बाल आयोग में हाल ही में राजधानी के महिला एवं बाल विकास सचिवालय से नए मुख्य कार्यकारी निदेशक बनकर आए साहब अनिमेष अग्निहोत्री बहुत ही कड़क, आधुनिक बाल संरक्षण कानूनों के विशेषज्ञ और प्रशासनिक अनुशासन के पक्के अफसर माने जाते थे। अनिमेष साहब जब भी अपनी चमकती हुई सरकारी गाड़ी से उतरकर नए स्मार्ट एडॉप्शन सेल का मुआयना करने निकलते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी चबूतरे पर बैठे मंगतराम काका पर जाकर टिक जाती थी जिनकी आँखें हमेशा उस कक्ष के भीतर रखे टूटे पालने पर जमी रहती थीं। अनिमेष साहब को बाल अधिकार दिवस के इतने बड़े भव्य सरकारी जलसे और डिजिटल प्रक्रिया के दौर में किसी फटेहाल बुजुर्ग का इस तरह रोज आकर एक मामूली टूटे पालने के आगे हाथ जोड़ना दकियानूसी सोच और दफ्तर के अनुशासन को बिगाड़ने जैसा लगता था। जब दोपहर के समय मुख्य सत्र समाप्त हुआ और बड़े-बड़े अतिथि वीआईपी लाउंज में वातानुकूलित कमरे में भोजन के लिए चले गए तो अनिमेष साहब अपने सुरक्षाकर्मियों को वहीं छोड़कर सीधे मंगतराम काका के पास पहुँच गए। अनिमेष साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तीखे लहजे में पूछा “काका आप इस उम्र में रोज यहाँ आकर मुख्य दरवाजे का रास्ता क्यों रोकते हैं, अगर आपको कोई वरिष्ठ नागरिक पेंशन या मुफ़्त राशन का फॉर्म भरना है तो भीतर काउंटर पर जाइए, इस तरह बाहर बैठकर एक टूटे लकड़ी के पालने को घूरने से इस देश के अनाथ बच्चों की तकदीर नहीं बदलने वाली है।” मंगतराम काका ने बहुत ही शालीनता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपती आवाज में बोले “निदेशक साहब मैं किसी पेंशन या भीख के लिए यहाँ नहीं बैठा हूँ, मैं तो बस उस दिन की बाट जोह रहा हूँ जब इस पालने पर वह खोया हुआ बचपन लौटेगा जो किसी जमाने में इसी चौखट पर मुझसे छीना गया था।”read more:https://worldtrustednews.in/agricultural-productivity-and-income-of-food-providers-to-increase-in-21-districts-of-eastern-uttar-pradesh-and-7-districts-of-bundelkhand-chief-minister/अनिमेष साहब को काका का यह जवाब किसी दार्शनिक पहेली जैसा लगा और उन्होंने अचरज से पूछा “काका आप किस खोए हुए बचपन की बात कर रहे हैं, सरकार तो हर साल इस बाल अधिकार दिवस पर करोड़ों का बजट जारी करके अनाथ बच्चों के लिए हाईटेक शेल्टर होम और सुगम गोद लेने की व्यवस्था कर रही है, फिर आपके इस पुराने लकड़ी के पालने का क्या रहस्य है?” पास खड़े वयोवृद्ध सेवानिवृत्त बाल कल्याण अधिकारी पंडित सोमेश्वर जी जो पिछले चालीस सालों से उस केंद्र के हर अनाथ बच्चे और हर विधिक प्रक्रिया के गवाह रहे थे, वे तुरंत आगे बढ़े और बोले “साहब काका की बात को पागलपन मत समझिए, जब बीस साल पहले इस पूरे इलाके में गरीब लावारिस बच्चों को अवैध मानव तस्करी और बाल श्रम की भट्टियों में झोंका जाता था तब काका के इकलौते बेटे मानस ने इसी कक्ष में खड़े होकर बच्चों के अधिकारों की सबसे बड़ी बगावत की थी।” अनिमेष साहब ने उत्सुक होकर पूछा “मानस ने ऐसा क्या किया था जिसका नाता आज तक इस टूटे पालने से जुड़ा हुआ है?” पंडित