डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘
ननिहाल अब उस पुराने डाकखाने की तरह हो गया है जहाँ चिट्ठियाँ तो आती हैं, पर उन्हें पढ़ने वाला डाकिया रिटायर हो चुका है। बस की खिड़की से जब मैंने उस कस्बे की धूल को उड़ते देखा, तो लगा जैसे मेरी स्मृतियों की किताब पर कोई जानबूझकर मिट्टी डाल रहा हो। घर की ड्योढ़ी पर कदम रखते ही वह चिर-परिचित गंध नदारद थी। मिट्टी के चूल्हे और घी के छौंके वाली वह खुशबू, जो नानी के पल्लू में गांठ की तरह बँधी रहती थी। अब वहाँ एअर फ्रेशनर की बनावटी महक थी, जो उदासी को दबाने की नाकाम कोशिश कर रही थी। नानी के बिना वह घर महज़ ईंट-पत्थरों का एक व्यवस्थित ढेर था, जहाँ दीवारों पर लगी उनकी तस्वीर भी अब एक अजनबी की तरह मुझे देख रही थी। ड्राइंग रूम में सोफे बदल गए थे, पर्दों के रंग चटख हो गए थे, पर उस घर की रूह कहीं कोने में सिमटकर सिसक रही थी। मामा-मामी के चेहरों पर औपचारिकता की वह मखमली परत थी, जिसे ओढ़कर अक्सर लोग शोक को शिष्टाचार में बदल देते हैं। मुझे लगा जैसे मैं किसी संग्रहालय में आ गया हूँ, जहाँ सब कुछ करीने से रखा है, बस वह स्पर्श गायब है जो निर्जीव वस्तुओं में भी जान फूँक देता था।शहर का लोहा जब गाँव की माटी निगलने लगे, तो समझ जाना चाहिए कि हम स्मार्ट हो रहे हैं। संकरी गलियों के मुहाने पर अब नीम की शीतल छाँव नहीं, सीसीटीवी का निर्जीव और पथराया हुआ लेंस था। नानी के घर की वह पुरानी ड्योढ़ी, जहाँ कभी सोंधी महक और तुलसी का बिरवा था, अब वहां सेंसर वाला गेट लगा था जो अनजानों को देखकर घुर्राता था। ममेरे भाई सुधीर हाथ में आईफोन लिए खड़े थे, जैसे किसी विरासत के अंतिम संस्कार का लाइव टेलीकास्ट कर रहे हों।आओ आओ! देखो, वह पुराना सड़ियल सा घर अब कितना आलीशान बन गया है। अब यहाँ गोबर की गंध नहीं, वियतनामी लैवेंडर महकता है।” उसने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।”भैया, नानी की तुलसी कहाँ गई?” मैंने पूछा।”तुलसी? वह तो ऑक्सीजन का पुराना मॉडल थी। अब हमने हर कमरे में जापानी प्यूरीफायर लगा दिया है। बिना कीड़े वाली शुद्ध हवा, जैसे फाइव स्टार होटल की हो।” वह हँसा, पर उसकी हँसी में सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट थी।”नानी की वह बुनी हुई खाट?””उसे कबाड़ी को दे दिया। उसकी जगह इटालियन रिक्लाइनर लिया है। बैठो, तुम्हारी रीढ़ की हड्डी को मोक्ष मिल जाएगा।”
नानी की धुंधली तस्वीरों की जगह स्टॉक मार्केट के चमकते ग्राफ और ऐसी आधुनिक पेंटिंग्स थीं जिनमें रंगों ने एक-दूसरे का कत्ल कर रखा था।अंदर का सन्नाटा इतना महंगा था कि साँस लेने में भी डर लग रहा था। मामी आईं, उनके चेहरे पर बोटॉक्स वाली ऐसी मुस्कान थी जैसे किसी ने गीली मिट्टी पर सांचा दबा दिया हो।”अरे लाला! बड़ा देर कइ देहलू आए में। कुछ ठंढा-वंडा लेबे कि खाली ई दीवार निहारबे?” उन्होंने अपने लहजे में पूछा, पर उनकी आँखों में एग्जिट गेट का पता चमक रहा था।
