हाँ साहब हम कॉकरोच हैं!

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘
सुबह के ठीक सवा छह बजे थे। अलार्म ने चिल्ला कर अपनी ड्यूटी पूरी की मगर चादर के भीतर से जो हाथ मोबाइल को स्नूज़ करने निकला, वह सामान्य हाथ नहीं था। उसमें ढेर सारे बारीक कांटेदार पैर थे। कबीर जो रात को एक अदद बेरोजगार, रील स्क्रॉलर और जिंदगी से हारा हुआ इंसान बनकर सोया था, सुबह उठते ही एक चमकीले कत्थई कॉकरोच में तब्दील हो चुका था। उसकी रीढ़ की हड्डी अब एक कड़े खोल में बदल चुकी थी और सिर पर दो एंटीना हवा में किसी अदृश्य वाईफाई सिग्नल को ढूंढने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। एक ऐसा युवा जिसके पास कल तक केवल एक पुराना लैपटॉप और रिज्यूमे की ढेरों रिजेक्शन मेल थीं, आज उसके पास छह पैर थे। उसने करवट लेने की कोशिश की, मगर उसकी पीठ का वह नया कड़ा कवच जमीन से चिपक गया। यह ठीक वैसा ही था जैसे कोई मिडिल क्लास लड़का अचानक से किसी कॉरपोरेट कंपनी के एग्रीमेंट में फंस जाए, जहां से बाहर निकलने का रास्ता सीधे एचआर के केबिन की तरफ जाता है, मगर रास्ता हमेशा बंद मिलता है। कबीर ने खिड़की से आती धूप को देखा जो अब उसे जीवन की रोशनी नहीं, बल्कि एक बड़ा सा सर्चलाइट लग रही थी जो उसकी बेबसी को पूरी दुनिया के सामने एक्सपोज करने के लिए बेताब थी। कमरे का दरवाजा खुला और मां चाय का कप लेकर अंदर आईं। उन्होंने बिस्तर पर एक बड़े से कीड़े को छटपटाते देखा तो उनकी चीख निकल गई। कबीर कहना चाहता था कि मां, डरो मत, यह मैं ही हूं, आपका अपना कबीर, जो कल रात तक सरकारी नौकरी के फॉर्म भरने की फीस मांग रहा था। मगर उसके मुंह से सिर्फ एक अजीब सी सरसराहट निकली जो किसी बिना नेटवर्क वाले फोन के स्पीकर जैसी थी। मां ने तुरंत चाय का कप साइड में रखा और हाथ में झाड़ू थाम ली। वह लड़का जो कल तक घर का सबसे बड़ा निकम्मा माना जाता था, आज अचानक सबसे बड़ा खतरा बन चुका था। कबीर अपनी छह टांगों के सहारे तेजी से ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुपा। वहां पड़े पुराने अखबारों और धूल के बीच उसे लगा कि समाज में उसकी हैसियत पहले भी तो यही थी। बेरोजगार युवक भी तो एक कॉकरोच ही होता है जो हर किसी की नजरों से बचकर कोने में पड़ा रहता है, जिसका होना या न होना किसी के बजट को प्रभावित नहीं करता। झाड़ू की तीलियां उसकी पीठ पर बज रही थीं और वह अपनी पूरी ताकत से उस अंधेरे कोने को जकड़े हुए था, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी अपने आखिरी तिनके को पकड़ता है। दोपहर होते-होते कबीर को अपनी नई जिंदगी का पूरा गणित समझ आ गया था। कॉकरोच होना और इस दौर का युवा होना, दोनों में कोई खास अंतर नहीं है। दोनों को अंधेरे से प्यार होता है, दोनों को बचे-खुचे टुकड़ों पर जिंदा रहना पड़ता है और दोनों से ही समाज को एक अजीब सी घिन होती है। कबीर ने देखा कि उसकी बहन अपने कमरे में बैठकर किसी रील पर हंस रही थी, वही बहन जो कल तक कबीर से अपनी नेटफ्लिक्स आईडी का पासवर्ड मांगती थी। कबीर दीवार के सहारे रेंगते हुए ऊपर चढ़ा ताकि वह अपनी मां की ममता को एक बार फिर से परख सके। मां फोन पर अपनी सहेली से कह रही थीं कि पता नहीं कबीर सुबह से कहां गायब है, उसका फोन भी यहीं पड़ा है और ऊपर से घर में इतने बड़े-बड़े कीड़े निकल आए हैं, कल ही लक्ष्मण रेखा लाकर पूरे घर में खींचनी पड़ेगी। कबीर को लगा कि यह लक्ष्मण रेखा तो उसके चारों तरफ सालों से खिंची थी, जिसे पार करने की कोशिश में वह हर इंटरव्यू से बाहर फेंक दिया जाता था। आज बस वह रेखा सफेद चाक से बदलकर उसकी सगे-संबंधियों की नजरों में तब्दील हो गई थी।