युवावस्था मानव जीवन का वसंतकाल है। उसमें ऊर्जा है, उत्साह है, सपने हैं, जोखिम उठाने का साहस है और दुनिया को बदल देने की बेचैनी भी। यही कारण है कि इतिहास में जब-जब किसी समाज में बड़े परिवर्तन हुए, उनके केंद्र में युवा शक्ति दिखाई दी।25 मई, 1925 को प्रकाशित मतवाला साप्ताहिक के अंक संख्या 38 में प्रकाशित एक लेख इस युवा शक्ति की अद्भुत व्याख्या करता है। उस समय लेखक की उम्र मात्र 18 वर्ष थी। लेखक थे- शहीद-ए-आजम भगत सिंह, जिन्होंने यह लेख ‘बलवंत सिंह’ नाम से भेजा था। सौ वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बावजूद लेख की मूल चेतना आज भी असाधारण रूप से प्रासंगिक लगती है।भगत सिंह ने युवावस्था को केवल शारीरिक ऊर्जा नहीं माना। उनके लिए युवा वह शक्ति था, जो चाहे तो समाज को नई दिशा दे सकता है और चाहे तो अपनी ऊर्जा को विनाश में भी लगा सकता है। युवावस्था के सामने इसलिए दो रास्ते होते हैं, उन्नति का शिखर या पतन की अंधेरी खाई।युवा त्यागी भी बन सकता है और विलासी भी। वह अन्याय के विरुद्ध खड़ा होकर समाज को अभय दे सकता है और स्वार्थ में डूबकर उसी समाज के लिए समस्या भी बन सकता है। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि क्रांतियों, सामाजिक परिवर्तनों और स्वतंत्रता आंदोलनों में युवाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई है।भगत सिंह के लेख में युवाओं के साहस का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली है। वे उस युवक की कल्पना करते हैं , जो मृत्यु से नहीं डरता, संकट के सामने पीछे नहीं हटता और अपने आदर्श के लिए त्याग करने को तैयार रहता है। उनके लिए युवक राष्ट्र की ऊर्जा, उसकी आशा और उसके भविष्य का निर्माता है।आज जब भारत में जेन-जी को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है, भगत सिंह के विचारों को नए संदर्भ में पढ़ना जरूरी हो जाता है। आज का युवा सोशल मीडिया पर अपनी आवाज उठाता है, शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और शासन की नीतियों पर सवाल करता है। उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम बदल गया है, लेकिन सवाल पूछने की उसकी बेचैनी नई नहीं है।युवा मन की सबसे बड़ी विशेषता है, वह तयशुदा ढांचे को सहजता से स्वीकार नहीं करता। उसे परिवर्तन चाहिए। वह परंपरा का सम्मान कर सकता है, लेकिन केवल इसलिए किसी व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता कि वह पुरानी है। यही बेचैनी समाज में परिवर्तन की पहली सीढ़ी बनती है।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी है कि क्या हर विद्रोह सही दिशा में ले जाता है?इसका उत्तर महात्मा गांधी के ‘स्वराज’ के विचार में मिलता है। आजादी केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं है। वास्तविक स्वराज का अर्थ है, स्वयं पर अपना राज। अर्थात स्वतंत्रता के साथ आत्मसंयम, जिम्मेदारी और विवेक भी जरूरी हैं।आज की युवा पीढ़ी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। कुछ क्षणों में कोई विचार लाखों लोगों तक पहुंच सकता है।वायरल होना अब प्रभाव का एक पैमाना बन गया है। लेकिन लोकप्रियता और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। भीड़ का समर्थन किसी विचार को स्वतः सही नहीं बना देता।शिक्षा व्यवस्था या किसी भी सार्वजनिक प्रश्न के विरुद्ध युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक हो सकता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना उनका अधिकार है। आंदोलन करना उनका अधिकार है। असहमति व्यक्त करना भी उनका अधिकार है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ भाषा और व्यवहार की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।जब किसी आंदोलन का मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और गालीगलौज, व्यक्तिगत आक्षेप या हिंसक भाषा केंद्र में आ जाती है, तब व्यवस्था को आलोचना से बच निकलने का अवसर मिल जाता है।read more:https://pahaltoday.com/ballia-police-receive-two-modern-interceptor-bikes-sp-omvir-singh-flags-them-off/मुद्दे की जगह तरीका चर्चा का विषय बन जाता है। यह युवा ऊर्जा की दिशा भटकने का उदाहरण है।इसका अर्थ यह भी नहीं कि केवल युवाओं को ही कठघरे में खड़ा किया जाए। यदि पुरानी पीढ़ी ने सार्वजनिक जीवन में असभ्य भाषा, अहंकार, कटुता या असहिष्णुता को सामान्य बनाया है तो युवाओं से उसका अनुकरण न करने की अपेक्षा ही उचित होगी। गलत व्यवहार की उम्र नहीं होती; गलत, गलत ही रहता है।