सोमेश्वर ने एक लंबी साँस भरकर बताना शुरू किया “साहब मानस उस समय पूरे प्रदेश का सबसे मेधावी और स्वाभिमानी युवा बाल अधिकार कार्यकर्ता था, जब रसूखदार लोग लावारिस बच्चों को खरीदकर उनसे कारखानों में मजदूरी कराते थे तब मानस ने अपनी जान जोखिम में डालकर सैकड़ों बच्चों को मुक्त कराया था और इसी पालने को सुसज्जित करके बच्चों को नया जीवन दिया था, उसने इस पालने को दफ्तर में रखकर कसम खाई थी कि जब तक इस देश के आखिरी अनाथ बच्चे को सुरक्षित परिवार नहीं मिल जाएगा तब तक वह किसी भ्रष्ट सिंडिकेट के आगे घुटने नहीं टेकेगा।”मंगतराम काका ने सोमेश्वर जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से उस टूटे पालने के किनारे को छुआ और बहुत ही मार्मिक स्वर में बोले “हाँ साहब मेरे मानस ने उस दिन इसी कक्ष में खड़े होकर मुझसे कहा था कि बापू यह पालना केवल लकड़ी का ढांचा नहीं बल्कि बेसहारा बचपन का सबसे पहला और आखिरी घर है, उसने वादा किया था कि जिस दिन वह दिल्ली से राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का सबसे सख्त सजा कानून लेकर लौटेगा उस दिन वह खुद आकर इस पालने की मरम्मत कराएगा और अपने हाथों से मुझे देश के सबसे बड़े मंच पर मुख्य अतिथि बनाएगा।” अनिमेष साहब के मन में एक गहरा कौतूहल जाग उठा और उन्होंने तुरंत अभिलेखागार में जाकर उस बीस साल पुरानी बाल अधिकार संघर्ष की मूल फाइल को खंगाला। जैसे ही अनिमेष साहब ने उस गोपनीय फाइल के आखिरी पन्नों को पढ़ा, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि उसमें साफ लिखा था कि बीस साल पहले जब मानस ने बाल तस्करी और अवैध गोद लेने वाले बड़े सिंडिकेट की पोल खोली थी तो देश की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी और फर्जी एडॉप्शन लॉबी ने उस आंदोलन को कुचलने के लिए मानस को अपनी ग्लोबल चाइल्ड केयर कॉर्पोरेशन का मुख्य कार्यकारी अधिकारी और पच्चीस प्रतिशत की गुप्त साझेदारी देकर खरीद लिया था। मानस ने अपने सारे आदर्शों और उस पालने का वास्ता ताक पर रखकर उन तस्करी के अनुबंधों पर दस्तखत कर दिए और उसी पैसे के दम पर देश का सबसे बड़ा अरबपति बाल तस्कर टाइकून बन गया जो आज लावारिस बच्चों को विदेशों में अमीर दंपत्तियों को लाखों रुपए में बेचने का सबसे बड़ा सिंडिकेट चला रहा था। अनिमेष साहब जब कांपते कदमों से बाहर आए और उन्होंने रुँधे गले से काका से कहा कि मानस तो खुद मासूमों की जिंदगी का सबसे बड़ा सौदागर बन चुका है, तो काका ने रोते हुए कहा “साहब मुझे सब पता था कि मेरा बेटा बिक चुका है, मैं तो रोज यहाँ यह देखने आता हूँ कि जो लोग मंच पर बैठकर बाल अधिकार दिवस पर बच्चों की सुरक्षा का पाखंड करते हैं, जब वे अपनी ही जड़ों और अपने ही बाप के इस टूटे पालने को मुनाफे के बाजार में बेचकर बेकसूर बच्चों की सांसों का सौदा करते हैं तो क्या इस बहरे समाज को उस बिकी हुई मासूमियत के कफन से उठती हुई बदबू का अहसास होता है या नहीं।” अनिमेष साहब सुन्न होकर उस कक्ष के कोने में रखे टूटे पालने को ताकते रह गए और पूरा बाल आयोग उस बेबस पिता के आंसुओं के सन्नाटे में डूबकर शर्मसार हो गया।