अभिलाषा कुमारी
देश आज विकास, डिजिटल इंडिया, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की बात कर रहा है। शहरों में लड़कियाँ इंजीनियर, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और वैज्ञानिक बन रही हैं। लेकिन भारत के अनेक ग्रामीण इलाकों में आज भी हजारों लड़कियों के सपने घर की चौखट से बाहर नहीं निकल पाते। स्कूल की ड्रेस पहनकर बड़े सपने देखने वाली लड़कियों को बारहवीं के बाद अचानक यह कह दिया जाता है कि “अब पढ़ाई बहुत हो गई।” कहीं आर्थिक तंगी का बहाना बनता है, तो कहीं समाज और परंपराओं का दबाव उनकी शिक्षा पर ताला लगा देता है। दूसरी ओर उसी घर के लड़कों की पढ़ाई, नौकरी और करियर के लिए हर संभव कोशिश की जाती है। यही जेंडर भेदभाव आज भी ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक है।
हाल ही में बिहार में लड़कियों की शिक्षा को लेकर हुई बहस और शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। एक ओर सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लड़कियां उच्च शिक्षा तक पहुँच ही नहीं पा रही हैं। कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि बिहार में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉप आउट प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से अधिक है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के रीगा ब्लॉक के रामनगर गाँव स्थित वार्ड नंबर 11 की कहानी भी इसी सच्चाई को बयान करती है। यहाँ रहने वाली अंशु, सलोनी कुमारी, राधा कुमारी और विपाशा कुमारी जैसी लड़कियां बड़े सपने रखती हैं। उनके सपने किसी महानगर की लड़कियों से अलग नहीं हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उनके सपनों के रास्ते में गरीबी, सामाजिक सोच और अवसरों की कमी खड़ी है। राधा कुमारी पुलिस विभाग में जाना चाहती है। उसे लगता है कि वर्दी पहनकर वह अपने परिवार और गाँव का नाम रोशन कर सकती है। वह कहती है कि जब भी किसी महिला पुलिस अधिकारी को देखती है, तो उसे अपने भीतर भी वही आत्मविश्वास महसूस होता है।read more:https://pahaltoday.com/initiatives-are-being-taken-to-start-24-hour-medical-services-at-the-old-hospital/ लेकिन बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके घर वालों ने आगे पढ़ाने में असमर्थता जताई। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है। घर वालों का कहना है कि कॉलेज की फीस, यात्रा और अन्य खर्च उठाना संभव नहीं है। अब राधा घर के कामों में हाथ बंटा रही है, जबकि उसके सपनों की फाइल उम्मीदों के किसी कोने में बंद हो चुकी है। विपाशा कुमारी डॉक्टर बनना चाहती थी। गांव में जब भी कोई बीमार होता और समय पर इलाज नहीं मिल पाता, तो वह सोचती कि एक दिन वह ऐसी डॉक्टर बनेगी जो गरीबों का इलाज करेगी। उसने मेहनत से पढ़ाई की, लेकिन आर्थिक तंगी ने उसकी राह रोक दी। मेडिकल की तैयारी तो दूर, सामान्य कॉलेज की पढ़ाई भी उसके लिए मुश्किल बन गई। आज वह घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल कर रही है, जबकि उसका सपना सफेद कोट पहनने का था।
अंशु का सपना एक शिक्षक बनने का है। वह चाहती थी कि पढ़-लिखकर अपने गाँव की लड़कियों को शिक्षित करें ताकि आने वाली पीढ़ी वही दर्द न झेले जो उसने झेला। लेकिन उसके परिवार की प्राथमिकता बेटों की पढ़ाई है। घर वालों का मानना है कि लड़कियाँ आखिरकार “दूसरे घर” चली जाती हैं, इसलिए उन पर अधिक खर्च करना उचित नहीं। यही सोच आज भी हजारों ग्रामीण परिवारों में मौजूद है। सलोनी कुमारी की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। उसने भी आगे पढ़ने की इच्छा जताई, लेकिन परिवार की आर्थिक मजबूरी और समाज के दबाव ने उसकी राह रोक दी। अब उसके घर में उसकी शादी की चर्चा अधिक होती है, पढ़ाई की नहीं। यह केवल चार लड़कियों की कहानी नहीं है। यह उन लाखों ग्रामीण लड़कियों की सच्चाई है जिनके सपने गरीबी और लैंगिक भेदभाव के बीच दम तोड़ देते हैं। आंकड़े भी इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। UDISE+ 2024-25 के अनुसार भारत में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट लगभग 7.5 प्रतिशत है, जबकि बिहार में यह स्थिति और खराब है। बिहार में उच्च प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट 5.7 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जो देश में सबसे अधिक राज्यों में शामिल है। कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि ग्रामीण बिहार में बड़ी संख्या में लड़कियाँ 10वीं और 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक कमजोरी, बाल विवाह, कॉलेजों की दूरी, सुरक्षित परिवहन की कमी और सामाजिक मानसिकता है। एक अध्ययन के अनुसार बिहार में केवल लगभग 40 प्रतिशत लड़कियाँ ही माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन घरों में लड़कियों की पढ़ाई रोकी जाती है, वहीं लड़कों की शिक्षा के लिए जमीन तक बेच दी जाती है। लड़कों को कोचिंग, मोबाइल, शहर में हॉस्टल और बेहतर संसाधन दिए जाते हैं, जबकि लड़कियों से कहा जाता है कि “इतनी पढ़ाई काफी है।” यह भेदभाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आगे चलकर महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, रोजगार और सामाजिक भागीदारी को भी प्रभावित करता है। हालांकि बदलाव की छोटी-छोटी किरणें भी दिखाई देती हैं। कई ग्रामीण लड़कियाँ कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा जारी रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। स्वयं सहायता समूह, सरकारी छात्रवृत्ति योजनाएँ और कुछ सामाजिक संस्थाएं भी लड़कियों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा को लड़कियों के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए। गाँवों के पास कॉलेजों की संख्या बढ़े, सुरक्षित परिवहन उपलब्ध हो, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विशेष सहायता मिले और सबसे महत्वपूर्ण, परिवारों को यह समझाया जाए कि बेटी की शिक्षा कोई बोझ नहीं बल्कि भविष्य का निवेश है। अगर देश सचमुच आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे लड़कियों की उड़ान को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें खुला आसमान देना होगा।