डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
रामदीन अपने फटे हुए झोले में पचहत्तर साल की आजादी के दस्तावेज समेटे शहर के सबसे बड़े ‘लोकतंत्र शोरूम’ के बाहर खड़ा था। बाहर एक विशाल होर्डिंग लगा था— “यहाँ न्याय, समानता और गरिमा पर 90% की भारी छूट है।” जैसे ही उसने भीतर कदम रखा, ठंडी हवा के झोंके ने उसका स्वागत किया। शोरूम के भीतर मखमली सोफों पर ‘अधिकार’ बैठे थे और ‘कर्तव्य’ कोने में झाड़ू लगा रहे थे। एक सुदर्शन सेल्समैन, जिसने गले में ‘संविधान की प्रस्तावना’ वाली टाई बांधी थी, रामदीन के पास आया और मुस्कुराकर बोला, “बताइए बाबा, क्या चाहिए? हमारे पास ‘स्मार्ट सिटी’ वाला चश्मा है जिससे कीचड़ भी मखमल दिखता है, या फिर ‘सहिष्णुता’ वाला हेडफोन चाहिए जिससे चीखें भी संगीत लगती हैं?” रामदीन ने हकलाते हुए कहा, “बेटा, मुझे बस थोड़ा सा न्याय चाहिए था, मेरे खेत पर सरपंच ने कब्जा कर लिया है।” सेल्समैन हँसा, “बाबा, न्याय तो ‘प्रीमियम सेगमेंट’ में है, उसकी किस्तें बहुत भारी हैं।read more:https://khabarentertainment.in/baba-sahebs-birth-anniversary-celebrated-at-sukrit-range-office-messages-of-social-awareness-given/ आपके पास ‘वोट कार्ड’ का बैलेंस कितना है?” रामदीन ने अपना कार्ड दिखाया, जो सालों के इस्तेमाल से घिस चुका था। सेल्समैन ने उसे स्कैन किया और उदास होकर बोला, “सॉरी बाबा, आपका बैलेंस तो ‘एक्सपायर’ हो चुका है। आप अगले चुनाव के ‘रिफिल’ का इंतजार कीजिए।” इसी बीच शोरूम के ‘वीआईपी लाउंज’ से एक मोटा आदमी निकला, जिसने ‘कानून’ को अपनी बगल में दबा रखा था। सेल्समैन ने झुककर उसे सलाम किया और रामदीन को धक्का देते हुए बोला, “बाबा, बाहर निकलिए, शोरूम की फर्श गंदी हो रही है।” रामदीन बाहर निकला तो देखा कि शोरूम का कांच इतना पारदर्शी था कि भीतर की चमक बाहर के अंधेरे को चिढ़ा रही थी। उसने महसूस किया कि इस शोरूम में सामान जनता का ही है, बस उसे खरीदने की औकात जनता की नहीं बची है। वह सड़क पर बैठ गया, जहाँ एक लावारिस कुत्ता ‘मैनीफेस्टो’ के पन्ने चबा रहा था।