विश्व राजनीति में जब भी पश्चिम एशिया अर्थात मध्यपूर्व में तनाव बढ़ता है, उसका सबसे अधिक प्रभाव विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वर्तमान समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, तेल बाजार, महंगाई और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा हुआ विषय बन चुका है। यदि यह तनाव युद्ध का रूप लेता है, तो विकासशील देशों के सामने आर्थिक तथा ऊर्जा आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।read more:https://pahaltoday.com/traffic-police-crack-down-on-drunk-drive-drive-challan-48-drivers-at-toll-plazas/
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल तथा अफ्रीका और एशिया के अनेक देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों पर निर्भर हैं। ऐसे में अमेरिका ईरान संघर्ष सीधे तौर पर तेल की कीमतों, विदेशी मुद्रा भंडार और आम जनता के जीवन को प्रभावित करता है। ईरान विश्व के सबसे बड़े तेल और प्राकृतिक गैस भंडार वाले देशों में गिना जाता है। यह देश होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल टैंकर गुजरते हैं। यदि युद्ध या सैन्य तनाव के कारण इस मार्ग में बाधा आती है, तो पूरी दुनिया में तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर तनाव बना हुआ है। कई बार अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल निर्यात प्रभावित हुआ, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं।।।विकासशील देशों पर जिसका सीधा प्रभाव पढ़ने लगता है। ऊर्जा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन होती है। उद्योग, परिवहन, कृषि, बिजली उत्पादन और संचार सभी ऊर्जा पर आधारित हैं। जब तेल महंगा होता है तो हर वस्तु की कीमत बढ़ने लगती है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यदि अमेरिका ईरान युद्ध के कारण तेल कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचती हैं, तो भारत जैसे देशों के लिए स्थिति गंभीर हो सकती है। भारत प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल से अधिक तेल की खपत करता है। देश अपनी गैस आवश्यकता का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है। भारत हर वर्ष लगभग 700 से 900 टन सोना आयात करता है, जिस पर 40 से 50 अरब डॉलर तक खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर भारत का वार्षिक खर्च कई बार 150 अरब डॉलर से अधिक पहुंच जाता है।यदि युद्ध के कारण तेल महंगा हो जाए तो विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है। इससे रुपये की कीमत गिरती है और महंगाई बढ़ती है। ।अमेरिका–ईरान युद्ध का सबसे बड़ा प्रभाव आम लोगों पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होते ही परिवहन खर्च बढ़ जाता है खाद्यान्न और सब्जियों की कीमतें बढ़ जाती हैं,बिजली उत्पादन महंगा हो जाता है,उद्योगों की लागत बढ़ती है बेरोजगारी और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ जाता है। विकासशील देशों में पहले से ही बड़ी आबादी गरीबी और सीमित आय में जीवन बिताती है। ऐसे में ऊर्जा संकट सामाजिक असंतोष भी पैदा कर सकता है।।ऐसी परिस्थितियों में विकासशील देशों को ऊर्जा और आर्थिक आपातकाल जैसी रणनीतिक तैयारी करनी पड़ती है। इसका उद्देश्य जनता को घबराना नहीं बल्कि संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना होता है।अनावश्यक बिजली और ईंधन की खपत रोकना अत्यंत आवश्यक है। सरकारों को ऊर्जा बचत अभियान चलाने चाहिए।।सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ईंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना समय की मांग है। भारत ने सौर ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु अभी भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता अधिक है। युद्ध या संकट के समय उपयोग के लिए तेल का सुरक्षित भंडारण आवश्यक है। भारत ने कुछ रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाए हैं, पर भविष्य में इन्हें और बढ़ाने की आवश्यकता है। जब विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है तब अनावश्यक स्वर्ण आयात आर्थिक संकट को और बढ़ाता है। इसलिए सरकारें कई बार सोने पर आयात शुल्क बढ़ाती हैं। वैश्विक राजनीति और ऊर्जा युद्ध आज दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं के लिए नहीं बल्कि ऊर्जा संसाधनों और आर्थिक प्रभुत्व के लिए भी लड़े जाते हैं। मध्य–पूर्व में होने वाला कोई भी संघर्ष पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। रूस,यूक्रेन युद्ध के दौरान भी विश्व ने देखा कि गैस और तेल संकट ने यूरोप सहित अनेक देशों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित किया। उसी प्रकार अमेरिका–ईरान संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर सकता है। भारत जैसे देशों के लिए रास्ता भारत सहित विकासशील देशों को अब दीर्घकालिक ऊर्जा नीति बनानी होगी नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश,इलेक्ट्रिक परिवहन व्यवस्था,घरेलू उत्पादन को बढ़ावा,ऊर्जा बचत तकनीक,विदेशी निर्भरता कम करना और।आत्मनिर्भर उद्योग नीति अपनाना। यदि ये कदम समय रहते नहीं उठाए गए तो भविष्य में ऊर्जा संकट और आर्थिक अस्थिरता बड़ी चुनौती बन सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल राजनीतिक विषय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न है। विकासशील देशों के लिए यह चेतावनी है कि वे आयात आधारित अर्थव्यवस्था से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर ऊर्जा व्यवस्था विकसित करें। ऊर्जा बचत, नवीकरणीय ऊर्जा, रणनीतिक भंडारण और संतुलित आर्थिक नीति ही आने वाले समय में देशों को सुरक्षित रख सकती है। अन्यथा युद्ध चाहे कहीं भी हो, उसका बोझ अंततः गरीब और विकासशील देशों की जनता को ही उठाना पड़ता है।