वीरेंद्र बहादुर सिंह
पासवर्ड बदला जा सकता है, चेहरा समय के साथ बदल सकता है, लेकिन फिंगरप्रिंट जीवनभर लगभग अपरिवर्तित रहता है। यही कारण है कि आज की डिजिटल और अपराध की जांच की दुनिया में इसे सबसे विश्वसनीय बायोमेट्रिक पहचान माना जाता है।read more:https://khabarentertainment.in/staff-nurse-accuses-blood-center-operator-of-sexual-harassment-intimidation-and-mental-harassment-case-registered/
दुनिया की आठ अरब से अधिक आबादी में दो लोगों का चेहरा काफी हद तक मिलता-जुलता हो सकता है। आवाज में समानता हो सकती है और यहां तक कि एक जैसे दिखने वाले जुड़वां भी मिल सकते हैं, लेकिन प्रकृति ने प्रत्येक मनुष्य को एक ऐसी पहचान दी है, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक लगभग नहीं बदलती, वह है फिंगरप्रिंट। उंगलियों के सिरों पर बनी महीन उभरी हुई रेखाएं केवल पहचान का माध्यम नहीं हैं, बल्कि हमारी पकड़ मजबूत बनाने और स्पर्श की संवेदनशीलता बढ़ाने का भी महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। वास्तव में यह प्रकृति द्वारा मनुष्य के शरीर पर किया गया सबसे विश्वसनीय हस्ताक्षर है।वैज्ञानिक भाषा में इन रेखाओं को फ्रिक्शन रिज कहा जाता है। गर्भावस्था के लगभग दसवें सप्ताह से इनका निर्माण शुरू हो जाता है और सोलहवें-सत्रहवें सप्ताह तक इनकी मूल संरचना तय हो जाती है। इसके बाद व्यक्ति का पूरा जीवन बीत जाता है, लेकिन इनका मूल पैटर्न नहीं बदलता। यदि त्वचा पर सामान्य चोट लग जाए या वह छिल जाए तो नई त्वचा भी उसी पैटर्न के साथ विकसित होती है। केवल अत्यधिक गहरे घाव या गंभीर रूप से जलने की स्थिति में ही कुछ परिवर्तन संभव होता है।फिंगरप्रिंट का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। माना जाता है कि लगभग चार हजार वर्ष पहले बेबीलोन के व्यापारी मिट्टी की पट्टिकाओं पर अंगूठे की छाप लगाकर लेनदेन प्रमाणित करते थे। प्राचीन चीन में भी महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर हाथ या अंगूठे की छाप ली जाती थी। हालांकि उस समय यह जानकारी नहीं थी कि प्रत्येक व्यक्ति के फिंगरप्रिंट अलग-अलग होते हैं।आधुनिक फिंगरप्रिंट विज्ञान का विकास उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ और इसमें भारत का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। बंगाल में कार्यरत ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम जेम्स हर्शेल ने सरकारी अनुबंधों पर अंगूठे के निशान लेने की शुरुआत की और पाया कि किसी भी दो व्यक्तियों के निशान समान नहीं होते। बाद में स्काटलैंड के चिकित्सक डा. हेनरी फोल्ड्स ने सुझाव दिया कि अपराध स्थल से मिले फिंगरप्रिंट अपराधियों तक पहुंचने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। वैज्ञानिक फ्रांसिस गाल्टन ने हजारों नमूनों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया कि दो व्यक्तियों के फिंगरप्रिंट कभी भी पूरी तरह समान नहीं हो सकते।भारत ने इस विज्ञान को व्यवस्थित रूप देने में भी अग्रणी भूमिका निभाई। वर्ष 1897 में कोलकाता में दुनिया का पहला फिंगरप्रिंट ब्यूरो स्थापित किया गया। भारतीय अधिकारियों खान बहादुर अजीजुल हक और राय बहादुर हेमचंद्र बोस ने फिंगरप्रिंट वर्गीकरण की वैज्ञानिक प्रणाली विकसित की, जिसे बाद में पूरी दुनिया ने ‘हेनरी क्लासिफिकेशन सिस्टम’ के रूप में अपनाया।अक्सर लोगों के मन में प्रश्न उठता है कि यदि जुड़वां बच्चों का डीएनए लगभग समान होता है तो क्या उनके फिंगरप्रिंट भी एक जैसे होते हैं? इसका उत्तर है नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार फिंगरप्रिंट केवल आनुवंशिकता से निर्धारित नहीं होते। गर्भाशय में भ्रूण पर पड़ने वाला दबाव, एम्नियोटिक द्रव का प्रवाह, रक्त परिसंचरण और अनेक सूक्ष्म जैविक परिस्थितियां भी इसकी संरचना को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि समान डीएनए वाले जुड़वां बच्चों के भी फिंगरप्रिंट अलग-अलग होते हैं।