स्नेहा सिंह
जैसे ही मानसून की पहली बारिश होती है, सबसे पहले सरकारी तंत्र की प्रीमानसून तैयारियों की पोल खुल जाती है और उसके बाद एक और सरकारी दिखावा भी भीग जाता है। बारिश शुरू होते ही सरकारी विभाग अपनी परिचित औपचारिकताओं में व्यस्त हो जाते हैं। वन विभाग, नगरपालिकाएं, जिला प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं लाखों पौधे लगाने के लक्ष्य घोषित करती हैं, प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं और अगले वर्ष के मानसून तक चलने वाले कार्यक्रमों की लंबी सूची तैयार कर ली जाती है। लेकिन पौधों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। इन अभियानों में विज्ञापनों, तस्वीरों, सोशल मीडिया की चर्चाओं और अधिकारियों की कथित उपलब्धियों के अलावा वास्तव में कुछ भी दिखाई नहीं देता।read more:https://khabarentertainment.in/cunning-man-arrested-for-pressuring-woman-into-marriage-through-blackmail/हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाए जाने के दावे किए जाते हैं और हर साल आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर हरियाली उतनी ही तेजी से घटती चली जाती है। यह उस व्यवस्था की लापरवाही का स्वाभाविक परिणाम है, जहां जवाबदेही की जड़ें भी उतनी ही कमजोर हैं, जितनी सड़क किनारे गड्ढों में रोप दिए गए उन पौधों की, जिन्हें न पानी मिलता है, न संरक्षण और न ही जीवित रहने का वास्तविक अवसर।दिल्ली इसका सबसे सटीक उदाहरण है। पिछले चार वर्षों में राजधानी में 2 करोड़ 5 लाख पौधे लगाए गए, लेकिन उनमें से केवल 60 प्रतिशत ही जीवित रह सके। जब देश की राजधानी का यह हाल है, जहां सरकारी मशीनरी सबसे अधिक सक्रिय मानी जाती है, तो दूरदराज के जिलों और गांवों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए जब भी हरित क्षेत्र बढ़ने के दावे किए जाते हैं, उनकी गंभीरता से पड़ताल आवश्यक हो जाती है।दिसंबर 2024 में जारी ‘भारत वन स्थिति रिपोर्ट–2023’ में दावा किया गया कि वर्ष 2021 से 2023 के बीच देश के कुल वन एवं वृक्ष क्षेत्र में 1,445 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है और यह देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत हो गया है। हालांकि रिपोर्ट प्रकाशित होते ही अनेक पर्यावरणविदों ने इस पर गंभीर आपत्तियां जताईं। विशेषज्ञों का कहना था कि सरकार ने बाँघस के बागानों, नारियल के पेड़ों तथा बगीचों को भी वन क्षेत्र में शामिल कर लिया, जिससे वास्तविक स्थिति की बजाय आंकड़ों को अधिक आकर्षक बनाकर प्रस्तुत किया गया। रबर, नीलगिरी और बबूल जैसे व्यावसायिक वृक्षारोपण जैव।विविधता की दृष्टि से उन प्राकृतिक, सघन और प्राचीन वनों की बराबरी नहीं कर सकते, जिनका विकास होने में सदियों लग जाती हैं और जिनका प्रत्येक वृक्ष असंख्य जीवजंतुओं का आश्रय होता है। दुर्भाग्य से ऐसे विशाल और घने वृक्ष लगातार काटे जा रहे हैं, लेकिन उनका कोई समुचित लेखाजोखा नहीं रखा जाता।वनों की निगरानी करने वाली संस्था ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार वर्ष 2001 से 2024 के बीच भारत ने 23.1 लाख हेक्टेयर हरित क्षेत्र खो दिया, जो वर्ष 2000 की तुलना में लगभग 7.1 प्रतिशत की कमी है। इसके कारण लगभग 1.29 गीगाटन कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन हुआ। वर्ष 2015 से 2020 के बीच वनों की कटाई के मामले में भारत विश्व में दूसरे स्थान पर रहा, जहां प्रतिवर्ष लगभग 6.68 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुआ।ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि वृक्षारोपण के बड़े-बड़े दावों और वास्तविकता के बीच कितना गहरा अंतर है। विकास की लगभग हर परियोजना, चाहे वह राष्ट्रीय राजमार्ग हो, बांध हो, खनन परियोजना हो या औद्योगिक विस्तार, सबसे पहले पेड़ों की बलि लेती है। पूर्वोत्तर राज्यों में झूम खेती, मध्य भारत में खनन और पश्चिमी घाटों में सड़क निर्माण तथा पर्यटन का बढ़ता दबाव मिलकर उन वनों को नष्ट कर रहा है, जिन्हें तैयार करने में प्रकृति को हजारों वर्ष लगे थे।विश्व में प्रति व्यक्ति औसतन लगभग 400 पेड़ उपलब्ध हैं, जबकि भारत में यह संख्या इससे कहीं कम है। विडंबना यह है कि जिस देश ने कभी ‘चिपको आंदोलन’ के माध्यम से वृक्षों की रक्षा का संदेश पूरी दुनिया को दिया था, वहीं आज बिना पर्याप्त विचार किए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है।ऐसे समय में कनाडा के क्यूबेक प्रांत के एक छोटे से नगर से यह समाचार आता है कि वहाँ पेड़ों को आधिकारिक रूप से अधिकार संपन्न जीवित अस्तित्व के रूप में मान्यता दी गई है। ओंटारियो में ‘म्युनिसिपल एक्ट–2001’ के अंतर्गत नगरपालिकाओं को वृक्ष संरक्षण के लिए विस्तृत उपनियम बनाने और उन्हें कठोरता से लागू करने का अधिकार प्राप्त है।