बहराइच ( मिहींपुरवा )। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में तेंदुए का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। लगातार आबादी क्षेत्रों में तेंदुए की दस्तक से ग्रामीणों में भय का माहौल व्याप्त है। ताजा मामला ग्राम पंचायत सुजौली के मजरा पुरैना का है, जहां एक तेंदुआ बंदर का शिकार करने के दौरान थाना परिसर की दीवार फांदकर सीधे एक ग्रामीण के घर तक पहुंच गया। अचानक तेंदुए को घर के पास देख ग्रामीणों में अफरा-तफरी मच गई।प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, तेंदुआ काफी देर तक गांव के आसपास ही मंडराता रहा। ग्रामीणों ने अपनी जान बचाने के लिए सामूहिक रूप से हांका लगाया, शोर मचाया और गोला – पटाखा दगाया तब कहीं जाकर तेंदुआ भागा। इस घटना के बाद पूरे गांव में दहशत फैल गई। कई घंटों तक तेंदुआ पास के गन्ने के खेतों और झाड़ियों में छिपा रहा, जिससे लोग घरों से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों से तेंदुआ लगातार आबादी क्षेत्रों में अपना डेरा जमाए हुए है। कभी पालतू जानवरों पर हमला, तो कभी राह चलते लोगों के सामने आ जाने से ग्रामीणों का जीना मुहाल हो गया है। शाम होते ही गांव में सन्नाटा पसर जाता है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं घरों में कैद होने को मजबूर हैं। खेतों में काम करने जाना भी अब जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है।ग्रामीण रात भर जागकर पहरा देते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को घर के अंदर रखकर उनकी रखवाली करनी पड़ती है।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/लोगों का कहना है कि जब हम अपने ही घर-आंगन और गांव में सुरक्षित नहीं हैं, तो आखिर जाएं तो कहां जाएं। तेंदुए के लगातार हमलों ने ग्रामीणों की दिनचर्या पूरी तरह बदल दी है।सबसे बड़ा सवाल वन विभाग की तैयारियों को लेकर उठ रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज जैसे विशाल और संवेदनशील क्षेत्र में तेंदुए को पकड़ने के लिए मात्र 2 से 3 पिंजड़े ही उपलब्ध हैं। जब कहीं कोई बड़ी घटना घट जाती है या किसी पर हमला हो जाता है, तभी वहां पिंजड़ा लगाया जाता है। अन्य स्थानों पर जहां तेंदुए की हलचल दिखाई देती है, वहां ग्रामीणों को केवल गोला-पटाखा देकर खानापूर्ति कर दी जाती है।पिछले कई वर्षों में तेंदुए एवं अन्य जंगली जानवरों के हमलों में कई ग्रामीणों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर मौत से जंग जीतकर लौटे हैं। इसके बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। ग्रामीणों ने वन विभाग से मांग की है कि क्षेत्र में पिंजड़ों की संख्या बढ़ाई जाए, संवेदनशील गांवों में नियमित गश्त की जाए।
सवाल
अब सवाल यह उठता है कि लगातार आबादी क्षेत्रों में हो रहे हमलों और ग्रामीणों में फैले भय का जिम्मेदार आखिर कौन है? क्या ग्रामीण यूं ही रातों को जागकर अपनी और अपने परिवार की रक्षा करते रहेंगे, या विभाग इस आतंक से निजात दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा?