डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
चमेली ने अभी पत्तल में दो सूखी रोटियाँ और नमक-मिर्च की चटनी करीने से सजाई ही थी कि गलियारे में जूतों की चरमराहट गूँजी। पेट के भीतर चूहे कत्थक कर रहे थे और बाहर सूरज खोपड़ी पर तांडव मचा रहा था। “चमेली! ओ चमेली! जल्दी आ, तीसरी बी में लड़के ने उल्टी कर दी है। सब बजबजा रहा है,” चपरासी ने मुँह बिगाड़कर सूचना दी। चमेली के हाथ में निवाला था, आँखों में भूख की नमी। उसने डबडबाई आँखों से दफ़्तर की ओर देखा जहाँ पंखे की हवा में हेडमास्टर साहब अपनी तोंद सहला रहे थे। “साहब, बस दो कौर खा लूँ… सुबह से चाय की एक घूँट भी न उतरी हलक से,” उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में वही थरथराहट थी जो पतझड़ के आखिरी पत्ते में होती है। साहब ने चश्मा नाक पर टिकाया और बोले, “भोजन? यह सरस्वती का मंदिर है चमेली, कोई ढाबा नहीं। घंटी बजने वाली है, क्या बच्चे उस दुर्गंध में क ख ग घ सीखेंगे? पहले सफ़ाई, फिर शिष्टाचार।” चमेली के सामने उसकी भूख एक अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ी थी। वह उठी, हाथ धोए नहीं बल्कि पोंछ लिए, क्योंकि साफ़ पानी तो केवल साहब के सुराही में था।read more:https://pahaltoday.com/makanpur-sharif-former-head-ruman-siddiqui-reached-the-court-of-hazrat-syed-badiuddin-zinda-shah-madar/
वह कक्षा की ओर बढ़ी। गलियारे में पसरी हुई वह गंध शिक्षा की गरिमा को चुनौती दे रही थी। बच्चे नाक पर रुमाल दबाए ऐसे देख रहे थे जैसे चमेली ही उस गंदगी की जननी हो। उसने बाल्टी उठाई। फिनाइल की तीखी गंध और उस अर्द्ध-पचित भोजन के ढेर के बीच एक अजीब सा युद्ध छिड़ा था। वह झुककर पोंछा लगाने लगी। हर रगड़ के साथ उसका अपना खाली पेट मरोड़ खा रहा था। “जल्दी कर चमेली, देर हो रही है,” मास्टर जी ने दूर से ही डंडा फटकारा। चमेली को लगा कि वह ज़मीन नहीं, अपनी ही अंतड़ियों को साफ़ कर रही है। साहब का तर्क पत्थर की लकीर था—ज्ञान के मार्ग में दुर्गंध का क्या काम? चाहे वह दुर्गंध किसी भूखे पेट की आह से निकल रही हो या किसी बीमार बच्चे के पेट से। उसने एक-एक कण को ऐसे समेटा जैसे अपनी ही खुशियों के अवशेष बटोर रही हो। फिनाइल के सफ़ेद झाग में उसकी भूख का रंग कहीं ओझल हो गया था। काम खत्म हुआ। पसीने से तर-बतर चमेली वापस अपनी पत्तल के पास पहुँची। रोटियाँ अब पत्थर हो चुकी थीं और चटनी पर मक्खियाँ अपना साम्राज्य स्थापित कर चुकी थी। उसने कांपते हाथों से जल का लोटा उठाया। तभी हेडमास्टर साहब टहलते हुए आए। “देख लिया न? काम पहले है। अब चैन से खाओ, आत्मानुभूति के साथ,” उन्होंने एक ऐसी मुस्कान फेंकी जो किसी भी गरीब की पत्तल में ज़हर घोलने के लिए काफी थी। चमेली ने निवाला तोड़ा। पर वह क्या? उसके गले में कुछ अटक गया। उसे लगा कि वह गंध, वह फिनाइल, वह घृणा सब उसके निवाले में समा गए हैं। उसने ज़ोर से अपनी आँखें मीचीं। साहब मुस्कुरा रहे थे, जैसे उन्होंने एक बड़ा तीर मार लिया हो। चमेली को लगा कि उसका गला घुट रहा है। वह भागकर नल की ओर गई, पर पानी सूखा था। “साहब, आखिर किसका बच्चा था वह? इतनी कम उम्र में इतना बदबूदार खाना?” चमेली ने हाँफते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक रिरियाहट थी, एक टीस थी जो शायद साहब के कोट के बटन तक भी नहीं पहुँच सकती थी। साहब ने बड़ी शान से अपनी घड़ी देखी और बोले, “अरे वह… वह तो मेरा ही छोटा वाला था। आज सुबह उसे घी के परांठे और बादाम का हलवा खिला दिया था, शायद पच नहीं पाया। कलक्टर बनेगा वह, अभी से पेट भारी रखने की आदत डाल रहा है।” चमेली का हाथ रुक गया। उसने अपनी पत्तल की ओर देखा जहाँ सूखी रोटी उसका मज़ाक उड़ा रही थी। एक अजीब सा सन्नाटा पूरे स्कूल में पसर गया। पंखा चल रहा था, पर हवा कहीं मर गई थी। चमेली की आँखों से एक आँसू टपका और सीधे नमक की डली पर जा गिरा। अचानक चमेली खिलखिलाकर हँस पड़ी। ऐसी हँसी जो श्मशान के सन्नाटे को चीर दे। साहब ठिठक गए। “पागल हो गई है क्या?” उन्होंने डाँटा। चमेली ने अपनी पत्तल उठाई और उसे कूड़ेदान में उलट दिया। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछे और साहब की आँखों में आँखें डालकर बोली, “साहब, आपका लाल कलक्टर ज़रूर बनेगा। आखिर उसके पेट का कचरा साफ़ करने के लिए भी तो उसने एक माँ को ही चुना। पर अफ़सोस, आज मैंने आपके बेटे की उल्टी साफ़ नहीं की।” साहब भड़के, “क्या बक रही है? अभी तो तूने रगड़-रगड़ कर फर्श चमकाया है!” चमेली ने मुस्कुराते हुए अपनी कोख पर हाथ रखा और कहा, “साहब, वह मेरा अपना बेटा था, जो आज सुबह से भूखा होने के कारण क्लास में गश खाकर गिरा और पित्त उगल दिया। मैं जिसे ‘साहब का लाल’ समझकर साफ़ कर रही थी, वह मेरे ही खून का आखिरी अंश था जो भूख बर्दाश्त नहीं कर पाया। शिक्षा के मंदिर में आज एक माँ ने अपने ही बच्चे की भूख को फिनाइल से धो दिया।” साहब का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, जैसे किसी ने उनके चेहरे पर वही फिनाइल उड़ेल दी हो। चमेली स्कूल के गेट से बाहर निकल रही थी, पीछे मुड़कर उसने नहीं देखा कि मंदिर की घंटी बज रही थी या किसी का ज़मीर।