3-डी अभियान: बदलाव जो दिखता भी है और बदलता भी है

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  • जब उत्सव की धुनें खुशियों की जगह चिंता जगाने लगें और परंपरा अपने मूल अर्थ से दूर हो जाए, तब समाज को खुद को देखने की जरूरत होती है। आदिवासी बहुल क्षेत्रों की पहचान सादगी रही है, लेकिन शादियों में डीजे का शोर, शराब और ‘दापा’ (दहेज़) जैसी प्रथाओं का दबाव इस गरिमा को प्रभावित कर रहा है। विवाह, जो कभी संस्कार और अपनापन का प्रतीक था, अब कई जगह आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। ऐसे समय में जो पहल समाज को सादगी और संस्कार की ओर लौटाए, वह सुधार नहीं, सामाजिक चेतना का पुनर्जागरण बन जाती है। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले का दहेज, दारू और डीजे मुक्त ‘3-डी अभियान’ आज उसी बदलाव की सशक्त मिसाल है। जब कोई अधिकारी कानून से आगे बढ़कर समाज की सोच बदलने का संकल्प लेता है, तभी बदलाव इतिहास बनता है। बड़वानी के पुलिस अधीक्षक पद्मविलोचन शुक्ल ने ‘3-डी अभियान’ को जनआंदोलन का रूप दिया है। उन्होंने वर्दी को भय नहीं, विश्वास और संवाद का माध्यम बनाया। झाबुआ से शुरू हुए इस अभियान को उन्होंने बड़वानी में सामाजिक चेतना का आधार बना दिया। वे स्वयं सादगीपूर्ण विवाहों में शामिल होकर परिवारों को सम्मानित भी करते हैं, जिससे लोगों को प्रेरणा मिलती है। गांव-गांव जाकर वे समझाते हैं कि विवाह दिखावे नहीं, संस्कार और सम्मान का उत्सव है। यही कारण है कि ‘3-डी अभियान’ आज समाज में जागरूकता और स्वाभिमान की पहचान बन चुका है। ‘3D अभियान’ केवल तीन बुराइयों के विरोध की पहल नहीं, बल्कि उस विकृत सोच के खिलाफ सामाजिक जागरण है जिसने विवाह को संस्कार से अधिक बोझ बना दिया था। गरीब परिवार वर्षों तक कर्ज में डूबते रहे, जमीन गिरवी रखते रहे और कमाई दिखावे में खर्च होती रही। कई घर शादी के बाद भी कर्ज से नहीं निकल पाए। शराब ने खुशियों को विवाद और हिंसा में बदला, जबकि डीजे के शोर ने लोकसंस्कृति को दबा दिया। अब बड़वानी के कई गांवों में विवाह बिना दहेज के हो रहे हैं, बिना शराब के उत्सव सज रहे हैं और ढोल-मांदल की पारंपरिक थाप फिर से सुनाई देने लगी है। सच्चा बदलाव केवल आदतें नहीं बदलता, वह संस्कृति को भी नया जीवन देता है। ‘3-डी अभियान’ की ताकत यही है। आदिवासी समाज की पहचान लोकधुनों, सामूहिक उत्सवों और सादगी में रही है, लेकिन दिखावे की चकाचौंध ने इन्हें हाशिये पर धकेल दिया था। विवाहों में लोकगीतों की जगह शोर और स्थानीय कलाकारों की जगह डीजे ने ले ली थी। ‘3-डी अभियान’ ने इस असंतुलन को चुनौती दी है। अब गांवों में ढोल-मांदल की थाप गूंज रही है, लोकधुनें लौट रही हैं और स्थानीय कलाकारों को सम्मान मिल रहा है। यह पहल केवल कुरीतियों के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि आदिवासी सांस्कृतिक अस्मिता के पुनर्जागरण का सशक्त प्रयास बन चुकी है। समाज जब स्वयं बदलाव का प्रहरी