स्नेहा सिंह
भारत कृषि प्रधान देश है और आज भी देश की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में खेती का स्वरूप तेजी से बदला है। हरित क्रांति ने देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन उसी के साथ रासायनिक खेती पर बढ़ती निर्भरता ने मिट्टी, जल, पर्यावरण और किसान, चारों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं। इसलिए आज यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि भविष्य की खेती का स्वरूप कैसा हो? क्या हम पूरी तरह प्राकृतिक खेती की ओर लौटें, जैविक खेती अपनाएं या फिर टिकाऊ (सस्टेनेबल) खेती का ऐसा माडल विकसित करें, जिसमें परंपरा और आधुनिक विज्ञान दोनों का संतुलित समावेश हो?इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान रासायनिक खेती पर सवाल क्यों उठ रहे हैं।हरित क्रांति से पहले भारत में परंपरागत प्राकृतिक खेती होती थी। किसान अपने खेत के लिए बीज स्वयं तैयार करता था। गोबर और जैविक पदार्थों से खाद बनती थी। बैलों से जुताई होती थी और नीम जैसी प्राकृतिक वस्तुओं से कीट नियंत्रण किया जाता था। किसान काफी हद तक आत्मनिर्भर था। लेकिन उस समय उत्पादन कम था और बढ़ती आबादी की खाद्यान्न आवश्यकता पूरी करना कठिन होता जा रहा था।
1960 के दशक में देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। तब हरित क्रांति आई। उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई और आधुनिक कृषि यंत्रों के प्रयोग से उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। भारत खाद्यान्न आयात करने वाले देश से आत्मनिर्भर राष्ट्र बन गया। इसके लिए हरित क्रांति का योगदान सदैव याद रखा जाएगा।लेकिन समय के साथ इस माडल की सीमाएं भी सामने आने लगीं। किसान अपने बीज, खाद और कीटनाशकों के लिए बाजार पर निर्भर हो गया। हर मौसम में नई खरीद आवश्यक हो गई। लागत लगातार बढ़ती गई और खेती का लाभ घटने लगा। दूसरी ओर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित हुई। भूजल प्रदूषित हुआ और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।read more:https://pahaltoday.com/patanjali-yogpeeth-organised-a-three-day-free-yoga-therapy-and-meditation-camp/सिंचाई के क्षेत्र में भी अनेक समस्याएं सामने आईं। अधिकांश किसान खेतों में आवश्यकता से अधिक पानी भर देते हैं, जबकि पौधे को केवल जड़ों के आसपास नमी चाहिए होती है। अधिक सिंचाई से मिट्टी की संरचना खराब होती है, उसमें हवा का प्रवेश कम हो जाता है और कई क्षेत्रों में लवणता बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप उपजाऊ भूमि भी धीरे-धीरे बंजर होने लगती है।इसी प्रकार रासायनिक उर्वरक पूरे खेत में फैला दिए जाते हैं, जबकि पौधे को पोषक तत्व जड़ों के आसपास ही चाहिए होते हैं। इससे उर्वरक की बर्बादी होती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से फलों, सब्जियों और अनाज में रासायनिक अवशेष बढ़ने लगे हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हैं।इन समस्याओं को देखते हुए वैज्ञानिकों ने ड्रिप सिंचाई, फर्टिगेशन, छोटे कृषि यंत्र और आधुनिक तकनीकों का विकास किया है, ताकि पानी और उर्वरकों का उपयोग अधिक वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके। लेकिन इसके साथ-साथ वैकल्पिक कृषि प्रणालियों पर भी चर्चा तेज हुई है।प्राकृतिक खेती इन्हीं विकल्पों में प्रमुख है। यह भारत की परंपरागत कृषि प्रणाली पर आधारित है। इसमें देशी बीज, गोबर, गोमूत्र, जीवामृत, बीजामृत, आच्छादन तथा फसल चक्र जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। इससे खेती की लागत बहुत कम हो जाती है और मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान स्थानीय संसाधनों पर आधारित रहता है। बाहरी बाजार पर उसकी निर्भरता कम होती है। खेत की जैव विविधता सुरक्षित रहती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।फिर भी प्राकृतिक खेती की कुछ सीमाएं हैं। कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए अभी भी पर्याप्त प्रभावी प्राकृतिक विकल्प उपलब्ध नहीं हैं। कई बार उत्पादन भी रासायनिक खेती की तुलना में कम मिलता है। इस पद्धति में अधिक श्रम की आवश्यकता होती है और देशी गाय की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही कारण है कि अधिकांश किसान इसे बड़े पैमाने पर अपनाने में संकोच करते हैं।दूसरा विकल्प जैविक या सजीव खेती का है। इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए केंचुआ खाद, हरी खाद और जैविक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है और उसकी संरचना बेहतर होती है।जैविक खेती पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं। जैविक प्रमाणन प्राप्त करना कठिन और समय लेने वाला कार्य है। यदि आसपास के खेतों में रासायनिक खेती होती है तो उसका प्रभाव जैविक खेतों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर परिवर्तन के दौरान कुछ वर्षों तक उत्पादन कम हो जाता है। इससे किसानों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।तीसरा और सबसे व्यावहारिक विकल्प टिकाऊ या सस्टेनेबल खेती का माना जा रहा है। यह अवधारणा 1992 में रियो डी जेनेरियो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन के बाद विश्वभर में प्रमुखता से सामने आई। इसका उद्देश्य विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करना है।टिकाऊ खेती किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं है। इसमें आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान दोनों का समन्वय किया जाता है। जल संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खाद, फसल विविधीकरण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग तथा वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन, इन सभी को इसमें शामिल किया जाता है।भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश किसानों के पास छोटे और सीमांत खेत हैं, किसी एक कृषि प्रणाली को पूरी तरह अपनाना व्यावहारिक नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि प्राकृतिक खेती की पर्यावरणीय विशेषताओं, जैविक खेती की मिट्टी संरक्षण तकनीकों और टिकाऊ खेती की वैज्ञानिक पद्धतियों का समन्वित माडल विकसित किया जाए।सरकार को भी इस दिशा में गंभीर पहल करनी होगी। यदि प्राकृतिक और जैविक खेती अपनाने वाले किसानों को पर्याप्त प्रशिक्षण, सब्सिडी, बाजार और तकनीकी सहायता मिले तो अधिक किसान इन विकल्पों की ओर बढ़ सकते हैं। कृषि विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों को भी ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी, जो उत्पादन कम किए बिना रासायनिक निर्भरता घटा सके।आज आवश्यकता किसी एक विचारधारा के समर्थन या विरोध की नहीं है, बल्कि व्यावहारिक समाधान खोजने की है। किसान की आय बढ़े, मिट्टी स्वस्थ रहे, जल संसाधन सुरक्षित रहें और पर्यावरण भी संरक्षित रहे, इसी संतुलन में भारतीय कृषि का भविष्य छिपा है।कृषि केवल अन्न उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और समाज के बीच संतुलन का आधार भी है। इसलिए भविष्य की खेती वही होगी जो किसान को समृद्ध बनाए, उपभोक्ता को सुरक्षित भोजन दे और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित करे। यही भारत की कृषि नीति का लक्ष्य होना चाहिए।