सत्ता बचाने के लिए गुंडों का सहारा लेना ममता को भारी पड़ा

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स्नेहा सिंह 
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का फैसला केवल राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण है। ममता बनर्जी तथा उनकी आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की करारी हार ने डेढ़ दशक से अधिक समय से बंगाल की पहचान बन चुके एक राजनीतिक युग का अंत कर दिया है। इस परिणाम की सबसे चौंकाने वाली बात उसका व्यापक और गहरा प्रभाव है। यह कोई स्थानीय कारणों या विशेष कमजोरियों से हुई मामूली हार नहीं थी, बल्कि गहरी जड़ें जमा चुके सत्ताधारी दल के प्रति व्यापक अस्वीकृति थी।ममता बनर्जी ने अपना शासन बनाए रखने के लिए असामाजिक तत्वों और गुंडों का भरपूर सहारा लिया था। अपनी कुर्सी को कोई खतरा न पहुंचे, इसके लिए उन्होंने ऐसे तत्वों को संरक्षण दिया, लेकिन समय के साथ यही लोग उन पर हावी हो गए। आखिरकार स्थिति ऐसी हो गई कि इन्हीं गुंडों के कारण ममता को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा।ममता ने अपने करीबी लोगों की सही सलाह भी मानना बंद कर दिया, जिससे बाजी बिगड़ गई। शुभेंदु अधिकारी ममता के खास माने जाते थे, लेकिन उनकी उपेक्षा होने के कारण अंततः वह भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा ने शुभेंदु रूपी तीर का उपयोग ममता को मात देने में किया। रिपोर्टों में तो यह भी कहा गया कि ममता ने अपनी ही पार्टी के लोगों को टिकट देने के लिए तीन से पांच करोड़ रुपए तक लिए और इस धन का उपयोग असामाजिक तत्वों को संरक्षण देने में किया। हालांकि जनता ने इस मनमानी को सहन नहीं किया और अंततः ममता को सत्ता छोड़नी पड़ी।ममता बनर्जी की नाटकीय चुनावी हार के लिए नीचे दिए गए दस कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार माने जा सकते हैं :ममता बनर्जी 2011 में 34 वर्षों के वामपंथी शासन को हराकर सत्ता में आई थीं। पंद्रह वर्ष बाद उन्हें उसी मतदाता असंतोष का सामना करना पड़ा। समय के साथ परिवर्तन की हवा धीमी पड़ गई और उसकी जगह ठहराव तथा लापरवाही ने ले ली। मतदाता टीएमसी को उसी निष्क्रियता से जोड़ने लगे, जिसका वह कभी विरोध करती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण, टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार और लगातार होती बलात्कार की घटनाएं भी ममता के पतन का कारण बनीं।read more:https://pahaltoday.com/a-case-has-been-filed-against-four-people-after-a-video-of-a-fight-went-viral/35 में से 22 मंत्रियों की हार व्यवस्था से जुड़ी निराशा का स्पष्ट संकेत थी। यह केवल कुछ अलोकप्रिय चेहरों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें शिक्षा, आवास, कल्याण और परिवहन जैसे प्रशासनिक क्षेत्रों के प्रति व्यापक मोहभंग झलक रहा था। मतदाताओं ने प्रभावी रूप से पूरी सरकार को नकार दिया।अपने गढ़ भवानीपुर में सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ पंद्रह हजार से अधिक मतों से ममता बनर्जी की हार प्रतीकात्मक और नुकसानदायक साबित हुई। इससे ममता की अजेय छवि टूट गई और लोगों का नजरिया बदल गया। अपनी ही सीट हारने से साबित हुआ कि उनका सबसे वफादार समर्थक वर्ग भी अब उनसे नाराज है।भाजपा ने भले ही टीएमसी के 40.80 प्रतिशत के मुकाबले 45.84 प्रतिशत वोट हासिल किए, लेकिन असली अंतर उसकी रणनीतिक क्षमता में था। भाजपा ने इस मामूली बढ़त को विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में जीत में बदल दिया, जिससे बेहतर बूथ स्तर की व्यवस्था और चुनावी गणित का प्रदर्शन हुआ। टीएमसी के वोट कुछ विशेष क्षेत्रों तक सीमित रह गए और सीटों में बदलने के मामले में कम प्रभावी साबित हुए।