मध्य पूर्व में भारत-चीन की भू-राजनीतिक होड़

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चीन के साथ भारत का सीमा संघर्ष मध्य पूर्व में दो एशियाई शक्तियों के बीच व्यापक टकराव में बदल रहा है। चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी का ढोल पीटते हुए  ईरान ने जाहिर तौर पर ईरान के चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान से जोड़ने वाली रेलवे परियोजना में भारत की भावी भूमिका को रद्द कर दिया है। मध्य पूर्व के एक अन्य प्रमुख क्षेत्रीय खिलाड़ी तुर्किये के कश्मीर पर भारत के खिलाफ पाकिस्तान का साथ देने के कारण भारत से सम्बन्ध बिगड़े हैं। चीन के मुकाबले भारत के लिए बदलते भू-राजनीतिक समीकरण नई दिल्ली को संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अधिक निकटता से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हालांकि नई दिल्ली को चीन के खिलाफ अपने संघर्ष में इच्छुक क्षेत्रीय साझेदारों को खोज कर अपने साथ जोड़ना होगा।मध्य पूर्व में भारत की हालिया परेशानियां, पूरे नहीं तो आंशिक रूप से ही सही  पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से उत्पन्न होती दिखाई देती हैं। ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स ट्रैकर के अनुसार, 2005 और 2019 के बीच चीन ने मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में 55 अरब  डॉलर से अधिक का निवेश किया। इसके अलावा एडडेटा रिसर्च लैब से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2004 और 2014 के बीच चीन ने इस क्षेत्र को लगभग 42।8 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की। क्षेत्र के कई देशों के लिए चीन उनका शीर्ष व्यापारिक भागीदार होने के साथ ही प्रौद्योगिकी तथा सशस्त्र ड्रोन का एक प्रमुख स्रोत है।
ईरान ऐसा ही एक क्षेत्रीय खिलाड़ी है जहाँ भारत का प्रभाव चीन के पक्ष में कम हो रहा है। चीन के साथ ईरान के व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौते का कथित मसौदा सार्वजनिक रूप से लीक होने के कुछ ही दिनों बाद  ईरान ने एक रेलवे लिंक के निर्माण के साथ आगे कदम बढ़ाया जो ईरान के चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान के जरंज प्रांत से जोड़ता है। इससे भारत के इस परियोजना में भाग लेने की संभावनाओं पर पानी फिर गया। भारत ने चाबहार बंदरगाह में  10 साल की अवधि में 15 करोड़ डॉलर तक निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई थी। अब उसे एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में दर्शाया गया है, जो भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की “मोतियों की माला” का मुकाबला करने और ग्वादर में पास ही चीन द्वारा निर्मित पाकिस्तान के बंदरगाह के साथ प्रतिस्पर्धा करने में मदद करेगी। नई दिल्ली के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों ने ईरान पर चीन के बढ़ते प्रभाव को तेहरान के इस कदम के असली कारण के रूप में  देखा। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्वीट किया, “चीन ने चुपचाप काम किया लेकिन उन्हें बेहतर सौदा दिया। भारत के लिए बड़ा नुकसान।” समझौते के लीक हुए पाठ के अनुसार, चीन 25 साल की अवधि में ईरान में 400 अरब अमरीकी डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताएगा।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/इस बीच मध्य पूर्व में एक अन्य क्षेत्रीय शक्ति तुर्किये के साथ भी भारत के संबंध बिगड़े हैं। वहाँ भी चीन का  जबरदस्त आर्थिक प्रभाव है। दरअसल  तुर्किये की चीन से यह निकटता कोविड-19 महामारी के समय से ही है जब  तुर्किये ने निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए चीन का दमन पकड़ा था। उस समय तुर्किये  ने एक  अरब डॉलर के मुद्रा विनिमय समझौते के तहत चीन के केंद्रीय बैंक द्वारा विस्तारित चालीस करोड़ डॉलर  मूल्य की फंडिंग सुविधा का उपयोग किया। तुर्की बिल्डिंग एंड रोड इनिशिएटिव (बी।आर।आई।) की ट्रांस-यूरेशियाई कनेक्टिविटी की महत्वाकांक्षा के एक केंद्रीय घटक के रूप में भी दिखाई देता है, जो तुर्की के परिवहन, रसद, ऊर्जा और दूरसंचार क्षेत्रों में बड़े चीनी निवेश का अभिलाषी है। अपनी आर्थिक पहुंच के कारण चीन तुर्किये  के शिनजियांग क्षेत्र के मूल निवासी तुर्क मुस्लिम उइगरों के लिए अंकारा के समर्थन को बेअसर करने में सफल रहा है। पिछले दिनों  तुर्किये में उइगर शरणार्थियों ने तुर्की अधिकारियों द्वारा बढ़ते उत्पीड़न का सामना करने पर क्षोभ जताया है। दरअसल तुर्किये चीन के प्रमुख सहयोगी पाकिस्तान और मलेशिया के साथ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द करने की भारत की कार्रवाई की निंदा करने में शामिल हो गया । भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के इतर अंकारा के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के साथ कूटनीतिक रूप से जुड़कर तुर्की से नौसेना जहाजों को खरीदने के 2।32  अरब डॉलर के अनुबंध को रद्द करके  और तुर्किये के प्रतिद्वंद्वी आर्मेनिया को सैन्य रडार की आपूर्ति के लिए चार करोड़  डॉलर की बोली हासिल करके जवाब दिया।चीन की सैन्य और आर्थिक ताकत का मुकाबला करने में असमर्थ  भारत तेजी से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने में लगा हुआ है। चीन के साथ सीमा झड़पों ने पहले ही नई दिल्ली में कई लोगों को वाशिंगटन के साथ अधिक निकटता से जुड़ने में अपने देश की पारंपरिक अनिच्छा को छोड़ने की वकालत करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसी तरह का तर्क मध्य पूर्व पर भी लागू कहा जा सकता है, जहाँ चीन की गहरी जेब और बढ़ता प्रभाव भारत के प्रभाव को कम करता नजर आता है। संतुलन को फिर से बनाने के लिए  नई दिल्ली इसलिए चीन के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करने में अमेरिका से हाथ मिलाने के लिए विवश है।जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के अनुभव से पता चलता है, हालांकि, नई दिल्ली को मध्य पूर्व में चीन के साथ अपने व्यापक टकराव में इच्छुक साझेदार खोजने में कठिनाई होगी। उनका शीर्ष सुरक्षा भागीदार होने के बावजूद  वाशिंगटन इजरायल और खाड़ी राजशाहियों को चीन से दूर रखने के लिए संघर्ष करता रहा है, जिसे वे निवेश, प्रौद्योगिकी और हथियारों के क्षेत्र में एक आकर्षक भागीदार के रूप में देखते हैं। हालांकि भारत इजरायल और खाड़ी राजशाहियों के साथ घनिष्ठ संबंधों का आनंद लेता है – और 2014 में मोदी के पद संभालने के बाद से संबंधों में काफी सुधार हुआ है – यह संभावना नहीं है कि वह चीन के साथ अधिक सहयोग की उनकी भूख को रोकने में संयुक्त राज्य अमेरिका से अधिक सफल साबित होगा। इति/
—-रवीन्द्र दुबे

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