डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
ज़िला खेल परिसर के मुख्य प्रशासनिक भवन के बाहर कंक्रीट की सीढ़ियों पर पचहत्तर साल के रघुवीर दादा हर शनिवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाते थे। उनके कांपते हाथों में शीशम की लकड़ी वाली एक पुरानी टूटी हुई हॉकी स्टिक और फीते से बंधा एक जंग लगा पीतल का मेडल हमेशा रहता था जिसे वे अपनी मैली धोती के छोर से बार-बार पोंछते रहते थे। आज उनतीस अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के भव्य उत्सव के मौके पर जब सुरक्षा गार्ड ने उन्हें मुख्य द्वार पर बैठा देखा तो अपनी सीटी बजाते हुए ठहाका लगाकर बोला कि “दादा जब आज पूरे देश में मेजर ध्यानचंद की जयंती और राष्ट्रीय खेल दिवस का जश्न मनाया जा रहा है और बड़े-बड़े खिलाड़ी सम्मानित हो रहे हैं तो इस टूटी लकड़ी की छड़ी को रोज़ अपनी छाती से चिपकाकर यहाँ क्या भीख मांगने का नया तमाशा खड़ा करते हो।” रघुवीर दादा अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती से साफ़ करते और बहुत धीमी आवाज़ में मुस्कुराकर कहते कि “बेटा यह टूटी स्टिक केवल लकड़ी का टुकड़ा नहीं है बल्कि इस पूरे खेल महकमे की वो अंधी संवेदनहीनता है जिसने मैदान के पसीने को कागज़ों की स्याही में दफ़न कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम दलाल और कोच उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में दादा की मति मारी गई है जो राष्ट्रीय खेल दिवस के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चले आए हैं।” रघुवीर दादा किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस मेडल को अपनी कांपती उंगलियों से सहलाते और चुपचाप वीआईपी गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करते रहते थे।खेल विभाग के सभी बाबू और प्रशिक्षक रघुवीर दादा की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से भलीभांति वाकिफ़ हो चुके थे और उन्हें एक सनकी बुज़ुर्ग मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी विजेता खिलाड़ियों की सूची लेकर खेल अधिकारी के केबिन की तरफ बढ़ता तो रघुवीर दादा बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़े हो जाते और हाथ जोड़कर कहते कि “बाबू जी क्या आज उस राष्ट्रीय खिलाड़ी पेंशन और इलाज वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फ़ाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे दादा जब तक खेल निदेशालय से बजट नहीं आएगा और ऑनलाइन पोर्टल पर तुम्हारा नाम सत्यापित नहीं होगा तब तक फूटी कौड़ी नहीं मिलेगी और तुम इस टूटी लकड़ी को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटते रहोगे।” रघुवीर दादा बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जाते और उस टूटी हॉकी स्टिक के जोड़ को अपनी हथेली से छूने का निरर्थक प्रयास करने लगते थे जो हर बार हिलकर अलग हो जाती थी। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते थे कि शायद दादा अपने किसी पुराने भत्ते के लिए यह सब कर रहे हैं लेकिन किसी को भी उस टूटी स्टिक और खेल दिवस के इस भव्य आयोजन के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।दोपहर में अचानक सूबे के खेल एवं युवा कल्याण मंत्री महोदय राष्ट्रीय खेल दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित राज्य स्तरीय पुरस्कार वितरण समारोह का उद्घाटन करने खेल परिसर पहुँचे। मंत्री जी की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे स्टेडियम में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए फ्लेक्स बोर्ड और लाल कालीन बिछाया जाने लगा ताकि कोई कमी न दिखाई दे।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/मंच पर दीप प्रज्वलन और देश के खिलाड़ियों के मान-सम्मान पर लंबा भाषण देने के बाद जब मंत्री जी पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र सीढ़ियों पर शांत बैठे रघुवीर दादा पर पड़ी जिनकी गोद में वही टूटी स्टिक रखी थी। अपनी संवेदनशील और जनप्रिय छवि का प्रदर्शन करने के लिए मंत्री जी तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर रघुवीर दादा के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “दादा आज राष्ट्रीय खेल दिवस पर हम देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको खेल योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” रघुवीर दादा ने अपनी पथराई आँखों से मंत्री जी को देखा और अपने कांपते हाथों से वह टूटी स्टिक और जंग लगा मेडल आगे बढ़ाते हुए बोले कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस मेडल के पीछे खुदी हुई प्रतियोगिता और इस टूटी स्टिक का सच पहचान लीजिए।”मंत्री जी ने जब उस मेडल को हाथ में लेकर उलटकर देखा तो उस पर चालीस साल पहले देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली राष्ट्रीय टीम का नाम और खुद रघुवीर दादा का नाम बतौर कप्तान दर्ज था। रघुवीर दादा की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस ठंडे मेडल पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोले कि “साहब चालीस साल पहले जब मैंने अपने देश के लिए यह स्वर्ण पदक जीता था तब अफ़सरों ने मुझे सिर-आँखों पर बिठाया था। लेकिन जब मेरा अठारह साल का पोता राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए ट्रायल देने गया तो आपके इसी दफ़्तर के चयनकर्ताओं ने उससे लाखों रुपये की घूस मांगी और जब वह पैसे नहीं दे पाया तो चयनकर्ताओं ने गुस्से में आकर उसके पैरों पर वार करके उसकी यह स्टिक तोड़ दी जिससे वह ताउम्र के लिए मैदान से बाहर हो गया और आज चाय की दुकान पर जूठे बर्तन मांज रहा है। मैं रोज़ यह टूटी स्टिक यहाँ इसलिए लाता हूँ ताकि आपके इस मंच को बता सकूँ कि जिस देश में खेल दिवस पर अरबों रुपये के विज्ञापन बांटे जाते हैं उसी देश में एक राष्ट्रीय कप्तान का पोता रिश्वत न दे पाने के जुर्म में अपने टूटे सपनों के साथ ज़िंदा लाश बनकर घूम रहा है।” यह सुनते ही मंत्री जी का सिर शर्म से झुक गया और पूरा खेल परिसर गहरे सन्नाटे में डूब गया।