वैज्ञानिकों ने फिंगरप्रिंट को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा है। पहला लूप, जो लगभग 60 से 65 प्रतिशत लोगों में पाया जाता है। दूसरा व्होर्ल, जिसकी आकृति गोलाकार या सर्पिल होती है और यह लगभग 30 से 35 प्रतिशत लोगों में मिलता है। तीसरा आर्च, जो सबसे दुर्लभ प्रकार है। लेकिन पहचान केवल इन तीन पैटर्न से नहीं होती। रेखाओं का टूटना, जुड़ना, शाखाएं बनाना और समाप्त होना जैसी सूक्ष्म विशेषताएं किसी व्यक्ति की विशिष्ट पहचान बनाती हैं। इन्हें मिनुशिया पॉइंट्स कहा जाता है।एक समय था जब फिंगरप्रिंट का उपयोग केवल पुलिस और अदालतों तक सीमित था। आज यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। स्मार्टफोन अनलाक करने से लेकर बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, कार्यालयों में उपस्थिति दर्ज करने, स्मार्ट लॉक और सरकारी सेवाओं तक बायोमेट्रिक पहचान का तेजी से विस्तार हुआ है। भारत में आधार प्रणाली ने फिंगरप्रिंट को करोड़ों लोगों की पहचान का अभिन्न आधार बना दिया है।फिंगरप्रिंट से जुड़े कई रोचक वैज्ञानिक तथ्य भी हैं। आज तक दुनिया में किसी भी दो व्यक्तियों के पूरी तरह समान फिंगरप्रिंट नहीं मिले हैं। सामान्य चोट के बाद भी त्वचा पर वही पुराना पैटर्न लौट आता है। कुछ सतहों पर फिंगरप्रिंट वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं, हालांकि यह सतह और वातावरण पर निर्भर करता है। कोआला जैसे कुछ जानवरों के फिंगरप्रिंट भी इतने सूक्ष्म होते हैं कि सामान्य नजर से उन्हें मानव फिंगरप्रिंट से अलग करना कठिन हो सकता है।अपराध कीजांच में फिंगरप्रिंट ने क्रांतिकारी बदलाव लाया है। हत्या, चोरी, डकैती, आतंकवाद और संगठित अपराधों की जांच में यह सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्यों में गिना जाता है। आधुनिक फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में कंप्यूटर केवल पैटर्न ही नहीं, बल्कि मिनुशिया पॉइंट्स का भी विश्लेषण करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की सहायता से अब धुंधले, अधूरे या क्षतिग्रस्त फिंगरप्रिंट से भी संभावित पहचान निकालना संभव हो रहा है।भारत में गुजरात का फोरेंसिक विज्ञान क्षेत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। गांधीनगर स्थित नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी फिंगरप्रिंट, डीएनए, साइबर फोरेंसिक और आधुनिक जांच तकनीकों के प्रशिक्षण तथा अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित संस्थान बन चुकी है। यहां प्रशिक्षित विशेषज्ञ देश-विदेश की जांच एजेंसियों को तकनीकी सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
डिजिटल युग में जहां साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं बायोमेट्रिक पहचान की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बन गई है। पासवर्ड भूल जाने पर बदला जा सकता है, लेकिन फिंगरप्रिंट बदला नहीं जा सकता। इसलिए बायोमेट्रिक डेटा की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उसकी उपयोगिता।फिंगरप्रिंट केवल उंगलियों पर बनी कुछ रेखाएं नहीं हैं। वे प्रकृति की वह अद्भुत रचना हैं जो प्रत्येक मनुष्य को दुनिया के अरबों लोगों से अलग पहचान देती हैं। विज्ञान, तकनीक और न्याय व्यवस्था के लिए यह केवल एक निशान नहीं, बल्कि सत्य तक पहुंचने का सबसे विश्वसनीय मार्ग है।