पछतावा

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल और मरती हुई उम्मीदों का कॉकटेल। सुमित वहां इस तरह बैठा था जैसे किसी पुराने कबाड़खाने में कोई टूटी हुई कुर्सी फेंक दी गई हो। तभी वहां ‘वह’ आई। अवनि। उसके चेहरे पर महंगे मॉइस्चराइजर की चमक थी और हाथ में लेटेस्ट आईफोन, जिसका कैमरा शायद सुमित की बदहाली को भी 4K में कैद कर सकता था। “सुमित! अंकल की हालत कैसी है? मुझे अभी पता चला तो रहा नहीं गया। तुम्हें तो पता है न, मेरा दिल कितना कमज़ोर है,” अवनि ने इस अंदाज़ में कहा जैसे वह शोक सभा में नहीं, किसी अवॉर्ड फंक्शन में गेस्ट अपीयरेंस देने आई हो। सुमित ने सूजी हुई आँखों से उसे देखा। “दिल कमज़ोर है या याददाश्त अवनि? खैर, पिता जी वेंटिलेटर पर हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि सांसे उधार की हैं और किश्तें बहुत भारी हैं। बिल्कुल तुम्हारी उन वादों की तरह, जो तुमने पांच साल पहले किए थे।” अवनि ने एक बनावटी ठंडी आह भरी। “तुम आज भी वही पुरानी बातें लेकर बैठे हो। देखो, मैंने अरेंज करवाया है। शहर के सबसे बड़े हार्ट सर्जन कल उन्हें देखेंगे। मैंने अपनी जान-पहचान लगा दी है। आखिर इंसानियत भी कोई चीज़ होती है।”
सुमित की हंसी एक कराह बनकर निकली। “इंसानियत? गज़ब का शब्द चुना है। जिस ‘इंसानियत’ की कोचिंग तुम मुझे मुफ़्त में दे रही हो, उसे निभाने के चक्कर में पिता जी ने अपनी ज़िंदगी की जमापूंजी उस घर में लगा दी थी, जिसे तुमने ‘मिडिल क्लास स्मेल’ कहकर छोड़ दिया था। आज वह अस्पताल के बेड पर लेटे हैं और तुम अपनी ‘कांटेक्ट लिस्ट’ का झुनझुना बजा रही हो?” अवनि ने चिढ़कर अपना पर्स सँभाला। “मैं यहाँ मदद करने आई हूँ सुमित, ताने सुनने नहीं। यह लो चेक। इसमें इतनी रकम है कि तुम्हारे पिता जी के फेफड़े फिर से नाचने लगेंगे। मुझे अहसान के बोझ तले दबकर जीना पसंद नहीं।” सुमित ने चेक हाथ में लिया। उसकी उंगलियां कांप नहीं रही थीं, बल्कि जम गई थीं। “अहसान? अवनि, अहसान तो उन यादों का है जो अब बाज़ार में कौड़ियों के भाव बिकती हैं। तुम चेक नहीं, अपने पछतावे की किश्त जमा करने आई हो। तुम्हें डर है कि अगर वह मर गए, तो तुम्हारी सफलता के महल की नींव में एक  लाश का शोर सुनाई देगा।” उसने चेक के दो टुकड़े किए और उन्हें पास के कचरे के डिब्बे में डाल दिया, जहाँ इस्तेमाल की हुई रुई और खून से सने पट्टियाँ पड़ी थीं। “यह क्या पागलपन है?” अवनि चिल्लाई। “पागलपन नहीं, हिसाब है,” सुमित ने शांत स्वर में कहा, जिसमें चीख से ज़्यादा पैनापन था। “जिस पिता ने अपनी दवाइयों के पैसे बचाकर तुम्हें जन्मदिन पर वह हार दिलाया था जिसे पहनकर तुम आज किसी और की बाहों में मुस्कुराती हो, उनकी कीमत तुम्हारा यह कागज़ का टुकड़ा नहीं चुका सकता। जाओ अवनि, अपनी इस चेरिटी से किसी और का ज़मीर खरीद लेना। यहाँ तो अब सिर्फ़ मौत का इंतज़ार है, और वह तुम्हारी तरह अपॉइंटमेंट लेकर नहीं आती।”read more:https://pahaltoday.com/shopkeepers-accused-of-attacking-passengers-with-sticks-and-rods/अवनि के चेहरे का मेकअप पसीने के साथ बहने लगा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि कुछ चीजें इतनी महंगी होती हैं कि उन्हें अमीर लोग कभी नहीं खरीद सकते।
सुमित फिर से उसी टूटी हुई कुर्सी पर बैठ गया। अस्पताल के गलियारे में एक लाइट बार-बार झपक रही थी—बिल्कुल सुमित की ज़िंदगी की तरह। अवनि वहां से भागी, मानो उस बदबूदार वेटिंग एरिया में उसे अपनी ही रूह की सड़ांध आने लगी हो। पीछे सुमित की आँखों से एक आंसू गिरा, जो शायद उस चेक की पूरी रकम से ज़्यादा कीमती था, पर उसे पोंछने के लिए अब कोई सक्सेसफुल हाथ वहां नहीं था।

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