अरूप विश्वास, ब्रत्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य और शशि पांजा जैसे महत्वपूर्ण नेताओं की हार ने साबित कर दिया कि यह बदलाव केवल स्थानीय नहीं था। इसका प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों तक फैला हुआ था, जो बिखरे हुए सत्ता विरोधी माहौल की बजाय राज्यव्यापी समर्थन में गिरावट का संकेत था।टीएमसी का शासन माडल नकद हस्तांतरण, सस्ते भोजन और अन्य लाभ जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर बहुत अधिक निर्भर था।इन योजनाओं ने एक वफादार वर्ग तो बनाए रखा, लेकिन भ्रष्टाचार, अक्षमता और जवाबदेही की कमी जैसी रोजमर्रा की शिकायतों का समाधान करने में विफल रहीं। ऐसा प्रतीत हुआ कि मतदाताओं ने लाभ की बजाय गुणवत्ता को प्राथमिकता दी।आरजी कर केस और नियुक्ति घोटाले जनता के मन में लगातार घूमते रहे। विशेष रूप से इन विवादों के कारण युवाओं का सरकार से विश्वास उठ गया। चुनाव तक आते-आते यह नाराजगी ईमानदारी और जवाबदेही को लेकर शांत लेकिन मजबूत अविश्वास में बदल गई।सरकारी अधिकारी जनता की समस्याएं हल करने के बजाय ममतादीदी की चापलूसी में ही लगे रहते थे। इतना ही नहीं, यदि कोई नागरिक अपनी समस्या लेकर सरकारी दफ्तर जाता तो उसका अपमान किया जाता। पंद्रह वर्षों के शासन में तृणमूल सरकार ने जनता के कल्याण के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो, ऐसा कोई नहीं कहता।कांग्रेस और वामपंथियों के पतन के बाद कोई संगठित विपक्ष नहीं बचा था। परिवर्तन चाहने वाले मतदाताओं के पास भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मतदाताओं के इस एकीकरण ने सत्ता विरोधी भावना को और मजबूत किया तथा यही निराशा निर्णायक परिणाम का कारण बनी।गोगाट से दुर्गापुर पूर्व और दमदम उत्तर तक भाजपा को बड़े अंतर से जीत मिली। यह कांटे की टक्कर नहीं थी, बल्कि स्पष्ट जनादेश था। ऐसे परिणाम मतदाताओं में मामूली विभाजन नहीं, बल्कि उनकी भावना में व्यापक और गहरे बदलाव का संकेत देते हैं।शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण था वास्तविकता को समझने में टीएमसी की असमर्थता। जनता का असंतोष लंबे समय से बढ़ रहा था, लेकिन पार्टी उसका प्रभावी जवाब देने में विफल रही। संस्थागत लापरवाही और अत्यधिक आत्मविश्वास का परिणाम यह हुआ कि मतदाताओं की नाराजगी के शुरुआती संकेतों को बहुत देर तक नजरअंदाज किया गया।ममता बनर्जी की हार के पीछे शायद सबसे निर्णायक और अपेक्षाकृत नया कारण था शहरी अपराधीकरण का बढ़ता दायरा। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में अराजकता लंबे समय से चिंता का विषय रही थी, लेकिन शहरों में कानून व्यवस्था की स्थिति का लगातार बिगड़ना और विकास की रफ्तार थम जाना गहरे राजनीतिक प्रभाव का कारण बना।शहरी केंद्रों को प्रगति, सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों का प्रतीक होना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय वे अव्यवस्था, अतिक्रमण और असुरक्षा के प्रतीक बन गए।यह परिवर्तन इसलिए भी अधिक प्रभावशाली रहा, क्योंकि इससे मध्यम वर्ग, पेशेवरों और पहली बार वोट देने वाले मतदाता प्रभावित हुए, जो चुनाव परिणामों पर निर्णायक असर डालते हैं। अनेक शहरी मतदाताओं को महसूस हुआ कि शासन आधुनिक शहरी जीवन की आवश्यकताओं के साथ तालमेल बनाए रखने में विफल रहा है, जिससे निराशा और मोहभंग बढ़ गया।शहरों की उपेक्षा किए जाने की भावना ने प्रशासन पर विश्वास को और कमजोर किया और अंततः यह शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में प्रबल सत्ता विरोधी लहर में बदल गया।

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