अतीत की खाट पर सपनों में स्वर्ग देखता सोता भारत 

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अनिकेत सिंह 
अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक अबुल फजल की हत्या, अपनी सत्ता में बाधा बनने की खीझ में जहांगीर ने ओरछा क्षेत्र के वीरसिंह बुंदेला के माध्यम से करवाई थी। (इसीलिए ओरछा में जहांगीर पैलेस भी है, राजा राम मंदिर के साथ।) तो इस अबुल फजल ने मुसलमानों के बारे में एक टिप्पणी लिखी थी, “मुसलमान अपनी परंपरा को इतना महत्व देता है कि वह अन्य संस्कृतियों से कुछ नया सीखता ही नहीं।” उनके ही शब्दों में ‘तकलीद’ (पुरानी परंपराओं का अंधानुकरण) के कारण ‘चिराग-ए-ख़िरद’, यानी दिमाग की बत्ती, बुद्धि का बल्ब नहीं जलता।अब उन्होंने यह टिप्पणी किन मुसलमानों के संदर्भ में लिखी, यह तो राम ही जाने। लेकिन इतना पढ़कर अगर मन में सनातन का गाढ़ा केसरिया रंग लहराने लगे, तो दुख के साथ कहना पड़ेगा कि यह बात दुर्भाग्यवश पूरे देश, पूरे हिंदुस्तान पर लागू होती है! इस देश ने कभी बाहर जाकर यह जानने की जिज्ञासा ही नहीं रखी कि दुनिया में और क्या है, इसी कारण बाहर से लोग आकर यहां राज करते रहे। हमने कभी बेहतर आधुनिक शोध नहीं सीखे और बेहतर हथियारों से बाहर वालों ने हमें हराया।ओशो रजनीश बारबार कहते थे, “भारत वह देश है, जो बातें तो अज्ञात की करता है, लेकिन उसका मन अतीत से चिपका हुआ है।” बिलकुल सही बात है। अब तो हाल यह हो गया है कि पिछले दो सौ वर्षों से हमारे सुधारकों ने जो खून-पसीना बहाकर काम किया, उसकी जगह फिर से शास्त्रों में ऐसा है, शास्त्रों में वैसा है का चक्कर शुरू हो गया है। अभी लिखते समय ही एक कम उम्र की वीडियो बनाने वाली युवती का वायरल वीडियो आया कि “शास्त्रों में निर्वस्त्र होकर स्नान करना मना है। ऐसा करने वाले को दरिद्रता का सामना करना पड़ेगा और भगवान की कृपा नहीं मिलेगी।”बस, खत्म, कैसा भयभीत समाज बना लिया है हमने। हमें यह चिंता नहीं होती कि हम इतने मोबाइल इस्तेमाल करते हैं, तो हमारी कोई स्वदेशी ब्रांड अमेरिका, यूरोप, चीन या कोरिया जैसी क्यों नहीं है। लेकिन शास्त्रों में क्या मना है या क्या सही है, उसकी चिंता रहती है। सामूहिक रूप से सुस्त होती जाती समाज की यह निशानी है।read more:https://pahaltoday.com/%e2%82%b910-hike-in-frp-is-cheating-sugarcane-farmers-bhagat-singh-verma/
हम भी दुनिया में खुद को सर्वोपरि मानते हैं, “हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं” इस अहंकार को पालते हैं। लेकिन इसी मानसिकता में बिना सोचे-समझे बोलने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के एक बयान ने हमें झटका दे दिया, जिसमें उन्होंने भारत को हेलहोल यानी नरक जैसा कह दिया। और हमने औपचारिक बयान दे दिया, “यह गलत है, हम इसकी निंदा करते हैं” वगैरह।ट्रम्प ने सीधे भारत नरक है, ऐसा नहीं कहा, बल्कि संदर्भ यह था कि भारत और चीन के लोग बड़ी संख्या में अमेरिका आकर बसना चाहते हैं। बात उन चालाक माता-पिता की थी, जो जानबूझकर अपने बच्चे का जन्म अमेरिका में करवाते हैं, ताकि उसे जन्म से ही नागरिकता मिल जाए।