अमेरिका,इजरायल और ईरान के बारूद के खेल से मानवता सर्वनाश की ओर।

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अमेरिका इजरायल और ईरान के महत्वाकांक्षी और विस्तार के अतिरेक के धनी राष्ट्र प्रमुखों ने अपने देश के साथ-साथ पूरी दुनिया में आर्थिक संकट तथा वैश्विक अशांति बारूद के माध्यम से पैदा कर दी है। न केवल उनके अपने देश के नागरिक असुरक्षित हैं बल्कि पूरे विश्व की मानव सभ्यता को खतरा नजर आने लगा है। यह बात एकदम समझ से परे है की हर बात का हिंसा ही समाधान नहीं हो सकता, वार्ता और विचारों से भी कई बड़े-बड़े मसले हल किये जा सकते हैं फिर कितने व्यापक खून खराबे और युद्ध की क्या आवश्यकता है। read more:https://khabarentertainment.in/joint-agriculture-director-vindhyachal-division-ashok-upadhyays-surprise-inspection-of-the-agricultural-fertilizer-center/महात्मा गांधी ने अहिंसा को मानवता का सबसे बड़ा अस्त्र बताया था,उनका प्रसिद्ध कथन है कि“आँख के बदले आँख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।” उन्होंने यह भी कहा कि “अहिंसा मानवता का परम धर्म है,” और यह स्पष्ट किया कि स्थायी शांति केवल सत्य और अहिंसा के मार्ग से ही संभव है, न कि युद्ध से।ज्ञान, संवेदना और मानवता से परे जब महायुद्ध की आहट सुनाई देती है, तब केवल सीमाओं का विस्तार या सत्ता का संघर्ष नहीं होता, बल्कि पूरी मानव सभ्यता अपनी आत्मा के संकट से गुजरती है। यह वही समय होता है जब विज्ञान, जो मानव कल्याण का साधन होना चाहिए था, विनाश का औजार बन जाता है और ज्ञान, जो प्रकाश फैलाने के लिए था, अंधकार को और गहरा कर देता है। आज का महायुद्ध केवल बंदूकों और बमों तक सीमित नहीं रहा, यह तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर हमलों और परमाणु शक्ति के रूप में इतना भयावह हो चुका है कि इसका परिणाम केवल हार-जीत नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है।गौतम बुद्ध ने करुणा और शांति को जीवन का मूल आधार माना था, उनका संदेश था घृणा से घृणा कभी समाप्त नहीं होती, प्रेम से ही समाप्त होती है। यह विचार बताता है कि युद्ध की आग को केवल प्रेम और समझदारी से ही बुझाया जा सकता है। जब एक देश अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है, तो वह केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं करता, बल्कि अनजाने में दूसरे देशों के लिए भय, असुरक्षा और विनाश का कारण भी बन जाता है। यही शक्ति संतुलन की असमानता महायुद्ध की नींव रखती है, जहाँ एक का सामर्थ्य दूसरे के लिए संकट बन जाता है और यह संकट धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेता है। आज मानवता चीख रही है, रो रही है, क्योंकि जिन हाथों ने मशीनें बनाई थीं, उन्हीं हाथों ने विनाश के हथियार भी गढ़ लिए हैं। वैज्ञानिक प्रगति का यह विडंबनापूर्ण रूप हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में विकसित हुए हैं या केवल विनाश के नए-नए तरीके खोज लिए हैं। युद्ध के मैदान में गिरता हर सैनिक केवल एक शरीर नहीं होता, वह किसी का बेटा, किसी का पिता, किसी का सपना होता है, और जब वह गिरता है, तो उसके साथ कई जीवन बिखर जाते हैं। बच्चों की मासूमियत, माताओं की ममता और बुजुर्गों की आशाएँ इस महायुद्ध की भेंट चढ़ जाती हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युद्ध का अंत शांति में नहीं हो सकता, क्या संवाद और वार्ता के माध्यम से समाधान नहीं निकाला जा सकता। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जहाँ युद्ध ने केवल विनाश दिया, वहीं शांति वार्ताओं ने नए युग की शुरुआत की है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने भी यही कहा कि अंधकार अंधकार को नहीं मिटा सकता, केवल प्रकाश ही ऐसा कर सकता है,और यह प्रकाश केवल शांति और संवाद के माध्यम से ही संभव है।” जब राष्ट्र अपने अहंकार और शक्ति प्रदर्शन को त्यागकर एक-दूसरे के साथ बैठते हैं, तो समस्याओं का समाधान निकलता है, क्योंकि संवाद वह सेतु है जो दुश्मनी को भी दोस्ती में बदल सकता है। आज की दुनिया को यह समझने की आवश्यकता है कि युद्ध कोई समाधान नहीं, बल्कि समस्याओं को और जटिल बनाने का माध्यम है। विज्ञान का उपयोग यदि मानव कल्याण के लिए किया जाए, तो यह जीवन को सरल और सुंदर बना सकता है, लेकिन यदि इसका दुरुपयोग किया गया, तो यह पूरी सृष्टि को विनाश के कगार पर पहुँचा सकता है। अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक, जिन्होंने परमाणु युग की शुरुआत देखी, उन्होंने चेतावनी दीमुझे नहीं पता तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्व युद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा। उनका यह कहना।विज्ञान के दुरुपयोग की भयावह परिणति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि “शांति बलपूर्वक नहीं रखी जा सकती, यह केवल समझ से प्राप्त होती है।”  हमें यह तय करना होगा कि हम अपने ज्ञान का उपयोग किस दिशा में करना चाहते हैं,सृजन की ओर या विनाश की ओर। महायुद्ध की यह भयावह छाया हमें चेतावनी देती है कि यदि हमने समय रहते अपने मार्ग को नहीं बदला, तो वह दिन दूर नहीं जब मानवता केवल इतिहास की पुस्तकों में ही रह जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि विश्व के सभी राष्ट्र अपने मतभेदों को भुलाकर शांति, सहयोग और सह-अस्तित्व के मार्ग को अपनाएँ। युद्ध के स्थान पर यदि हम संवाद को प्राथमिकता दें, तो न केवल संघर्ष टल सकते हैं, बल्कि एक बेहतर और सुरक्षित दुनिया का निर्माण भी संभव है। अंततः यह मानवता की परीक्षा का समय है, जहाँ हमें यह साबित करना होगा कि हम केवल तकनीकी रूप से ही नहीं, बल्कि नैतिक और मानवीय दृष्टि से भी विकसित हैं, और यही विकास हमें महायुद्ध की विभीषिका से बचाकर शांति के मार्ग पर आगे बढ़ा सकता है।

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