जे. पी. भारद्वाज की स्मृति में ‘म्हारा हरियाणा और विवाह संस्कार’ पुस्तक का विमोचन और चर्चा का आयोजन

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नई दिल्ली,दिल्ली विश्वविद्यालय में जे. पी. भारद्वाज जी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में ‘म्हारा हरियाणा और विवाह संस्कार’ पुस्तक का विमोचन और चर्चा का आयोजन किया गया. यह पुस्तक प्रो. सरला भारद्वाज और डॉ. रजनी ने संयुक्त रूप से लिखी है. इस अवसर पर आयोजित समारोह में शिक्षा जगत, साहित्य, समाजसेवा और कला क्षेत्र की मूर्धन्य हस्तियों ने उपस्थिति दर्ज कराई। प्रो. सरला भारद्वाज ने हरियाणा और दिल्ली सूबे के ऐतिहासिक, साहित्यिक और सामाजिक योगदान पर अपने विचार व्यक्त किए और लोक-विरासत को सुरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल दिया।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के साँस्कृतिक परिषद के चेयरमैन प्रो. अनूप लाठर उपस्थित थे. प्रो. लाठर ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1911 में कोलकाता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित किए जाने तक के ऐतिहासिक घटनाक्रमों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दिल्ली और हरियाणा का संपूर्ण भू-भाग अनगिनत देशभक्तों की कुर्बानियों और संघर्ष का गवाह रहा है .उन्होंने आधुनिक मैरिज पैलेस संस्कृति के कारण पारंपरिक गीतों और वैवाहिक उत्सवों के लुप्त होने पर चिंता व्यक्त की। प्रो. लाठर ने पुस्तक में संकलित 150 से अधिक तालों और पार पारंपरिक गीतों के संग्रह को हरियाणवी लोक-विरासत की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया। यह पुस्तक हरियाणा की वैवाहिक रस्मों के पीछे छिपे गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दर्शन को बहुत ही सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उजागर करती है. पुस्तक में जीवन मूल्यों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा से पहले संस्कार, व्यापार से पहले व्यवहार, तथा धन से पहले माता-पिता का स्थान सर्वोपरि होना चाहिए। इसमें ब्रह्म विवाह को सर्वोच्च श्रेणी में रखते हुए गोत्र चयन की वैज्ञानिकता, लाल चिट्ठी और पीली चिट्ठी भेजने की परंपरा से लेकर विवाह के दौरान संपन्न होने वाले भात, फेरे, चाकी, बरात, खोरिया, छन्द कहना, जूते छिपाना, कंगना खेलना और मुँहदिखाई जैसी सदियों पुरानी लोक-रीतियों का गहन विवेचन किया गया है।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteविशिष्ट अतिथि श्रीमती अनीता शर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के संदर्भ में क्षेत्रीय भाषाओं और लोक-साहित्य के संरक्षण पर प्रकाश डाला। पुस्तक की समीक्षा करते हुए नीलम पाराशर जी ने कहा कि यह पुस्तक हरियाणवी संस्कृति का एक पावन ग्रंथ है, जिसे प्रत्येक परिवार को अपने घर के पूजा स्थल पर सहेज कर रखना चाहिए ताकि आने वाली भावी पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।पूर्व कुलपति प्रो. पी. सी. पतंजलि ने भी लेखिकाओं के इस भगीरथ प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि यह कृति हरियाणवी संस्कृति को सदा-सदा के लिए अजर-अमर बना देगी।समारोह की अध्यक्षता विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की विभिन्न प्रतिष्ठित समितियों का नेतृत्व करने वाली वरिष्ठ शिक्षाविद प्रो. सुषमा यादव ने की. विवाह के पश्चात महिलाओं की बढ़ती जिम्मेदारियों और सामाजिक भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने इस पुस्तक को महिला सशक्तिकरण और पारिवारिक मूल्यों का संवाहक बताया।प्रो. सरला भारद्वाज ने अपने संबोधन मे कहा कि हरियाणा स्पष्ट वक्ताओं का प्रदेश है । जो उनके मन में होता ही वही उजागर करते हे ।कहावत है कि भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में तो बांसुरी बजाई और हरियाणा में बांस बजाए । यही हरियाणा की स्पष्ट वादिता है ।उन्होंने उन सब बहनों का धन्यवाद जिन्होंने समय समय पर पुस्तक को तैयार करने में मदद की ।डॉ. रजनी ने अपने संबोधन में बताया कि उनका पूरा जीवन हरियाणवी संस्कृति, नाटक और लोकगीतों के संरक्षण एवं संवर्धन में व्यतीत हुआ है, और यही आत्मीयता इस पुस्तक के हर पृष्ठ पर दृष्टिगोचर होती है।डॉ विनीता ने मंच संचालन किया। उन्होंने संवाद के माध्यम से बताया कि की अंधी दौड़ में हमारी लोक-संस्कृति कहीं विलुप्त न हो जाए। कार्यक्रम के अंत में प्रो. सरला भारद्वाज ने पधारे सभी अतिथियों,विद्वत समाज और विद्यार्थियों का धन्यवाद किया. इस अवसर पर प्रोफेसर बिजेंद्र कुमार, प्रो सुनीता मलिक, डॉ अर्चना माथुर, प्रो मोनिका सहित अनेक शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित थे

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