डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
मिश्रा जी ने अपनी मेहनत की कमाई से एक बहुत बड़ा बंगला बनवाया। बैठक में दो लाख का इटालियन सोफा रखा गया, जिस पर बैठते ही इंसान धंस जाता था। मिश्रा जी की पत्नी ने सख्त हिदायत दी थी— “इस सोफे पर कोई बच्चा नहीं चढ़ेगा और कोई मेहमान चाय नहीं पिएगा।” घर का ‘संस्कार’ अब सोफे की हिफाजत बन गया था। मिश्रा जी के बूढ़े पिता, जो गांव से आए थे, उस सोफे पर बैठने से डरते थे। वे घर के कोने में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे रहते। एक दिन घर में एक बड़ा ‘किटी पार्टी’ का आयोजन हुआ। मिश्रा जी की पत्नी ने सबको अपने ‘संस्कार और संस्कृति’ पर लेक्चर दिया, जबकि बूढ़े पिता को पिछवाड़े के कमरे में छिपा दिया गया ताकि वे ‘एस्थेटिक्स’ न बिगाड़ें। पार्टी में सबने ‘वेस्टर्न म्यूजिक’ पर ‘संस्कारी डांस’ किया और विदेशी वाइन के साथ ‘भारतीय मूल्यों’ पर चर्चा की। अचानक बूढ़े पिता बाहर आ गए और उन्होंने एक मेहमान से पानी मांग लिया। मिश्रा जी की पत्नी का चेहरा उतर गया। पार्टी खत्म होने के बाद उन्होंने मिश्रा जी से कहा, “इन्हें वापस गांव छोड़ आइए, ये हमारे ‘स्टैंडर्ड’ को सूट नहीं करते।” मिश्रा जी ने चुपचाप सिर झुका लिया।’read more:https://pahaltoday.com/the-government-is-considering-increasing-the-pension-limit-to-rs-10000-per-month/ कुछ सालों बाद, मिश्रा जी का बेटा बड़ा हुआ। उसने मिश्रा जी और उनकी पत्नी को एक ‘ओल्ड एज होम’ में भर्ती करवा दिया। जब मिश्रा जी ने विरोध किया, तो बेटे ने शांति से कहा, “पापा, आप नए सोफे के साथ मैच नहीं कर रहे थे। और हाँ, मैंने सोफा ‘ओएलएक्स’ पर बेच दिया है, अब वहां मेरा ‘गेमिंग कंसोल’ रखा जाएगा।” मिश्रा जी को उस दिन समझ आया कि उन्होंने घर की दीवारों को तो मजबूत किया, पर उन रिश्तों की नींव को ‘डिजाइनर फर्नीचर’ के नीचे दबा दिया था। अब वहां केवल सोफे की गंध थी, अपनों की गर्माहट नहीं।