“मुझे नानी वाली बड़ी खानी थी।””धत! वह धूल-मिट्टी का खाना अब आउटडेटेड है। हमारे पास ऑटोमैटिक फूड मेकर है। जो बटन दबाओगे, वही गिरेगा।” मामा ने गर्व से छाती फुलाई।”क्या यह मशीन नानी की आवाज़ भी निकाल लेती है?” मैंने तंज कसा।”आवाज़ का क्या चाटोगे? यहाँ 5जी है। पूरी दुनिया मुट्ठी में है, सिर्फ फरमाइश करने की देरी है।”मामा के लिए प्रगति का मतलब हार्डवेयर था, सॉफ्टवेयर यानी संवेदना तो नानी की चिता के साथ ही भस्म हो चुकी थी। डाइनिंग टेबल पर पिज्जा का शव पड़ा था। नानी के हाथ की पखाल और बथुए का साग अब यहाँ अपराध घोषित हो चुके थे। मामा हर कौर के साथ अपनी नई लग्जरी कारों और आगामी टेंडर्स की गाथा सुना रहे थे। नानी की मृत्यु उनके लिए महज एक सिस्टम अपडेट थी।रात हुई तो मुझे उसी कमरे में धकेल दिया गया जहाँ कभी नानी कहानियों के जादुई पिटारे खोलती थीं। अब वहाँ होम थिएटर का तामझाम था। खिड़की खोली तो देखा, बाहर वाला वह पुराना नीम का पेड़ गायब था।”नीम क्यों कटवा दिया मामा जी?”
“सोलर पैनल लगाने थे। पेड़ों की छाँव से बिजली का बिल कम नहीं होता बबुआ!””पर नानी कहती थीं कि ऐसे पेड़ों में पुरखों का बसेरा होता है।””पुरखों को भी अब क्लाउड स्टोरेज पर शिफ्ट हो जाना चाहिए। कब तक लकड़ी पर लटकी रहेंगी?”उनकी बातें नश्तर की तरह कलेजे को चीर रही थीं। वे मुझे हर वह चीज़ दिखा रहे थे जिसे खरीदा जा सकता था, पर वह एक भी चीज़ नहीं दिखा पा रहे थे जिसे महसूस किया जा सके। घर की रूह की नीलामी हो चुकी थी और मामा उसके सबसे बड़े बोली लगाने वाले थे। मुझे लगा जैसे मैं किसी कॉरपोरेट ऑफिस में इंटर्नशिप कर रहा हूँ, जहाँ सगे रिश्ते भी कमीशन पर टिके थे।read more:https://pahaltoday.com/strict-action-will-be-taken-against-black-marketing-of-fertilizers-nsa-will-be-imposed-on-charging-higher-prices/
अगली सुबह जब मैंने अपना झोला उठाया, तो मामा के चेहरे पर वही बनावटी आश्चर्य उभरा जो अक्सर लोग नाटक के अंत में दिखाते हैं। औपचारिकता भर के लिए वे पीछे-पीछे दरवाज़े तक आए, जैसे किसी उधार लेने वाले को विदा कर रहे हों। उनका तर्क था कि अब यहाँ कमी किस बात की है? उन्होंने उँगलियों पर गिनाना शुरू किया। “देखो, हाई-स्पीड वाई-फाई लगवा लिया है, नेटफ्लिक्स अमेज़न प्राइम का सब्सक्रिप्शन है और ड्राइंग रूम में सत्तर इंच का स्मार्ट फ्लैट टीवी भी तो है। बच्चे हैं खेलने को, उनके पास पीएस-5 गेम्स हैं।” उनकी बातों में एक ऐसा खोखलापन था जो मुझे यह अहसास करा रहा था कि उन्होंने घर को तो अपग्रेड कर लिया, पर उस ममता के सॉफ्टवेयर को डिलीट कर दिया जिसके लिए मैं यहाँ आया था। मामा की भाषा में अब रिश्तों का हिसाब डेटा पैक की तरह था, जहाँ भावनाएँ नहीं, बस सुविधाओं का सिग्नल मज़बूत होना चाहिए था। उनकी उस अनमनी पुकार में कोई कशिश नहीं थी। वे मुझे रुकने के लिए वैसे ही कह रहे थे जैसे कोई अनचाहा मेहमान जाने लगे तो हम शिष्टाचार के नाते कहते हैं, “अरे, अभी तो आए थे!” जबकि अंदर ही अंदर हम उसके जूते पहनने का इंतज़ार करते हैं। उनके लिए नानी का जाना शायद एक स्पेस खाली होना था, जिसे उन्होंने महंगे फर्नीचर से भर दिया था।