माँ की गोद में बंद आखिरी लोरी

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 
नर्मदा की लहरें उस शाम शांत नहीं थीं, वे तो पश्चाताप में डूबी किसी विधवा की सिसकियों जैसी थीं। ग्वारीघाट की सीढ़ियों पर जब उस माँ को निकाला गया, तो काल भी ठिठक गया। उसने अपने छह साल के कलेजे के टुकड़े को सीने के उस पार, फेफड़ों की आखिरी गहराई तक सटा रखा था। गोताखोरों ने बहुत जोर लगाया, पर माँ की बाहें किसी वज्र की तरह बच्चे के गिर्द लिपटी थीं। मानो वह कह रही हो—”लहरों! तुम मेरी साँसें तो छीन सकती हो, पर मेरी ओट नहीं।” बच्चा माँ के सीने में मुँह छिपाए ऐसे सो रहा था जैसे उसे यकीन हो कि दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए, माँ की छाती से सुरक्षित कोई किला नहीं है।”अरे, ई को अलग करो, जे माँ तो पत्थर हो गई,” एक पंडा जी ने कांपते हाथों से जल छिड़का।”कैसे अलग करें महाराज? जे तो रजिस्ट्री है जनम-जनम की,” एक मल्लाह ने अपनी फटी कमीज से आँखें पोंछीं।”काए जी, पंचनामा भरनो है, ज़रा हाथ ढीले करो,” एक सिपाही ने झिझकते हुए कहा।”साहब, जे हाथ अब इंसान के बस के नहीं रहे। जे तो कुदरत का ताला लग गओ है।”माँ का चेहरा सफेद था, पर उसकी बंद पलकों के पीछे एक ऐसी शांति थी जो शायद ही किसी मंदिर की मूर्ति में मिले। वह हारकर भी जीत गई थी, क्योंकि उसने अंत तक अपने अंश को अकेला नहीं छोड़ा था।भीड़ तमाशबीन बनी थी। कुछ लोग उस मार्मिक दृश्य को अपने फोन में कैद कर रहे थे, मानो ममता का नीलामी घर लगा हो। “देखो जी, जे होती है माँ! मर के भी बच्चा नहीं छोड़ा,” एक सज्जन ने स्टेटस अपडेट किया।”अरे छोड़ो भाई, अब का फोटो खींच रहे? जे तो सिस्टम की नाकामी की आखिरी तस्वीर है,” पीछे से एक जबलपुरिया ताना आया।”कैसी नाकामी? क्रूज़ तो नया था, बस ‘लोड’ ज्यादा हो गया,” एक बाबू ने फाइल संभाली।”लोड क्रूज़ पर नहीं साहेब, हमारी नीयतों पर ज्यादा था। तभी तो नर्मदा मैया ने उसे झेलने से मना कर दिया।read more:https://pahaltoday.com/two-robbers-arrested-for-snatching-a-womans-mangalsutra-locket/“हवा में एक ऐसी रूहानी चुभन थी जो आँखों से पानी बनकर नहीं, कलेजे से खून बनकर बह रही थी।
तभी एक सरकारी गाड़ी घाट पर आकर रुकी। क्रूज़ कंपनी और बैंक के कुछ बड़े अधिकारी उतरे। उनके हाथों में कुछ कागज़ात थे और चेहरों पर वह बनावटी दुख, जो अक्सर मुआवज़े के चेक के साथ आता है।”हटो-हटो! हमें पहचान करने दो। सरकार ने तुरंत सहायता राशि घोषित की है,” एक अधिकारी ने रुमाल नाक पर रखा।
“का सहायता साहेब? जे बच्चा अपनी माँ की धड़कन ढूंढते-ढूंढते सो गओ, अब तुम उसे नोटों की गड़गड़ाहट सुनाओगे?” एक बूढ़े ने कड़वाहट से पूछा।”नियम समझिए। माँ और बच्चे का ज्वाइंट क्लेम है। बस एक बार माँ की मुट्ठी खुल जाए, तो हम कागज़ी खानापूर्ति कर सकें।”अधिकारी ने माँ की बर्फीली उंगलियों को हिलाने की कोशिश की, पर वे तो जैसे विधाता के हस्ताक्षर थे, जो मिटाए नहीं मिट रहे थे।अंत में, हार मानकर बैंक वालों ने वह चेक और नोटों की गड्डी माँ की उसी वज्र जैसी मुट्ठी के ऊपर रख दी। मंजर इतना दर्दांत था कि पत्थर भी पसीज जाए; माँ की पकड़ वैसी ही बनी रही, उसने धन को छुआ तक नहीं, बस अपने बच्चे को और कसकर भींच लिया। उसने दुनिया को बता दिया कि उसकी ममता का सौदा किसी कागज़ के टुकड़े से नहीं हो सकता। वह अपनी संपत्ति को सीने से लगाए हुए ही चिता की अग्नि की ओर बढ़ गई। बैंक वाले पैसे दे चुके थे, पर वे पैसे उस माँ की बंद मुट्ठी और उसके अमर आलिंगन के सामने कूड़े के ढेर की तरह तुच्छ लग रहे थे। घाट पर खड़ा हर शख्स दहाड़ मारकर रो पड़ा, क्योंकि आज इंसानियत ने देखा कि कुछ चीजें इस दुनिया में अनमोल ही रह जाती हैं।

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