस दिन भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी थी। तभी से देश के कोने-कोने से आज तक प्रत्येक वर्ष लाखों श्रद्धालु राजस्थान के ददरेजा में स्थित जाहरवीर के महल एवं गोगा माढी नामक स्थान पर उनकी माढी पर प्रसाद चढ़ाकर मन्नते मांगते हैं। देश भर में जहां-जहां जाहरवीर गए वहां उनकी माढी बन गई। मान्यता है कि गर्भ अवस्था में रेहड़ में मां बाछल के रहने के स्थान पर ही जाहरवीर गोगा जी की माढी है। यहाँ प्रत्येक वर्ष भाद्रपद की नवमी को लाखो श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाकर सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हैं। गंज, फीना और गोहावर में भी इस अवधि में मेले लगते हैं। किवदंति है कि, जिस दंपति को संतान सुख नहीं मिलता जाहरवीर गोगा जी की माढी पर सच्चे मन से प्रार्थना करने से मुराद पूरी होती है। यह भी कहा जाता है कि, गोगा पीर ने गर्भ में रहने के दौरान मां बाछल से कहा था कि वह गंज में जाकर जात दे।मां बाछल ने जात दी। ये भी मान्यता है कि ,माढी पर प्रसाद चढ़ाने से सांप नही काटता और घर पर सांप का वास नही होता। एक मुगल शासक की महारानी को सांप के काटने के बाद यहाँ की माढी पर लाया गया था।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/गंज की माढ़ी के पुजारी श्रवण कुमार उपाध्याय का कहना है, कि यहां दिल्ली, राजस्थान, उत्तराखंड आदि से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां आकर परिवार बच्चे की कामना के लिए प्रसाद चढ़ाते हैं। संतान के होने पर उनकी जात देने आते हैं। जात देने वाले बच्चे या बड़े घर पर पूजा अर्चना कर पीले व सफेद कपड़े पहनकर चलते हैं। परिवार भी प्राय: ऐसे ही कपड़े पहनता है। इन कपड़ो पर हल्दी से हाथों के पंजों की छाप लगाई जाती है। जात देने वालों के हाथ में लाल रंग के कपड़ा की झंडी होती है। दूसरे हाथ में हवा करने वाला पंखा होता है। पंखा प्राय: परिवार के सभी सदस्य लिए होते हैं। यह एक-दूसरे और रास्ते में मिलने वालों को हवा करते चलते हैं। माढी पर जात दी जाती है। मजार के फकीर नूर शाह का कहना है कि, मजार पर झाडू ,प्रसाद चढ़ाया जाता है। कुछ लोग मुर्गा भी चढ़ाते हैं। मान्यता है कि, झाडू चढ़ाने से शरीर पर कई मस्सा हो तो मजार की धूल लगाने से रात में ही गायब हो जाता है। पांच पीढ़ियों से यहां की व्यवस्था उनका परिवार ही देखता है। मेले मे आसपास के दर्जनों जिलों के श्रावण मास में लगने वाले मेला छड़ी ज़ाहर दीवान पर लाखों संख्या में श्रद्धालु प्रतिवर्ष मन्नत लेकर आते हैं गुरु गोरखनाथ की पौराणिक गाथा पर रचित पुस्तक गोरखनाथ में बताया गया है । इस स्थान पर गोगा जाहर दीवान की माता प्रसव से पूर्व बागड़ जाते हुए विश्राम के लिए रुकी थी । उस समय इस क्षेत्र में बहुत सांप हुआ करते थे । जिन्होंने रथ में सवार गोगा जाहर दीवान की माता को रोक लिया था और घोड़ो को डस लिया था। क्रोधित गोगा जाहर दीवान ने अपने श्राप द्वारा क्षेत्र में सांपों का डसना समाप्त कर दिया था। आज भी एक किलोमीटर परिधि क्षेत्र में लगने वाले श्रावण मास में मेले में लाखों श्रद्धालु ऐसे ही जमीन पर विश्राम करते हैं। लेकिन क्षेत्र में सांपों के होने के बावजूद भी किसी श्रद्धालु को आज तक सांप ने नहीं सताया। उक्त क्षेत्र में गुरु गोरख मठ व पौराणिक मंदिर सांपों वाले मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है । इस परिसर में कभी सांप नहीं कटता। जहरीले से जहरीला सर्प भी श्रावण मास में परिसर से स्वत: ही दूर चले जाते हैं।गोगा जाहरवीर के बारे में बुजुर्ग के पास किस्सो का पिटारा है। लगभग 85 वर्षीय जहानाबाद निवासी रिटायर्ड अध्यापक मोहम्मद अब्दुल वासे कहते हैं कि, उनके पूर्वज बताते थे कि, बाबा गोरखनाथ ने पहले धूनी यहीं लगाई थी। जाहरवीर का पहला पड़ाव भी यही स्थान था मुगल शासक की बेगम को सांप ने काट लिया था। इसका उपचार बाबा जाहरवीर ने किया था। इससे खुश होकर मुगल शासक ने यह रियासत बाबा जाहरवीर को उपहार में दे दी थी। आज भी नौलखा बाग के किले पर श्रद्धालु प्रसाद चढ़ाने आते हैं। गंज निवासी करीब 89 वर्षीय पंडित सोमप्रकाश कौशिक जी कहते हैं कि, जाहरवीर गोगा की यात्रा का प्रथम पढ़ाव जहानाबाद स्थित नौलखा बाग में था। इसलिए श्रद्धालु यहां आते हैं। उसके बाद गंज स्थित माढी पर प्रसाद,झंडी व पंजी चढ़ाते थे । हमने आज तक नहीं सुना इस दिन किसी सर्प ने किसी श्रद्धालु को काटा हो । गंज निवासी लगभग 73 वर्षीय रिटायर्ड क्लर्क राकेश कुमार शर्मा बताते हैं कि श्रद्धालु जात देने अपने परिवार के संग खादी के पीले वस्त्र जिस पर हल्दी का पंजा छपा होता है आते हैं और परिवार की खुशहाली की मन्नत मांगते हैं। कई जिलों के श्रद्धालु यहां आते हैं । 90 वर्षीय गंज निवासी रिटायर्ड क्लर्क श्याम सुंदर शर्मा जी का कहना है की वे बचपन से ही इस मेले का आयोजन देख रहे हैं। कितने वर्षों से लग रहा है यह तो याद नहीं है लेकिन कई वर्षों से लग रहा है पहले तो गंगा यही घाट से होकर बहती थी लेकिन अब बहुत दूर चली गई है।पहले इतने यातायात के साधन नहीं हुआ करते थे। लगभग 70 वर्षीय गंज निवासी हरि शरण अग्रवाल ने बताया कि इस मेले में श्रद्धालु तीन से चार दिन पहले आ जाते हैं । चिरागी करते हैं।श्रद्धालुओ की संतान उत्पत्ति के लिए माढ़ी पर मन्नत पूरी होती है। पूर्व में यातायात का साधन न होने से श्रद्धालु लोग पैदल व बैलगाड़ी से प्रसाद चढ़ाने आते थे। पहले 12 महीने गंगा घाट पर ही गंगा बहती थी लेकिन अब स्नान करने के लिए 2 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

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