प्राकृतिक खेती के मॉडल के रूप में विकसित होगा वाराणसी, 100 किसानों पर होगा वैज्ञानिक प्रयोग

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वाराणसी।प्राकृतिक खेती को केवल प्रचार तक सीमित न रखकर अब उसे वैज्ञानिक कसौटी पर परखने की तैयारी शुरू हो गई है, इसी दिशा में वाराणसी में कृषि विभाग, उद्यान विभाग और गुजरात की बंशी गिर गौशाला के बीच एक वर्ष के लिए महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) हुआ है, इस पहल के तहत जिले के 100 प्रगतिशील किसानों के लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में प्राकृतिक एवं गो-आधारित खेती का वैज्ञानिक पायलट प्रोजेक्ट संचालित किया जाएगा।read more:https://khabarentertainment.in/administration-gears-up-for-kanwar-yatra-divisional-commissioner-issues-strict-directives/समझौते पर आयुक्त एस. राजलिंगम, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार और मुख्य विकास अधिकारी प्रखर कुमार सिंह की मौजूदगी में उप कृषि निदेशक अमित जायसवाल, जिला उद्यान अधिकारी सुभाष कुमार तथा बंशी गिर गौशाला के संस्थापक गोपालभाई सुतारिया ने हस्ताक्षर किए।परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि किसानों को केवल प्रशिक्षण ही नहीं मिलेगा, बल्कि पूरे एक वर्ष तक कृषि वैज्ञानिक उनके खेतों की नियमित निगरानी करेंगे। “गो कृपा अमृतम्” आधारित प्राकृतिक खेती के प्रत्येक चरण का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। मृदा की गुणवत्ता, कार्बन संचयन, सूक्ष्मजीवी गतिविधियों, पोषक तत्वों की उपलब्धता और फसल की लाभप्रदता का विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा, ताकि प्राकृतिक खेती के वास्तविक परिणाम सामने आ सकें।इस मॉडल की एक और खास बात किसानों के लिए बनाई गई ‘रिस्क सपोर्ट’ व्यवस्था है, यदि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद किसी चयनित किसान की आय निर्धारित आधार स्तर से कम होती है तो उसकी भरपाई बंशी गिर गौशाला करेगी, इस पूरी व्यवस्था का वित्तीय भार कृषि या उद्यान विभाग पर नहीं होगा, इससे किसानों में नई खेती पद्धति अपनाने का भरोसा बढ़ेगा।परियोजना के दौरान किसानों को नियमित प्रशिक्षण, तकनीकी परामर्श और खेत स्तर पर वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले किसानों को सम्मानित किया जाएगा, जबकि परियोजना से जुड़े शोध पत्र, तकनीकी प्रकाशन और अध्ययन रिपोर्ट भी संयुक्त रूप से तैयार किए जाएंगे, इसके संचालन के लिए अलग-अलग स्टीयरिंग, मॉनिटरिंग और कार्यान्वयन समितियां गठित की जाएंगी।अधिकारियों का मानना है कि यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा तो वाराणसी प्राकृतिक एवं गो-आधारित खेती के वैज्ञानिक मॉडल के रूप में नई पहचान बनाएगा, इससे किसानों की आय बढ़ाने, मृदा उर्वरता सुधारने और पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

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