क्रांति के कवि – पाश

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 डॉ. निर्मल सुवासिया:पंजाबी साहित्य के चर्चित क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह संधु का जन्म जालंधर जिले की नकोदर तहसील में तलवंडी सलेम नामक गाँव में 9 सितम्बर, 1950 को हुआ था। साहित्य जगत में इनको ‘कवि पाश’ उपनाम से काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई हैं। महज 15 वर्ष की अल्पायु में ही पाश ने पहली कविता लिख दी। सन् 1969 में इनका पहला काव्य संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित होने के साथ ही कवि पाश की प्रसिद्धि एक चर्चित क्रांतिकारी कवि के रूप में होने लगी। उन्होंने खालिस्तानी विचारधारा का कड़ा विरोध किया है। सन् 1974 में ‘उड्डदे बाजाँ मगर’ तथा सन् 1978 में उनका तीसरा काव्य संग्रह ‘साडे समियाँ विच’ पंजाबी भाषा में प्रकाशित हुआ तथा कवि पाश का चौथा काव्य संग्रह ‘लडांगे साथी’ उनकी मृत्यु के कुछ दिनों पश्चात सन् 1988 में उनकी स्मृति समारोह के अवसर पर प्रकाशित होकर सब के सामने आया। पाश के चार काव्य संग्रहों में लगभग 130 कविताएँ संकलित हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने हाक, सियाड़, हेमज्योति व एंटी 47 जैसी पत्रिकाओं का संपादन का कार्य भी किया है।पाश प्रत्येक प्रकार के अन्याय, शोषण, पाखंड, अंधविश्वास, संकीर्ण सोच जैसी विसंगतियों का पुरजोर विरोध करते हुए इन सब में बदलाव या परिवर्तन लाना चाहते थे। कवि पाश की अधिकांश कविताएँ सत्यता व क्रांति की कविताएँ हैं, ये कविताएँ शोषक वर्गों की पराजय तथा शोषितों की विजय निश्चित करने हेतु क्रांति का आह्वान करती हैं। समाज में एक शक्तिशाली मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य के शोषण पर आधारित व्यवस्था का लंबे समय से वर्चस्व रहा है तथा इस वर्ग के प्रतिनिधि पूंजीपतियों का उत्पादन के साधनों पर अधिकार होने के कारण इन्होंने निम्न वर्ग के मनुष्यों के अधिकारों का हनन कर उन पर अत्याचार किए हैं। मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित दूषित व्यवस्था के नाश हेतु उन्होंने सदैव संघर्षमय कार्य किए हैं, कवि पाश शुरू से ही ऐसा समाज चाहते थे जहाँ व्यक्ति स्वतंत्रता एवं समानता से जीवन का निर्वाह कर सके, जहाँ न कोई राजा होगा न ही कोई प्रजा, समाज में सभी मनुष्यों को आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक सभी क्षेत्रों में समान अधिकार प्राप्त हो, कवि पाश ऐसे ही एक वर्गहीन समाज के निर्माण के सपने देखते थे। पाश की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक-सामाजिक बदलाव अर्थात क्रांति और विद्रोह का है। उनमें एक तरफ सांमती-उत्पीड़कों के प्रति जबरदस्त गुस्सा व नफरत का भाव है, वहीं अपने जन के प्रति अथाह प्यार है।कवि पाश की ‘हाथ’ कविता शोषक वर्गों को दंड विधान देने की प्रेरणा से भरी हुई है। समाज में निम्न वर्ग के साथ बहुत अन्याय हो चुका है और अब इस वर्ग को शोषण के विरुद्ध खड़ा होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी पड़ेगी। इसी उद्देश्य से कवि ने इस कविता में निम्न वर्ग के हृदय में क्रांति की भावना जगाने का प्रयास किया हैं-

“हाथ यदि हों तो

जोड़ने के लिए ही नहीं होते

न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं

यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं”

1985 में पाश ने अमेरिका से ‘एंटी-47’ पत्रिका के जरिये खालिस्तान का खुला विरोध किया। दलित-पीड़ित शोषित कंठों से निकली आवाज को कविता में पिरोते हुए मार्च 1988 में वह छुट्टियां बिताने गांव आये थे और 23 मार्च को आतंकवादियों ने नहाते समय उनकी हत्या कर दी।

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