साहब की घड़ी

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 
इस देश में समय का हाल वही है जो किसी सरकारी अस्पताल के वेंटिलेटर का—धड़कन चल रही है, पर भरोसा किसी को नहीं। लोग कहते हैं ‘समय बीत रहा है’, जबकि सच्चाई यह है कि हम बीत रहे हैं और समय हमें किसी पुराने अखबार की तरह रद्दी के भाव तौल रहा है। एक महाशय थे, जो ‘पंचवर्षीय योजनाओं’ की तरह अपना भविष्य बुन रहे थे। उन्हें गुमान था कि वे समय के सारथी हैं। वे हाथ में ऐसी ‘स्मार्ट’ घड़ी बाँधते थे जो उनके दिल की धड़कन से लेकर उनके बैंक बैलेंस तक का हिसाब रखती थी। पर उस दिन मामला ‘ऊपर की अदालत’ का था। सुबह-सुबह उनके घर के बाहर एक आदमी आकर बैठ गया, जिसके चेहरे पर वैसी ही शांति थी जैसी किसी घोटाले की फाइल दब जाने के बाद किसी मंत्री के चेहरे पर होती है। साहब ने पूछा, “कौन हो भाई? यहाँ क्यों धरना दे रखा है?” वह बोला, “हुजूर, मैं समय का पटवारी हूँ। आपकी सांसों का खसरा-खतौनी जाँचने आया हूँ। सुना है आप वक्त को मुट्ठी में करने की फिराक में हैं?” साहब बिफर पड़े, “अबे, जा यहाँ से! हम वर्तमान के मालिक हैं और भविष्य के सट्टेबाज।” पटवारी मुस्कुराया—वैसी ही मुस्कान जैसे शेर शिकार को देखकर ‘शाकाहार’ पर प्रवचन देने से पहले देता है। वह बोला, “मालिक, आप तो ‘धोबी के कुत्ते’ वाली स्थिति में हैं। वर्तमान आपको पहचानता नहीं और भविष्य ने अभी गोद लिया नहीं। आप तो बस उस ‘त्रिशंकु’ की तरह लटके हैं जो सोचता है कि स्वर्ग जा रहा है, पर असल में ग्रेविटी का शिकार है।”  शहर में शोर मच गया कि साहब का ‘वक्त’ रुक गया है। साहब ने सेल बदला, घड़ी पटकी, यहाँ तक कि कैलेंडर के पन्ने भी फाड़ दिए। पर अजीब बात! बाहर सूरज ढल ही नहीं रहा था। चिड़ियाँ हवा में रुकी थीं और साहब की चाय का धुआं भी किसी ‘स्टैच्यू’ की तरह खड़ा था। साहब को लगा कि वे अमर हो गए। उन्होंने अपनी पत्नी को पुकारा, पर पत्नी की आवाज़ ऐसे फंसी थी जैसे किसी ‘बफटिंग’ करते हुए वीडियो की तस्वीर। वे समझ गए—यह वरदान नहीं, यह ‘सस्पेंस’ का चरम है। क्या वे मर चुके हैं? या खुदा ने उनके लिए समय का चक्का ‘हाफ-क्लच’ पर छोड़ दिया है? तभी उस पटवारी की आवाज़ आई, “साहब, इसे कहते हैं ‘सन्नाटा’। जब इंसान खुद को वक्त से ऊपर समझने लगता है, तब वक्त उसे अपनी लाइब्रेरी की एक ऐसी किताब बना देता है जिसे कोई नहीं पढ़ता। आप अपनी ‘महिमा’ के विज्ञापन छापते रहे, और यहाँ समय ने आपकी ‘एक्सपायरी डेट’ पर अपनी मुहर लगा दी।”read more:https://pahaltoday.com/raghav-chadha-becomes-chairman-of-parliaments-petition-committee/ साहब घिघियाने लगे, “कोई तो रास्ता होगा? कोई तो रिश्वत? कोई तो गॉडफादर?” पटवारी ने एक कागज़ निकाला और कहा, “रास्ता एक ही है। अपनी इस ‘मैं’ वाली घड़ी को उतारकर उस ईश्वर की खूँटी पर टांग दो, जो बिना सुइयों के ब्रह्मांड चला रहा है। वरना आप ‘माया मिली न राम’ वाले मुहावरे का जीता-जागता विज्ञापन बन जाएंगे।”साहब ने कांपते हाथों से अपनी स्मार्ट घड़ी उतारी। जैसे ही घड़ी ज़मीन पर गिरी, अचानक सब कुछ तेज़ी से घूमने लगा। सूरज बिजली की रफ़्तार से डूबा और उगा। साहब को लगा कि अब वे बच गए, अब वे भविष्य की गोद में हैं। हवा चली, सन्नाटा टूटा। साहब ने चैन की सांस ली और अपने चेहरे पर हाथ फेरा। पर हाथ को चेहरा मिला ही नहीं! सामने वही पुराना पटवारी खड़ा था, जो अब हाथ में एक झाड़ू लिए फर्श साफ कर रहा था। साहब ने चीखकर पूछा, “मैं कहाँ हूँ? मेरा भविष्य कहाँ है?” पटवारी ने इत्मीनान से जवाब दिया, “साहब, आप भविष्य की चिंता कर रहे थे, जबकि आप पिछले दस मिनट से एक ‘संस्मरण’ बन चुके हैं। अभी जो आपने जीया, वह आपकी आत्मा का ‘एक्जिट पोल’ था। अब आप न वर्तमान में हैं, न भविष्य में। आप बस इस कहानी का एक ‘फुल स्टॉप’ हैं, जिसे पाठक पढ़कर पन्ना पलटने वाला है।” साहब गायब थे। कुर्सी खाली थी। घड़ी टूट चुकी थी। और ऊपर बैठा वह ‘महान मुनीम’ अपनी डायरी में लिख रहा था—”एक और गया, जो समझता था कि अलार्म लगाने से सूरज उसके इशारे पर जागता है।”

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