वीरेंद्र बहादुर सिंह
लोकसभा में सीटों के परिसीमन के लिए आधार बनेगी जनगणनादेश में बहुप्रतीक्षित जनगणना 1 अप्रैल से औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। दशवार्षिक जनगणना 2020 में निर्धारित थी, लेकिन कोरोना के कारण उस समय इसे किया नहीं जा सका। हालांकि आर्थिक गतिविधियां सामान्य होने के बाद भी इसे क्यों नहीं किया गया, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है। फिर भी अब जनगणना प्रक्रिया का शुरू होना स्वागतयोग्य है।नियमित जनगणना की आवश्यकता को कम करके नहीं आंका जा सकता, विशेष रूप से भारत जैसे देश के लिए, जो तेजी से आगे बढ़ रहा है और बदल रहा है। उदाहरण के लिए, सर्वेक्षण डेटा और विश्लेषणात्मक माडल संकेत देते हैं कि भारत में जन्म दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, लेकिन वास्तविक जनगणना के आंकड़े ही इस स्थिति की पुष्टि करेंगे। इसके अलावा यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारत में शहरीकरण पहले के आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक तेजी से हुआ है। नई जनगणना इस पर और प्रकाश डालेगी।जनगणना दो चरणों में पूरी होगी।read more:https://khabarentertainment.in/14-prominent-social-workers-were-honored-on-baba-sahebs-birth-anniversary/ पहला चरण घरों की सूची और आवास गणना का होगा, जो अप्रैल से सितंबर, 2026 के बीच 30 दिनों की अवधि में पूरा किया जाएगा। यह प्रत्येक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के प्रशासन की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा। दूसरा चरण जनगणना का होगा, जो फरवरी, 2027 में पूरा होगा। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय और बर्फ से ढके क्षेत्रों में यह चरण सितंबर, 2026 में ही पूरा कर लिया जाएगा।इस बार दो बातें विशेष रहेंगी। पहली एक समर्पित पोर्टल के माध्यम से स्वयं-गणना की अनुमति दी जाएगी। दूसरी, पूरा कार्य डिजिटल फार्मेट में किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संकलन प्रक्रिया में काफी तेजी आएगी। उन्होंने यह भी दोहराया है कि डेटा सुरक्षित रहेगा और इसे किसी अन्य सरकारी संस्था के साथ साझा नहीं किया जाएगा।जब भी जनगणना के परिणाम घोषित होंगे, उनका बारीकी से विश्लेषण किया जाएगा। हालांकि दो संबंधित मुद्दे हैं, जिन्हें सावधानीपूर्वक संभालना आवश्यक है। पहला, इस बार 1931 के बाद पहली बार जातिगत जनगणना भी शामिल होगी। जाति भारत के सामाजिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण पहलू है और इसका राजनीतिक महत्व भी काफी अधिक है।read more:https://khabarentertainment.in/the-birth-anniversary-of-the-constitution-maker-was-celebrated-in-ward-number-18-of-the-city/ इस पहल से जुड़े कई प्रश्न अभी तक स्पष्ट नहीं हैं।जनगणना के जातिगत पहलू को शुरू से ही बहुत सावधानी से संभालने की आवश्यकता होगी। इसका मतलब है कि पूछे जाने वाले प्रश्नों और दर्ज किए जाने वाले उत्तरों पर विशेष ध्यान देना होगा। संभावना है कि इसका उपयोग विभिन्न राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जिनमें कई तरह की मांगें भी शामिल हैं। यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि इससे देश के सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे में अस्थिरता न आए।दूसरा, जनगणना लोकसभा में सीटों के परिसीमन के लिए भी आधार बन सकती है। इससे विधानसभाओं में महिला आरक्षण के लागू होने का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। यह एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है, जो भारत के संघीय ढांचे को प्रभावित करता है। दक्षिण भारत के राज्य यह तर्क देते हैं कि उनकी जनसंख्या वृद्धि उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में धीमी रही है, इसलिए लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है।यह तर्क उचित है, इसलिए परिसीमन की प्रक्रिया कैसे की जाती है, यह अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। सैद्धांतिक रूप से संतुलन बनाए रखना आवश्यक है और जनसंख्या वृद्धि को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने तथा जीवन स्तर सुधारने वाले राज्यों को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार शुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण से जनगणना के आंकड़े सरकार और निजी क्षेत्र, दोनों को बेहतर निर्णय लेने में मदद करेंगे।