डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
उस ओयो होटल की गलियाँ किसी भूलभुलैया जैसी थीं, जहाँ रोशनी भी डरी-सहमी सी अंदर आती थी। बाहर बोर्ड पर वेलकम ऐसे लिखा था जैसे कोई कसाई बकरे को पुचकार रहा हो। रिसेप्शन पर बैठा लड़का स्मार्टफ़ोन में डूबा था, उसे दुनिया के किसी भी अनैतिक कृत्य से परहेज नहीं था, बस आधार कार्ड ओरिजनल होना चाहिए। उसने अपनी पत्नी से झूठ बोला था कि ऑफिस की कोई जरूरी मीटिंग है। घर पर वह सीधी-सादी स्त्री उसके लिए घी के परांठे बना रही होगी, यह जानते हुए भी उसके माथे पर शिकन नहीं थी। वह सीढ़ियाँ चढ़ते हुए खुद को अधूरा-सा महसूस कर रहा था, जो अपनी ऊब को मिटाने के लिए एक स्पेस की तलाश में है। कमरा नंबर 302 का दरवाजा खुला और एयर कंडीशनर की घरघराहट ने उसका स्वागत किया। यहाँ की हवा में एक अजीब सी बासी खुशबू थी—सस्ते परफ्यूम और सिगरेट के धुएं का एक ऐसा कॉकटेल, जो केवल उन कमरों में मिलता है जहाँ लोग अक्सर अपनी नैतिकता उतार कर खूंटी पर टांग देते हैं।read more:https://pahaltoday.com/kinausan-morcha-demonstrated-regarding-public-problems/
कमरे का इंटीरियर शानदार होने का ढोंग कर रहा था। लाल रंग के भारी परदे ऐसे लटके थे मानो किसी बड़े रहस्य को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहे हों। बेड पर बिछी सफ़ेद चादर अपनी सफेदी से उसे चिढ़ा रही थी। उसने खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा। “तुम आ गईं?” उसने शून्य में पूछा। सामने वाले सोफे पर एक धुंधली सी आकृति उसे नजर आई। वह उसकी वही पुरानी प्रेमिका थी, जिससे उसने शादी के बड़े-बड़े वादे किए थे, शारीरिक संबंध बनाए थे और फिर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि वेदी पर उसे अकेला छोड़ दिया था। “देर कर दी तुमने,” सोफे से एक महीन आवाज आई। वह हंसा, “दुनिया को धोखा देना आसान है, पर खुद की इच्छाओं को नहीं। मेरी पत्नी को लगता है मैं एक आदर्श पुरुष हूँ। वह बेचारी तो उस गाय की तरह है जिसे खूंटे से बांध दिया गया है। उसे क्या पता कि मेरा असली वजूद यहाँ, इस बदबूदार कमरे की तन्हाई में तुम्हारे साथ खिलता है।” उसने व्हिस्की का गिलास भरा। “शादी का वादा करके हर बार तुम मुकर क्यों जाते हो?” उसने सवाल किया। वह बर्फ का टुकड़ा व्हिस्की में डालते हुए बोला, “शादी समझौता है डार्लिंग और इस तरह मिलने का सुख ही अलग है। समाज को धोखा देना मेरी मजबूरी थी और तुम्हें पाना मेरी जरूरत। देखो, आज भी मैं सब छोड़कर तुम्हारे पास आता हूँ।” वह प्रेमिका खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। उसकी साड़ी का पल्लू हवा में नहीं लहरा रहा था, जबकि पंखा पूरी रफ्तार पर था। पर वह अपनी ही धुन में मगन था। उसे लग रहा था कि वह एक साथ दो जीवन जीकर ईश्वर को मात दे रहा है। उसे लगा, कितना महान है उसका यह प्रेम कि वह अपनी पति वाली छवि को दांव पर लगाकर यहाँ आता है। “पर उस धोखे का क्या जो तुमने समाज के सामने मुझे दिया? जब मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊंगी, तो तुमने मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया था,” उसकी आवाज अब कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थी। वह झुंझलाया, “धोखा क्या होता है? एक सच को दूसरे सच से बदल देना स्मार्टनेस कहलाता है डार्लिंग। मेरी पत्नी को सुख मिल रहा है, तुम्हें मेरा वक्त मिल रहा है, और मुझे यह सुकून। इसमें बुरा क्या है?” कमरे की लाइटें अचानक डिम होने लगीं। ओयो होटल की वह चमक-दमक अब डरावनी सी लगने लगी थी। दीवारों पर टंगी पेंटिंग्स मानो उसे घूर रही थीं। उसने महसूस किया कि वह प्रेमिका कुछ ज्यादा ही शांत है। उसने पास जाकर उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर हाथ सिर्फ ठंडी हवा को चीरता हुआ निकल गया। “तुम इतनी ठंडी क्यों हो?” उसने पूछा। वह मुस्कुराई, एक ऐसी मुस्कुराहट जिसमें सातों जन्मों का हिसाब लिखा था। उसने गौर किया कि कमरे में उसके अलावा किसी और की परछाईं नहीं बन रही थी। दीवार पर टंगे कैलेंडर की तारीखें ठहर गई थीं। उसे याद आया, ठीक एक साल पहले इसी तारीख को उसने उस लड़की को आखिरी बार रुलाया था, और उसने उसके नाम का सुसाइड नोट लिखकर जान दे दी थी। अचानक रिसेप्शन वाले लड़के ने दरवाजा खटखटाया, “सर, किससे बात कर रहे हैं आप? रूम में तो आप अकेले ही चेक-इन हुए थे।” उसके हाथ से गिलास छूट गया। उसने पीछे मुड़कर देखा, सोफा खाली था। वह कांपने लगा। “लेकिन वह तो यहीं थी… अभी बात कर रही थी मुझसे…” उसने हकलाते हुए कहा। तभी कमरे की छत गायब हो गई और वहाँ अस्पताल की सफेद सीलिंग नजर आने लगी। वह ओयो का कमरा पिघलकर एक अस्पताल के आईसीयू में बदल गया। वह आदमी बेड पर लेटा था, वेंटिलेटर पर। उसके पास उसकी पत्नी बैठी थी, जो साल भर से उसके कोमा से बाहर आने का इंतजार कर रही थी। डॉक्टर ने पास आकर उसकी नब्ज देखी और उसकी पत्नी से कहा, “ये शारीरिक रूप से तो यहाँ हैं, पर इनका मस्तिष्क कहीं और कैद है। यह कोमा नहीं, इनकी अपनी किसी ग्लानि का वो जेलखाना है जहाँ ये हर रोज मरते हैं।” पत्नी रोने लगी, पर वह आदमी अपनी बंद आँखों के पीछे फिर से उसी गलियारे में ‘चेक-इन’ कर रहा था, जहाँ प्रेमिका फंदा लिए उसका स्वागत कर रही थी।