मनुष्य स्वयं के कर्मों का श्रेष्ठ और सर्वोच्च निर्णायक होता है। अच्छे कार्यों के श्रेष्ठ परिणाम

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 मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी विजय बाहर नहीं, भीतर होती है। अक्सर हम दुनिया को बदलने, समाज को सुधारने और दूसरों को सही ठहराने में लगे रहते हैं, परंतु एक सत्य हमेशा हमारे सामने खड़ा रहता है यदि हमने स्वयं को नहीं जीता, तो हमने कुछ भी नहीं जीता। पहले स्वयं को जीतिए, फिर जग को जीतिए,यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का मूल मंत्र है। क्योंकि मनुष्य का मन ही उसके किए गए कार्यों का सर्वोच्च निर्णायक होता है। यदि मन के भीतर ईमानदारी नहीं है, तो बाहरी सफलता भी खोखली प्रतीत होती है। महात्मा गांधी ने कहा था, “आप स्वयं वह परिवर्तन बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” यह कथन हमें स्पष्ट संकेत देता है कि किसी भी परिवर्तन की शुरुआत बाहर से नहीं, भीतर से होती है। जब तक हम अपने विचारों, अपने कर्मों और अपने चरित्र को नहीं सुधारते, तब तक समाज को सुधारने की बात केवल एक आदर्श कल्पना बनकर रह जाती है। गांधी जी ने अपने जीवन में सत्य और अहिंसा का पालन पहले स्वयं किया, तभी वे करोड़ों लोगों के प्रेरणा स्रोत बने। इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद का यह विचार भी अत्यंत प्रेरणादायक है “उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति की पहली शर्त क्या है? स्वयं के भीतर की कमजोरी, आलस्य और भ्रम पर विजय प्राप्त करना।read more:https://pahaltoday.com/india-helps-maldives-which-is-facing-economic-crisis-releases-first-installment-of-rs-30-billion/ विवेकानंद जी ने युवाओं को यह सिखाया कि आत्मबल ही सबसे बड़ी शक्ति है। जब मनुष्य अपने मन को नियंत्रित कर लेता है, तब उसके लिए कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रहता। मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, उसका अपना भ्रम, उसकी अपनी असत्यता होती है। जब हम स्वयं से झूठ बोलते हैं अपने दोषों को छिपाते हैं, अपनी कमियों को नजरअंदाज करते हैं तब हम अपने विकास के मार्ग को स्वयं ही अवरुद्ध कर देते हैं।  भगवान बुद्ध ने कहा था, “आप खुद ही अपने दीपक बनिए।” इसका अर्थ यही है कि आत्मचिंतन और आत्मसत्य ही वह प्रकाश है, जो हमें सही दिशा दिखाता है। यदि हम अपने भीतर के अंधकार को स्वीकार नहीं करेंगे, तो प्रकाश की खोज भी अधूरी रह जाएगी। समाज में श्रेष्ठ और महान लोग वही बने हैं, जिन्होंने पहले स्वयं को जीता। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन इसका सजीव उदाहरण है। एक साधारण परिवार से उठकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचना केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम नहीं था, बल्कि उनकी आंतरिक अनुशासन, ईमानदारी और आत्मविश्वास का फल था। उन्होंने कहा था, “सपने वो नहीं जो हम सोते समय देखते हैं, सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।” यह सपना तभी साकार होता है, जब हम अपने भीतर की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का साहस रखते हैं। इसी तरह नेल्सन मंडेला ने अपने जीवन में 27 वर्ष जेल में बिताए, परंतु उन्होंने अपने भीतर की नफरत को जीत लिया। उन्होंने कहा था, “मैं कभी हारता नहीं, या तो जीतता हूँ या सीखता हूँ।” यह दृष्टिकोण केवल वही व्यक्ति अपना सकता है, जिसने स्वयं को साध लिया हो। मंडेला की यह आंतरिक विजय ही उन्हें एक महान नेता बनाती है। जब हम समाज में देखते हैं, तो पाते हैं कि जो लोग ईमानदारी, सच्चाई और आत्मसंयम के मार्ग पर चलते हैं, वही सच्चे अर्थों में सफल होते हैं। सफलता केवल धन, पद या प्रसिद्धि नहीं है; सफलता वह शांति है, जो हमें अपने भीतर मिलती है। यदि हमारा मन हमें दोषी ठहराता है, तो दुनिया की कोई भी प्रशंसा हमें संतुष्ट नहीं कर सकती। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने मन के सामने सच्चे रहें। आज के समय में, जब प्रतिस्पर्धा और दिखावे की होड़ बढ़ती जा रही है, तब स्वयं से सत्य बोलना और भी कठिन हो गया है। हम अक्सर दूसरों को प्रभावित करने के लिए एक ऐसा चेहरा बना लेते हैं, जो हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं होता। लेकिन यह दिखावा अधिक समय तक नहीं टिकता। अंततः हमें अपने भीतर लौटना ही पड़ता है, और वहीं हमारा असली सामना होता है। यदि हम उस क्षण में स्वयं को सच्चा पाते हैं, तो वही हमारी सबसे बड़ी जीत होती है। इसलिए, हमें यह समझना होगा कि जीवन की असली दौड़ दूसरों से आगे निकलने की नहीं, बल्कि स्वयं से बेहतर बनने की है। हर दिन अपने आप से एक प्रश्न पूछिए क्या मैं आज कल से बेहतर बना हूँ? क्या मैंने अपनी किसी कमजोरी पर विजय प्राप्त की है? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो आप सही दिशा में हैं। अंत में, यही कहना उचित होगा कि स्वयं की जीत ही सच्ची विजय है। जब मनुष्य अपने मन, अपने विचारों और अपने कर्मों पर नियंत्रण पा लेता है, तब वह न केवल अपने जीवन में सफल होता है, बल्कि समाज के लिए भी एक प्रेरणा बनता है। तो आइए, हम संकल्प लें कि हम स्वयं से कभी झूठ नहीं बोलेंगे, अपने दोषों को स्वीकार करेंगे, और निरंतर आत्मसुधार के मार्ग पर चलेंगे। क्योंकि जब हम स्वयं को जीत लेते हैं, तब संसार की कोई भी शक्ति हमें पराजित नहीं कर सकती। यही जीवन का सार है “पहले स्वयं को जीतिए, फिर जग को।”

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