नई दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने गर्भवती महिला भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी उर्वशी सेंगर की प्रशिक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वर्ष 1993 के नियमों पर कड़ी टिप्पणी की है। न्यायालय ने कहा कि यदि कोई महिला अधिकारी चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो केवल गर्भावस्था के आधार पर उसे प्रशिक्षण से वंचित रखने का औचित्य क्या है। अदालत ने संकेत दिया कि मातृत्व महिलाओं के करियर में बाधा नहीं बनना चाहिए। read more:https://worldtrustednews.in/yogi-government-working-to-make-youth-skilled-in-line-with-industry-demand/ यह मामला उस पुराने कार्यालय ज्ञापन से जुड़ा है, जिसके तहत प्रशिक्षण के दौरान यदि कोई महिला भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी गर्भवती हो जाती है तो उसका प्रशिक्षण रोक दिया जाता है और उसे प्रसव के एक वर्ष बाद अगले बैच के साथ दोबारा प्रशिक्षण लेने का प्रावधान है। उर्वशी सेंगर ने इसी नियम को चुनौती देते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि प्रशिक्षण का बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है और बीच में शामिल होने से प्रशिक्षण का उद्देश्य प्रभावित होगा। इस पर न्यायालय ने तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया, लेकिन यह भी कहा कि नियमों की वैधता और संवैधानिकता पर विस्तार से विचार किया जाना आवश्यक है। मामला अब संबंधित न्यायाधिकरण में आगे बढ़ेगा। उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों को महिलाओं के समान अवसर और मातृत्व अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि इस मामले में पुराने नियमों में बदलाव होता है, तो भविष्य में गर्भवती महिला अधिकारियों के प्रशिक्षण और सेवा शर्तों को लेकर नई व्यवस्था लागू हो सकती है।