बैंक की शाखा में हर महीने की पहली तारीख को सत्तर साल के भवानी शंकर अपने फटे कुर्ते की जेब से हरे रंग की पुरानी पेंशन पासबुक निकालकर कतार में सबसे आगे खड़े हो जाते थे। उस पासबुक पर जमी धूल को वे अपनी धोती के पल्ले से बार-बार पोंछते और उसे किसी अनमोल दस्तावेज़ की तरह सहलाते रहते थे। बैंक का युवा मैनेजर जब भी उन्हें काउंटर पर देखता तो चिढ़कर कहता कि “बाबा आपकी पेंशन हर महीने सीधे खाते में जमा हो जाती है तो आप रोज़ सुबह यहाँ आकर पासबुक की छपाई का हठ क्यों पकड़ लेते हैं।” भवानी शंकर अपनी झुकी हुई कमर को सीधा करने का प्रयास करते और बहुत शांत स्वर में उत्तर देते कि “बेटा इस कागज़ पर जब तक काली स्याही से लिखावट नहीं छपेगी तब तक मेरे मन को तसल्ली नहीं मिलेगी।” पास खड़े गाँव के लोग उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “मासाब को लगता है कि बैंक वाले उनकी पेंशन की एंट्री छिपाकर रख लेंगे।” दफ़्तर का चपरासी भी हँसते हुए तंज कसता कि “बाबा जब खाते में कुछ होगा ही नहीं तो मशीन बेचारी क्या छापेगी।” भवानी शंकर बिना किसी की बात का बुरा माने उस धूल भरी पासबुक को अपनी छाती से चिपकाए चुपचाप कुर्सी पर अपनी बारी का इंतज़ार करते रहते थे।भवानी शंकर का यह सिलसिला पिछले दो वर्षों से लगातार जारी था चाहे तपती धूप हो या हाड़ कंपाने वाली ठंड। बैंक के कर्मचारी उन्हें एक सनकी और हठी बुज़ुर्ग मान चुके थे जो बिना किसी काम के रोज़ दफ़्तर का माहौल भारी कर देता था। एक दिन जब बैंक में बहुत भीड़ थी और सर्वर डाउन होने के कारण लोग हंगामा कर रहे थे तब भी भवानी शंकर शांत भाव से एक कोने में बैठे अपनी पासबुक को निहार रहे थे। मैनेजर ने तंग आकर उन्हें अपने केबिन में बुलाया और मेज़ पर हाथ पटकते हुए कहा कि “बाबा आप रोज़ यहाँ आकर मेरा समय खराब करते हैं अगर आपको अपनी पासबुक छपवाने का इतना ही शौक है तो किसी प्राइवेट बैंक में खाता खुलवा लीजिए।” भवानी शंकर ने अपनी कांपती उंगलियों से चश्मा ठीक किया और बड़े आत्मीय भाव से बोले कि “साहब जी मैं यहाँ अपनी पेंशन के पैसे निकालने नहीं आता हूँ बल्कि अपने स्वाभिमान की हाज़िरी लगाने आता हूँ।” मैनेजर ने अचरज से उन्हें देखा और पूछा कि “अगर पैसे नहीं निकालने तो इस पासबुक में ऐसा क्या राज़ दबा है जिसे देखने के लिए आप इतने उतावले रहते हैं।”read more:https://pahaltoday.com/cmo-saved-the-lives-of-passengers-injured-in-a-road-accident/भवानी शंकर ने अपनी पासबुक को बहुत सहेजकर मैनेजर की मेज़ पर रख दिया और कहा कि “साहब ज़रा इस पासबुक के पिछले पन्नों को पलटकर देखिए।” मैनेजर ने अनिच्छा से पासबुक खोली और जैसे ही उसने पन्ने पलटना शुरू किया उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उस पासबुक में पिछले दो सालों से हर महीने पाँच सौ रुपये जमा होने की एंट्री दर्ज थी लेकिन वह पैसा सरकार की तरफ से नहीं आ रहा था बल्कि भवानी शंकर अपनी आधी पेंशन में से काटकर जमा करा रहे थे। मैनेजर ने भौंचक्का होकर पूछा कि “बाबा आप अपनी ही पेंशन का आधा पैसा वापस सरकार के खाते में क्यों जमा कर रहे हैं।” भवानी शंकर ने एक गहरी साँस ली और भरे गले से कहा कि “दो साल पहले सरकार ने कागजी गड़बड़ी के कारण मेरे पड़ोसी रामसरन की पेंशन बंद कर दी थी क्योंकि उसके पास पहचान पत्र नहीं था। वह बूढ़ा हर दिन भूख से तड़पता था इसलिए मैंने अफ़सरों से झूठ बोलकर अपनी पेंशन का आधा हिस्सा उसके नाम से जमा करवाना शुरू किया ताकि बैंक से उसे मदद मिल सके।”भवानी शंकर ने बहते आंसुओं को पोंछते हुए आगे कहा कि “आज सुबह ही उस गरीब रामसरन का निधन हो गया और वह बिना किसी सरकारी मदद के इस दुनिया से चला गया। मैं तो बस आज यह देखने आया था कि क्या मेरे इस फटे बहीखाते में दर्ज ईमानदारी उस बेबस इंसान की भूख को मिटा सकी या सरकारी व्यवस्था ने उसे भी एक कागजी एंट्री बनाकर छोड़ दिया।” यह सुनते ही बैंक के केबिन में सन्नाटा पसर गया और मैनेजर की आँखों से आंसुओं के कतरे छलककर उस पुरानी पासबुक पर गिर पड़े। बाहर खड़े कर्मचारी और शिकायत करने वाले लोग शर्म से पानी-पानी हो गए क्योंकि जिस बूढ़े को वे सनकी समझ रहे थे वह एक भूखे इंसान के लिए अपने जीवन की कमाई लुटा रहा था। मैनेजर ने तुरंत उठकर भवानी शंकर के पैर छू लिए और उस धूल भरी पासबुक को अपने माथे से लगा लिया जहाँ व्यवस्था की संवेदनहीनता के सामने एक बुजुर्ग का निःस्वार्थ प्रेम जीत चुका था।