बन जाए, तभी क्रांति जन्म लेती है। ‘3-डी अभियान’ की सबसे बड़ी शक्ति यही जनभागीदारी है। ‘3-डी अभियान’ अब केवल सोच नहीं बदल रहा, बल्कि समाज का व्यवहार भी बदल रहा है। जिन विवाहों में कभी शराब, विवाद और तनाव हावी रहते थे, वहां अब सादगी, अनुशासन और आत्मीयता दिखाई देने लगी है। परिवार कर्ज के बोझ से राहत महसूस कर रहे हैं और नई दुल्हनें आर्थिक दबाव नहीं, सम्मान के साथ नए जीवन में कदम रख रही हैं।read more:https://pahaltoday.com/obra-police-arrested-a-youth-with-1-kg-150-grams-of-ganja/लोग समझने लगे हैं कि दिखावे की चमक क्षणिक होती है, लेकिन उसके लिए लिया गया कर्ज वर्षों तक परिवारों को भीतर से तोड़ता रहता है। ऐसे में सादगीपूर्ण विवाह अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, सम्मान और जागरूकता की नई पहचान बनते जा रहे हैं। बड़वानी में ‘3-डी अभियान’ ने पुलिस और समाज के रिश्तों की तस्वीर बदल दी है। यहां वर्दी केवल कानून की ताकत नहीं, सामाजिक विश्वास का प्रतीक बनी है। जिस पुलिस को अक्सर डर और दूरी से जोड़ा जाता था, वही अब गांवों की चौपालों में बैठकर कुरीतियों के खिलाफ जनजागरण कर रही है। संवाद और संवेदना को आधार बनाकर पद्मविलोचन शुक्ल ने पुलिस को समाज सुधार की शक्ति में बदल दिया है। उन्होंने साबित किया कि प्रशासन की सबसे बड़ी सफलता केवल अपराध नियंत्रण नहीं, बल्कि लोगों में भरोसा, सम्मान और जागरूकता जगाना है। बड़वानी का यह मॉडल आज कम्युनिटी पुलिसिंग की प्रेरक मिसाल बन चुका है। समाज तब मजबूत बनता है, जब उसकी परंपराएं बोझ नहीं, सम्मान का आधार बनें। बड़वानी का ‘3-डी अभियान’ इसी बदलाव की प्रभावी शुरुआत है। यदि यह मॉडल देशभर में अपनाया जाए, तो यह केवल शादियों का स्वरूप नहीं, सामाजिक सोच भी बदल सकता है। आज भी दहेज, शराब और दिखावे की परंपरा गरीब परिवारों को कर्ज और तनाव में धकेल रही है। बेटियों के विवाह कई घरों के लिए आर्थिक संघर्ष बन जाते हैं, जबकि नशा और शोर सामाजिक वातावरण को खोखला करते हैं। ऐसे में ‘3-डी अभियान’ केवल कुरीतियों के खिलाफ मुहिम नहीं, बल्कि सादगी, सम्मान और सामाजिक संतुलन का संदेश है। यह समाज को बताता है कि विवाह बोझ नहीं, संस्कार होना चाहिए।  गहरी जमी  परंपराओं से टकराता हर बदलाव आसान नहीं होता, लेकिन वही समाज को नई दिशा देता है। आज भी समाज का एक हिस्सा दिखावे को प्रतिष्ठा और दहेज को परंपरा मानकर उसी में उलझा हुआ है। लेकिन बड़वानी ने दिखा दिया है कि संवाद, संवेदनशील नेतृत्व और जनभागीदारी से गहरी जमी सोच भी बदली जा सकती है। ‘3-डी अभियान’ यह स्पष्ट करता है कि बदलाव बड़े साधनों से नहीं, दृढ़ संकल्प से जन्म लेता है। बड़वानी जिले के वर्तमान एसपी पद्मविलोचन शुक्ल और उनकी टीम का यह प्रयास अब एक दिशा बन चुका है। जिस दिन विवाह सादगी और सम्मान का उत्सव बनेंगे, उसी दिन समाज वास्तविक प्रगति की ओर बढ़ेगा।

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