टोरंटो में किसी पेड़ को काटने पर 500 डालर से लेकर एक लाख डालर प्रति पेड़ तक का जुर्माना लगाया जाता है तथा गंभीर उल्लंघन की स्थिति में अतिरिक्त एक लाख डालर का दंड भी लगाया जा सकता है। इसी का परिणाम है कि टोरंटो हर वर्ष लगभग एक लाख बीस हजार नए पेड़ लगाता है और शहर के लगभग 11 करोड़ 50 लाख पेड़ों का वैज्ञानिक प्रबंधन करता है। इससे शहर को प्रतिवर्ष 5 करोड़ 50 लाख डालर से अधिक का पर्यावरणीय लाभ प्राप्त होता है। यह केवल पर्यावरण संरक्षण का नहीं, बल्कि मजबूत आर्थिक सोच का भी उदाहरण है। दुर्भाग्य से भारत में यह दृष्टिकोण अभी तक न तो नीतियों का हिस्सा बन पाया है और न ही प्रशासनिक व्यवस्था का।उल्लेखनीय है कि इथियोपिया का उदाहरण केवल प्रेरणादायक ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण सीख भी है। बीसवीं सदी की शुरुआत में इथियोपिया का लगभग 35 प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित था, लेकिन वर्ष 2000 तक यह घटकर मात्र 4 प्रतिशत रह गया। इस गंभीर स्थिति से उबरने के लिए इथियोपिया ने जिस रास्ते को अपनाया, वह आज विश्व के लिए मिसाल बन चुका है।जुलाई 2019 में देशभर के एक हजार निर्धारित स्थानों पर केवल 12 घंटे के भीतर साढ़े तीन करोड़ से अधिक पौधे लगाकर उसने एक ही दिन में सर्वाधिक वृक्षारोपण का विश्व रिकॉर्ड बनाया। ‘ग्रीन लेगेसी’ कार्यक्रम के अंतर्गत लगाए गए 70 प्रतिशत से अधिक पौधे स्थानीय प्रजातियों के थे, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिली। इस अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में 3 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दिया, जिनमें लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं और युवा थे।वर्ष 2019 से 2023 के बीच इथियोपिया का वन क्षेत्र 17.2 प्रतिशत से बढ़कर 23.6 प्रतिशत हो गया। यह वृद्धि केवल सरकारी आंकड़ों का खेल नहीं थी, बल्कि धरती पर दिखाई देने वाली वास्तविक हरियाली थी। इथियोपिया की सबसे बड़ी उपलब्धि विश्व रिकॉर्ड बनाना नहीं, बल्कि वृक्षारोपण को राष्ट्रीय जनआंदोलन का स्वरूप देना था, जिसमें सरकार, किसान, विद्यार्थी, महिलाएं और आम नागरिक सभी समान रूप से सहभागी बने।इसी प्रकार कोस्टा रिका का अनुभव भी अत्यंत शिक्षाप्रद है। 1970 के दशक में वहां का वन क्षेत्र घटकर केवल 17 प्रतिशत रह गया था, लेकिन वर्ष 2024 तक वह बढ़कर 54 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस सफलता के पीछे कोई विशाल सरकारी खर्च नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नीति थी, जिसके तहत वन भूमि को सुरक्षित रखने वाले किसानों और भूमि स्वामियों को आर्थिक प्रोत्साहन दिया गया। परिणामस्वरूप लोगों ने जंगलों को बचाना अपने आर्थिक हित से जोड़ लिया और वनों का संरक्षण एक जनभागीदारी अभियान बन गया।रवांडा ने भी सामुदायिक भागीदारी के बल पर उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। वर्ष 2000 में जहां उसका वन क्षेत्र लगभग 10 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2024 तक यह बढ़कर 30 प्रतिशत से अधिक हो गया। वहां की एक अनूठी व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक नागरिक हर महीने एक शनिवार की सुबह पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक कार्यों के लिए समर्पित करता है। कड़े कानूनों और सामाजिक उत्तरदायित्व के इस प्रभावी समन्वय ने रवांडा को अफ्रीका में वन संरक्षण का अग्रणी देश बना दिया है।भारत के पास इन सभी देशों से सीखने का सुनहरा अवसर है। हमारे देश में न संसाधनों की कमी है, न भूमि की और न ही मानव शक्ति की। यदि किसी चीज़ का अभाव है, तो वह है राजनीतिक इच्छाशक्ति, कठोर कानूनी व्यवस्था और दूरदर्शी सोच। आज जब अल नीनो का प्रभाव, लगातार बढ़ती गर्मी और गहराता सूखा हर वर्ष अधिक भयावह होता जा रहा है, तब वृक्षारोपण को केवल एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक दायित्व के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता है।जिस देश में पीपल को पवित्र और बरगद को अमरत्व का प्रतीक माना जाता है, वहां वृक्षों को जीवित अस्तित्व का दर्जा देने के लिए किसी नई आस्था की नहीं, बल्कि केवल दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है। जब यह समझ विकसित होगी कि काटा गया प्रत्येक वृक्ष केवल लकड़ी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांसें भी अपने साथ ले जाता है, तभी वास्तविक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।