युवा शक्ति को गति चाहिए, लेकिन गति के साथ नियंत्रण भी चाहिए। किसी वाहन के डैशबोर्ड पर उसकी अधिकतम गति भले लिखी हो, लेकिन अच्छा चालक वही है, जिसे समय पर ब्रेक लगाना आता हो। इसी तरह युवा ऊर्जा तभी रचनात्मक शक्ति बनती है जब उसके साथ विवेक और आत्मसंयम जुड़ा हो।भगत सिंह की सबसे बड़ी देन केवल उनका बलिदान नहीं था। वे पढ़ने वाले, सोचने वाले और प्रश्न करने वाले युवा थे। वे सामाजिक विषमता, साम्राज्यवाद, धार्मिक रूढ़ियों और आर्थिक अन्याय पर विचार करते थे। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि सच्ची देशभक्ति केवल नारे लगाने में नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसके प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने में भी होती है।इसी संदर्भ में कवि अवतार सिंह संधु ‘पाश’ ने भगत सिंह को केवल एक क्रांतिकारी के रूप में नहीं, बल्कि पंजाब को भावनात्मक उन्माद से बुद्धिवाद की ओर मोड़ने वाले चिंतक के रूप में देखा। भगत सिंह के कमरे में फांसी से पहले लेनिन की पुस्तक का मिलना प्रतीकात्मक है कि उनकी अंतिम घड़ियों में भी अध्ययन और विचार उनके साथ थे।आज के युवाओं के लिए भगत सिंह की सबसे बड़ी सीख यही है कि जोश के साथ होश भी चाहिए। सवाल पूछो, लेकिन पढ़कर पूछो। विरोध करो, लेकिन मुद्दे को समझकर करो। स्वतंत्रता मांगो, लेकिन अपनी स्वतंत्रता के साथ दूसरों की स्वतंत्रता का भी सम्मान करो। व्यवस्था की आलोचना करो, लेकिन बेहतर व्यवस्था का सपना और उसका रास्ता भी सामने रखो।आज भारत को ऐसी ही युवा शक्ति की आवश्यकता है, जो धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक खेमों से ऊपर उठकर देश के वास्तविक प्रश्नों को देख सके, जो सोशल मीडिया की भीड़ में बहने के बजाय स्वयं सोच सके, जो किसी नेता का अंधसमर्थक बनने के बजाय लोकतंत्र का सजग नागरिक बने।गुलामी केवल विदेशी शासन का नाम नहीं। भय, स्वार्थ, अंधानुकरण, रूढ़िवादिता और चुप्पी भी मनुष्य को गुलाम बना सकती है। जो व्यक्ति सत्य जानते हुए भी केवल सुविधा के लिए चुप रहता है, वह भी किसी न किसी मानसिक गुलामी में जी रहा होता है।इसलिए युवा होना केवल उम्र का नाम नहीं है। युवा होना एक मानसिक अवस्था है, जिज्ञासा की, प्रश्न की, साहस की और परिवर्तन की।आज जब भगत सिंह के उस लेख को 101 वर्ष बाद पढ़ते हैं तो लगता है कि समय बदल गया, साधन बदल गए, भाषा बदल गई, लेकिन युवा मन की मूल बेचैनी आज भी वही है। तब हाथ में क्रांतिकारी साहित्य था, आज हाथ में स्मार्टफोन है। तब विचारों को पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से फैलाया जाता था, आज कुछ सेकंड में संदेश लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। लेकिन सवाल वही है कि इस शक्ति का इस्तेमाल किसलिए होगा?यदि युवा ऊर्जा विवेक, अध्ययन, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ जाए तो वही ऊर्जा राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। यदि वह अंधी भीड़, नफरत, भ्रम और उन्माद में बदल जाए तो वही शक्ति विनाश का कारण भी बन सकती है।इसलिए आज के युवा को भगत सिंह से केवल उनकी तस्वीर, पगड़ी और शहादत नहीं लेनी चाहिए। उनसे पढ़ने की आदत, सवाल पूछने का साहस, विचारों की स्वतंत्रता, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता और देश के भविष्य के प्रति जिम्मेदारी सीखनी चाहिए।युवा मानव-जीवन का वसंतकाल है। वसंत केवल फूलों का मौसम नहीं होता, वह नई कोंपलों के जन्म का समय भी होता है। आज की युवा पीढ़ी तय करेगी कि आने वाले भारत में कौन-से फूल खिलेंगे और कौन-सी नई कोंपलें इतिहास का रूप बदलेंगी।भगत सिंह की स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि युवा केवल क्रांति की भाषा न सीखे, बल्कि विचार की क्रांति को समझे। स्वतंत्रता को केवल अधिकार न माने, बल्कि जिम्मेदारी भी समझे। और स्वराज को केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि स्वयं पर शासन करने की जीवन पद्धति बनाए।क्योंकि देश का भविष्य केवल युवाओं के हाथों में नहीं होता, भविष्य की दिशा भी उन्हीं के विचारों से तय होती है।
अनिकेत सिंह
लवकुश कोचिंग क्लास,
शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,
अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,
बड़ौदा-390008 (गुजरात)
मो- 8368681336