read more:https://pahaltoday.com/shivoham-yoga-created-awareness-about-yoga/शाम ढली तो घर में कबीर के पिताजी की एंट्री हुई। वह दफ्तर की राजनीति और बॉस की गालियों का सारा बोझ अपने कंधों पर उठाए घर लौटे थे। उन्होंने जैसे ही लिविंग रूम की दीवार पर कबीर को रेंगते देखा, उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कबीर ने अपने एंटीना हिलाए, मानो वह अपने पिता को गुड इवनिंग कह रहा हो, मगर पिताजी को उसमें सिर्फ एक गंदगी और अनुशासनहीनता दिखाई दी। उन्होंने पैरों से अपनी भारी, चमड़े की बाटा वाली चप्पल निकाली। वह चप्पल जिसे देखकर कबीर बचपन में पढ़ाई करने बैठ जाता था, आज उसकी मौत का फरमान बनकर हवा में लहरा रही थी। कबीर ने भागने की कोशिश की। वह सोफे के नीचे गया, वह टीवी कैबिनेट के पीछे छुपा, मगर एक कॉकरोच की रफ्तार चाहे जितनी तेज हो, एक हताश और गुस्से से भरे मध्यमवर्गीय पिता के प्रहार से तेज नहीं हो सकती। कबीर को लगा कि यह चप्पल असल में वह व्यवस्था है जो हर उस सिर को कुचल देना चाहती है जो तय दायरे से बाहर निकलने की जुर्रत करता है। मौत का वह आखिरी क्षण बेहद धीमा था। पिताजी ने पूरी ताकत से चप्पल को दीवार पर दे मारा जहां कबीर अपनी जिंदगी की आखिरी सांसें गिन रहा था। चप्पल का वह भारी तला जब उसकी पीठ के कड़े खोल से टकराया, तो एक तीखी चरचराहट की आवाज आई। कबीर का वह खोल जो उसे दुनिया की नजरों से बचाता था, एक झटके में बिखर गया। कबीर को लगा कि यह वही दर्द है जब ग्रेजुएशन की डिग्री हाथ में होने के बाद भी कोई आपको नाकारा कह देता है। उसने अपने छह पैरों को आखिरी बार हवा में कड़वाते हुए समेटा। वह तड़पा, उसने उस बंद कमरे की सीलिंग को देखा जहां पंखा बंद पड़ा था और धूल की एक मोटी परत जमी थी। कबीर ने सोचा कि कितना आसान है एक वजूद को मिटा देना, चाहे वह बेरोजगार इंसान का हो या फिर एक मामूली कीड़े का। दोनों की मौत पर कोई आंसू नहीं बहते, बस एक अखबार का टुकड़ा आता है, लाश को समेटता है और कचरे के डिब्बे में फेंक आता है। दीवार पर अब सिर्फ एक कत्थई रंग का धब्बा बाकी था। मां ने तुरंत पानी का पोछा मंगाया और उस जगह को ऐसे साफ कर दिया जैसे वहां कभी कुछ था ही नहीं। पिताजी ने राहत की सांस ली और चप्पल को वापस पैर में डालते हुए कहा कि चलो, घर की एक गंदगी साफ हुई, वरना यह बीमारी फैला देता। तभी कबीर के मोबाइल की स्क्रीन अचानक जल उठी। उस पर एक नया नोटिफिकेशन चमका। वह एक नामी कंपनी का ईमेल था जिसमें लिखा था कि प्रिय कबीर, हमें यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि आपका चयन हमारी कंपनी में सीनियर मैनेजर के पद पर हो गया है, कृपया कल सुबह ज्वाइन करें। मोबाइल की वह रोशनी उस सूनी दीवार पर पड़ रही थी जहां से कबीर का वजूद अभी-अभी पोंछा गया था। कमरा बिल्कुल शांत था, बस स्क्रीन पर वह ऑफर लेटर बार-बार ब्लिंक कर रहा था, जिसे पढ़ने वाला अब इस दुनिया के किसी भी कोने, किसी भी झाड़ू या किसी भी चप्पल की पहुंच से बहुत दूर जा चुका था।

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