खेत बचाओ अभियान 2026: गौ आधारित प्राकृतिक खेती से मिट्टी बचाने का संदेश, किसानों को बांटे गए उन्नत धान बीज

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गाजीपुर। आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज (अयोध्या) के अंतर्गत संचालित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) आंकुशपुर, गाजीपुर द्वारा मंगलवार को ‘खेत बचाओ अभियान-2026’ के तहत गौ आधारित प्राकृतिक खेती पर एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण एवं धान बीज वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम मोहम्मदाबाद विकासखंड के चाकहुसैनी गांव में आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में प्रगतिशील किसान एवं महिला कृषकों ने भाग लिया।read more:https://pahaltoday.com/shailendra-kumar-dwivedi-a-pharmacist-posted-at-the-community-health-center-visheshwarganj-became-the-district-president-of-the-health-department/कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक प्रजापति (मृदा विज्ञान) ने किसानों को धान की उन्नत प्रजातियों के बीज वितरित किए और प्राकृतिक खेती के महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल फसलों की उत्पादकता बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की सेहत सुधारने का भी प्रभावी उपाय है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती अपनाई गई है, वहां मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा बढ़ी है, जिससे भूमि की उर्वरता में सुधार हुआ है।डॉ. प्रजापति ने धान की नर्सरी में पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते प्रयोग के बीच गोबर की खाद आज भी मिट्टी के लिए सबसे उपयोगी और टिकाऊ विकल्प है। उन्होंने बताया कि गोबर की खाद के नियमित उपयोग से खेती की लागत काफी हद तक कम की जा सकती है। यह रेतीली मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ाने, चिकनी मिट्टी में वायु संचार बेहतर करने तथा मिट्टी को भुरभुरी बनाकर पौधों की जड़ों के विकास में सहायक होती है।उन्होंने किसानों को केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट), कम्पोस्ट खाद एवं जीवामृत के उपयोग के लाभ भी बताए। उनके अनुसार फसलों में नियमित अंतराल पर जीवामृत का छिड़काव करने से कीटों का प्रकोप कम होता है और मिट्टी का स्वास्थ्य लंबे समय तक बेहतर बना रहता है। इस दौरान जैविक बीज उपचार एवं तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का भी प्रदर्शन किया गया।कृषि वैज्ञानिक ने कहा कि कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों को अलग-अलग करके देखने से किसानों को आर्थिक नुकसान होता है और मिट्टी का स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि रासायनिक खेती के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है, जिसका असर पशुओं के स्वास्थ्य और दूध की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।उन्होंने किसानों से प्राकृतिक एवं गौ आधारित खेती अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन बचानी है तो खेती को रसायन-मुक्त बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कार्यक्रम के अंत में किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपनाने और मृदा संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया।

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