दूसरे वर्ष के विद्यार्थियों ने कर्मांकुश नाटक का किया मंचन

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नई दिल्ली, । नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के दूसरे वर्ष के विद्यार्थियों ने कर्मांकुश नाटक का किया मंचन। इस नाटक का मंचन अभिमंच सभागार में किया गया। जिसका निर्देशन सुप्रसिद्ध नाट्यकर्मी सुमन साहा ने किया। लाइटिंग डिज़ाइन संगीत श्रीवास्तव ने किया। वहीं संगीत दिया दिशारी चक्रवर्ती ने कम्पोज किया था। ‘कर्मांकुश’ महाभारत की एक गहन, अरेखीय (non-linear) पुनर्कल्पना है, जो भास के शास्त्रीय नाटकों पर आधारित है। यह कथा दुर्योधन का एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यक्ति के अपने ही कर्मों के उस अपरिहार्य “जाल” की पड़ताल की गई है, जिससे बच निकलना असंभव होता है। इस प्रस्तुति की शुरुआत ‘उरुभंगम’ के गंभीर और उदास वातावरण में होती है। दुर्योधन युद्धभूमि में पराजित अवस्था में पड़ा है; उसकी जांघें चूर-चूर हो चुकी हैं और उसका साम्राज्य पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। शारीरिक विनाश की इस अवस्था से, नाटक दुर्योधन की स्मृतियों और उसके अहंकार की गहराइयों में उतर जाता है। कथा ‘दूत-वाक्यम’ के प्रसंग में पीछे लौटती है, जहाँ दुर्योधन के अहंकार का चरम रूप दिखाई देता है—जब वह कृष्ण के शांति-प्रयासों का उपहास करता है, उस दिव्य दूत को मात्र एक संदेशवाहक कहकर उसका तिरस्कार करता है, और उसे बंदी बनाने का दुस्साहस करता है।
इसके बाद, नाटक पुनः उस मरणासन्न राजा के आत्म-चिंतन की ओर लौट आता है। जैसे ही संवाद दुर्योधन की उन सबसे खोखली “विजियों” द्रौपदी के ‘वस्त्र-हरण’ और अभिमन्यु के लिए रचे गए ‘चक्रव्यूह’ के कपटपूर्ण जाल की ओर मुड़ते हैं, प्रस्तुति का प्रवाह ‘दूत-घटोत्कचम’ की ओर मुड़ जाता है। यहाँ, वह राक्षस-राजकुमार (घटोत्कच) संपूर्ण विनाश की एक भयानक भविष्यवाणी लेकर आता है, और कौरवों को उनकी क्रूरता की नैतिक कीमत का सामना करने के लिए विवश करता है। ‘कर्मांकुश’ का समापन पुनः ‘उरुभंगम’ के अंतिम क्षणों में लौटकर होता है, जहाँ अपने ही वंश के खंडहरों के बीच, नायक को एक दुखद किंतु गरिमामय आत्म-बोध (clarity) की प्राप्ति होती है।
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यह प्रस्तुति कर्मों के प्रतिफल (retribution) के चक्रीय स्वभाव, कूटनीति की विफलता, और मृत्यु की दहलीज पर ‘कर्म’ के मर्मस्पर्शी बोध की पड़ताल करती है। भास के तीन अत्यंत प्रभावशाली ‘दूत’ नाटकों और उनकी एकमात्र त्रासदी (tragedy) को एक साथ पिरोकर, यह प्रस्तुति एक ऐसे मनुष्य का अत्यंत मार्मिक और स्मरणीय चित्र उकेरती है, जिसे अपने ही कर्मों द्वारा रचे गए ‘भूतों’ (अतीत की छायाओं) का सामना करना पड़ता है। कुल मिलाकर नाटक की साज सज्जा व प्रस्तुति बेहतरीन थी। अभिनय में विद्यार्थियों ने बहुत परिश्र्म किया थ।

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