सच तो यह है कि विदेशों में बसने के लिए भारतीयों में भारी लालसा है। “आई लव माय इंडिया” गाने वाले एनआरआई भी अंत में अमेरिका जाकर बस जाते हैं। लाखों आवेदन लंबित हैं। एच-1बी वीज़ा नीति में थोड़ा बदलाव हो जाए तो यहां लोगों की धड़कनें बढ़ जाती हैं।हम ट्रम्प जैसे नेताओं को दोष देते हैं, लेकिन असली जिम्मेदारी हमारे नेताओं की है, जिनके कारण सड़क के गड्ढे या आवारा पशुओं जैसी बुनियादी समस्याएं भी ठीक नहीं होतीं।जब गेम जोन में बच्चे जलकर मर जाए, पुल गिर जाए, नाव पलट जाए, तब भी हम आवाज नहीं उठाते। मतदाताओं का डर ही नेताओं में नहीं बचा है।जहां इंसानी जान की कोई कीमत न हो, वह जगह नरक ही कहलाएगी!अमेरिका के ऑरलैंडो शहर में एक महंगी राइड एक हादसे के बाद बंद कर दी गई, क्योंकि एक युवक की मौत हो गई थी, भले ही उसमें उसकी लापरवाही भी रही हो। लेकिन प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर पूरी राइड ही बंद कर दी।हाल ही में 2026 में सिएटल में भारतीय छात्रा जाह्नवी की पुलिस कार से मौत के मामले में अदालत ने उसके परिवार को 29 मिलियन डालर (करीब 275 करोड़ रुपए) देने का आदेश दिया।और हमारे यहां? मृतकों को दो-चार लाख की सहायता।जब आईपीएल खिलाड़ी की दो महीने की कमाई के बीसवें हिस्से जितनी भी कीमत किसी की जान की न हो, तब इसे स्वर्ग कैसे कहें?भारत में लापरवाही का आलम यह है कि निर्माण स्थल के खुले गड्ढे में बाइक सवार गिर जाए और पुलिस मजदूर को पकड़ ले। यह “अंधेर नगरी” जैसा न्याय नहीं तो क्या है?हमारे यहां जनसंख्या अधिक और जागरूकता कम है, इसलिए मानव जीवन का मूल्य गिर गया है।आतंकवादी हमले भी सिर्फ वायरल कंटेंट बन जाते हैं। बोट दुर्घटनाओं में लाइफ जैकेट तक नहीं होती। एडवेंचर स्पोर्ट्स अपने जोखिम पर ही होते हैं। जब तक अपना कोई नहीं मरता,दूसरों की मौत सिर्फ आंकड़ा है।हमारा आक्रोश फिल्मों, कपड़ों, कलाकारों, प्रेम विवाहों के लिए सुरक्षित है, लेकिन प्रदूषण, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य जैसी असली समस्याओं के लिए नहीं।यहां धर्म के नाम पर पाखंड है, लेकिन वैज्ञानिक सोच के लिए जगह नहीं। व्हाट्सएप से फैली नफरत पर लोग हीरो बन जाते हैं। यह देश वास्तविकता में नहीं, कहानियों में जी रहा है। हम सोचते हैं कि पहले लोग 100 साल जीते थे, जबकि सच उल्टा है। दवाइयों में भारी मुनाफा चलता है, लेकिन कोई विरोध नहीं। फिल्मों में पाकिस्तान को हराते देखकर खुश होते हैं, लेकिन चीन का नाम लेने से डरते हैं।चीन अंतरिक्ष में शहर बनाने के सपने देखता है और हम धार्मिक कल्पनाओं में खोए रहते हैं।हम सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से पूछते हैं, न्याय के लिए संघर्ष नहीं करते, विकास के नाम पर प्रकृति नष्ट करते हैं और फिर दोष गांधीजी को देते हैं! देश को भविष्य में नहीं, अतीत में जीना है। इमेज मैनेज करनी है, डैमेज नहीं।

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