मेरी बातें सुन मामा जी कहने लगे, “अरे पागल! तू तो एकदम देहाती रह गया। समय एक सा नहीं रहता। हमें समय के साथ बदलते रहना चाहिए। यादों का अचार डालेगा क्या?””यादें कभी स्मार्ट नहीं होतीं मामा जी, वे तो बस गीली और भारी होती हैं। यह टीवी, यह वाई-फाई और ये एलइडी लाइट्स ये सब तो हमारे यहाँ भी है। मैं यहाँ नेटफ्लिक्स की सीरीज देखने नहीं, बल्कि नानी की यादों को महसूस करने आया था जो अब मेरे लिए सपना भर है। यह घर अब नानी का नहीं आपका है। नानी के घर आना और मामा के घर आने में बहुत फर्क है। इस घर में नानी की कोई निशानी नहीं बची। अब यह ननिहाल नहीं रहा।” मामा को शायद बुरा लगा होगा, पर सच तो यह था कि उनके अपग्रेडेड घर में नानी का वह पुराना संदूक भी कहीं नहीं मिला, जिसकी चाभी वे अपनी कमर में खोंसकर रखती थीं। मामा के पास हर सवाल का जवाब था, बस मेरी आँखों की उस नमी के लिए कोई टिशू पेपर नहीं था। मैंने चौखट पार की। मामा पीछे से चिल्लाए— “इंस्टा पर रील डाल देना, हमें टैग करना मत भूलना!”मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह घर अब ईंटों और कंक्रीट का एक आलीशान कब्रिस्तान था। नानी की वह पुरानी खटिया, जिस पर बैठकर वे गुड़ की डली खिलाती थीं, आज उस करोड़ों के सोफे के सामने पहाड़ जैसी ऊंची लग रही थी। मैं उस गली से निकला जहाँ कभी नानी की दुआएं साथ चलती थीं।स्टेशन की ओर कदम बढ़ाते हुए मुझे एहसास हुआ कि हम विकास की दौड़ में इतने आगे निकल आए हैं कि पीछे मुड़कर देखने पर नानी का वह कच्चा घर भी अब एक मृगतृष्णा जैसा लगता है। मामा अभी भी दरवाज़े पर खड़े होकर शायद अपने वाई-फाई का पासवर्ड चेक कर रहे होंगे या टीवी का रिमोट ढूँढ रहे होंगे। उन्हें लग रहा होगा कि मैं पागल हूँ जो इतनी सुविधाओं को छोड़कर जा रहा हूँ। पर उन्हें कौन बताए कि जिस घर से ‘न’ से ‘नानी’ निकल जाए, वह घर महज़ ‘न’ से ‘नरक’ की एक आधुनिक प्रतिलिपि बन जाता है। नानी के बिना ननिहाल जाना किसी ऐसी सुंदर जिल्द वाली किताब को पढ़ने जैसा है जिसके पन्ने कोरे हों। शीर्षक तो ‘ननिहाल’ है पर भीतर कोई कहानी नहीं बची। दिखने में चमक-दमक, पर संवाद के नाम पर बिल्कुल सन्नाटा। ट्रेन की पटरी पर होती खट-खट की आवाज़ में मुझे नानी की वह पुरानी खड़ाऊँ सुनाई दे रही थी, जो शायद अब मामा के स्टोर रूम में किसी कोने में दम तोड़ रही होगी। मैं उस खोखले स्वर्ग को पीछे छोड़कर अपनी दुनिया के एकांत में वापस लौट आया।