भारत के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब निर्णय केवल न्यायालयों को नहीं, बल्कि समाज को भी लेना होता है। ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवाद और मध्यस्थता का मार्ग खोलना ऐसा ही एक क्षण था। यह केवल एक मुकदमे के निस्तारण का प्रयास नहीं था; यह उस विश्वास की परीक्षा थी कि क्या भारत अपनी सबसे संवेदनशील ऐतिहासिक स्मृतियों को न्याय और संवाद के माध्यम से भविष्य की शक्ति में बदल सकता है।मध्यस्थता सफल नहीं हुई। अब मामला पुनः सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है। न्यायालय संविधान, विधि और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देगा। यही उसकी संवैधानिक भूमिका है। किंतु इस प्रक्रिया के समानांतर एक प्रश्न समाज के सामने भी खड़ा है—क्या हम एक ऐसे अवसर से चूक गए, जो न्यायिक कम और राष्ट्रीय अधिक था?भारत कोई 1947 में निर्मित राष्ट्र नहीं है। वह सहस्राब्दियों से प्रवाहित एक सभ्यता है, जिसकी आत्मा सनातन परंपरा में निहित है। इस भूमि ने वेदों से लेकर उपनिषदों तक, बुद्ध से लेकर महावीर तक, आदि शंकराचार्य से लेकर कबीर और तुलसी तक विचारों की विविध धाराओं को आत्मसात किया। यही भारत की सभ्यतागत शक्ति है—संघर्षों के बाद भी सांस्कृतिक निरंतरता।इतिहास के अनेक अध्याय गौरवपूर्ण हैं, तो कुछ पीड़ादायक भी। मध्यकालीन भारत में धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष हुए। अनेक मंदिरों के ध्वंस और उनके स्थान पर अन्य संरचनाओं के निर्माण का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, अभिलेखों और पुरातात्त्विक अध्ययनों में मिलता है। किन्तु प्रत्येक स्थल का सत्य न्यायालय इतिहास, पुरातत्व और विधिक साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित करता है। इसलिए ज्ञानवापी, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, संभल अथवा अन्य विवादों का अंतिम समाधान भी विधि के शासन के अंतर्गत ही होना चाहिए।विभाजन के बाद भारत ने प्रतिशोध का नहीं, बल्कि संविधान का मार्ग चुना। पाकिस्तान ने स्वयं को एक धार्मिक राष्ट्र घोषित किया; भारत ने सभी आस्थाओं के लिए समान संवैधानिक संरक्षण का संकल्प लिया। यही भारतीय गणराज्य की सबसे बड़ी नैतिक शक्ति है।इतिहासकारों का एक व्यापक मत है कि भारतीय मुसलमानों का बड़ा हिस्सा इसी भूमि के ऐतिहासिक समुदायों से विकसित हुआ। इस दृष्टि से भारत की सांस्कृतिक विरासत किसी एक समुदाय की नहीं, बल्कि सभी भारतीयों की साझी धरोहर है। इसी साझा विरासत के कारण साझा उत्तरदायित्व भी उत्पन्न होता है।यहीं सर्वोच्च न्यायालय की पहल का वास्तविक महत्व था। यदि संवाद से कोई सम्मानजनक और स्वैच्छिक समाधान निकलता, तो वह केवल ज्ञानवापी का समाधान नहीं होता। वह विभाजन के बाद भारत के सामाजिक इतिहास में विश्वास-निर्माण का सबसे बड़ा अध्याय बन सकता था। संभव है कि वही मॉडल मथुरा, संभल और अन्य विवादों के लिए भी एक नई दिशा बनता। read more:https://khabarentertainment.in/administration-gears-up-for-kanwar-yatra-divisional-commissioner-issues-strict-directives/मध्यस्थता असफल रही, पर उसका संदेश असफल नहीं हुआ। उसने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक सहमति एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं। न्यायालय कानून का निर्णय देता है; समाज उस निर्णय को स्थायी शांति में बदलता है।आज आवश्यकता किसी की विजय या पराजय की भाषा से ऊपर उठने की है। किसी भी न्यायिक निर्णय का स्वागत संयम, गरिमा और संवैधानिक मर्यादा के साथ होना चाहिए। किसी भी समुदाय की धार्मिक गरिमा का अनावश्यक अवमूल्यन न राष्ट्रहित में है, न सभ्यतागत दृष्टि से उचित।भारत यदि इक्कीसवीं सदी में विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, तो उसकी कसौटी केवल आर्थिक विकास या सामरिक शक्ति नहीं होगी। वास्तविक कसौटी यह होगी कि क्या वह अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील प्रश्नों का समाधान न्याय, सत्य, संवैधानिक व्यवस्था और सामाजिक विश्वास के साथ कर पाता है।ज्ञानवापी की मध्यस्थता भले अपने उद्देश्य तक न पहुँची हो, लेकिन उसने भात के सामने एक दर्पण अवश्य रख दिया है। उस दर्पण में हमें केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय चरित्र को देखना होगा।न्यायालय निर्णय देगा; वह उसका दायित्व है। किंतु इतिहास केवल न्यायालयों के निर्णय नहीं लिखता, वह समाजों के आचरण भी लिखता है। आने वाली पीढ़ियाँ यह नहीं पूछेंगी कि कौन जीता और कौन हारा। वे यह जानना चाहेंगी कि क्या भारत ने अपने इतिहास की सबसे कठिन विरासत को राष्ट्रीय समरसता में बदलने का साहस दिखाया था।
यदि हम इस प्रश्न का उत्तर “हाँ” में दे सके, तभी अमृतकाल का वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा। तभी भारत केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र नहीं, बल्कि एक आत्मविश्वासी और सभ्यतागत रूप से परिपक्व राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने खड़ा होगा।