कागज़ों में कैद इंसानियत: आखिर किस दिशा में जा रहे हैं हम और हमारा समाज ?

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-सुनील कुमार महला 
एक समय था जब इस धरती पर इंसानियत केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का आधार हुआ करती थी। दुख में कंधा देने वाले लोग होते थे, व्यवस्था में संवेदनशीलता होती थी और नियमों के पीछे इंसान की पीड़ा को समझने की क्षमता भी। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि आज के समय में इंसानियत/मानवता पूरी तरह से खत्म हो गई है। आज भी इंसानियत जिंदा है और इसके बहुत से उदाहरण हमें आए दिन देखने को मिलते हैं।सरल शब्दों में कहें तो आज भी इंसानियत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो हमें यह एहसास कराती हैं कि इंसानियत/मानवता समय के साथ अब हाशिए पर खड़ी है-कमज़ोर, घायल और लगभग दम तोड़ती हुई।
दरअसल, हाल ही में ओडिशा के क्योंझर ज़िले से आई एक घटना ने पूरे समाज को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वास्तव में, यह कोई सामान्य खबर नहीं थी, बल्कि यह हमारे सिस्टम, हमारी संवेदनाओं और हमारे विकास के दावों पर एक करारा तमाचा थी।read more:https://pahaltoday.com/awareness-campaign-launched-in-ghazipur-under-mission-shakti-phase-5-0-anti-romeo-team-active/
ओडिशा के दियानाली गाँव का आदिवासी युवक जीतू मुंडा-जिसके पास पहले ही जीवन में बहुत कुछ नहीं था-अब अपनी बहन को भी खो चुका था। उसकी बहन कालरा मुंडा, जिसने बड़ी मुश्किल से मवेशी बेचकर 19,300 रुपए जमा किए थे, कुछ समय पहले इस दुनिया में नहीं रही। उस गरीब परिवार के लिए वही जमा राशि अब जीवन की आखिरी उम्मीद थी।लेकिन उम्मीद और हकीकत के बीच खड़ी थी-एक निर्दयी व्यवस्था।एक ऐसा सिस्टम जो सिर्फ और सिर्फ कागजों का खेल खेलना जानता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार आदिवासी जीतू कई बार बैंक गया। उसने बैंक के बहुत चक्कर काटे, लेकिन हर बार उसने अपनी मजबूरी बताई, हर बार उसने बैंक कर्मचारियों/अधिकारियों से अपनी जमा धनराशि लौटाने की विनती की, हर बार उसने अपनी सच्चाई समझाने की कोशिश की। लेकिन हर बार उसे मिला-कागज़ों का पहाड़, नियमों की दीवार और संवेदनहीन जवाब-खाताधारक को लेकर आओ…’ बहन का मृत्यु प्रमाण-पत्र लाओ…’यहाँ सवाल यह नहीं था कि नियम गलत थे। यह ठीक है कि नियम अपनी जगह नियम हैं,नियम होने भी चाहिए, व्यवस्था को सही तरीके से चलाने के लिए। लेकिन यहां सवाल यह था कि क्या उन नियमों के पीछे बैठा इंसान पूरी तरह गायब हो चुका था? एक अशिक्षित, गरीब आदिवासी युवक से यह उम्मीद करना कि वह तुरंत मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाकर लाएगा-क्या यह जमीनी सच्चाई से आंखें मूंद लेना नहीं है? क्या यह उस भारत की तस्वीर है, जहां हर नागरिक को समान अवसर और सहारा मिलने की बात कही जाती है ? जीतू के लिए जब हर दरवाज़ा बंद हो गया, जब उसकी हर उम्मीद टूट गई, तब जीतू ने वह किया जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप उठती है। मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार उसने अपनी बहन की कब्र खोदी, कब्र से उसका कंकाल निकाला, उसे अपने कंधे पर रखा और लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंच गया-सिर्फ यह साबित करने के लिए कि उसकी बहन सचमुच मर चुकी है। ज़रा सोचिए, उस रास्ते पर चलते हुए उसके मन में क्या चल रहा होगा ? उसके मन-मस्तिष्क पर क्या बीत रही होगी? क्या वह सिस्टम को नहीं कोस रहा होगा ? आज फर्जी कागजात से लोग न जाने क्या क्या कर लेते हैं, आए दिन हम फ्रोड की खबरें पढ़ते रहते हैं। सवाल यह भी उठता है कि सिस्टम को चलाने के लिए क्या सिर्फ और सिर्फ कागजों का पेट भरना ही अनिवार्य है ? सवाल यह भी उठता है कि वह दर्द, वह अपमान, वह बेबसी-क्या कोई नियम, कोई प्रक्रिया उसे समझ सकती है?आदिवासी जीतू द्वारा अपनी बहन का कंकाल कंधे पर बैंक में लाने के बाद बैंक में अफरा-तफरी मच गई, पुलिस बुला ली गई, और बाद में मदद का आश्वासन भी दे दिया गया, लेकिन क्या यह पहले संभव नहीं हो सकता था ? जीतू से उसकी समस्या को क्या पहले नहीं पूछा जाना चाहिए था ? या उसकी समस्या को लेकर क्या उसकी सहायता पहले ही नहीं की जानी चाहिए थी ? बाद में ही सिस्टम के हाथ-पैर क्यों फूले ? सवाल यह भी है कि क्या बैंक द्वारा यह मदद(मदद का आश्वासन) उस अपमान, उस मानसिक आघात और उस अमानवीय स्थिति की भरपाई कर सकती है, जिससे होकर जीतू गुजरा?आज हम गर्व से कहते हैं कि हम डिजिटल इंडिया बना रहे हैं, एआई के युग में जी रहे हैं, और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार करेंगे,लेकिन क्या यह विकास उस व्यक्ति विशेष तक पहुंचा है, जिसे अपने हक के 19,300 रुपए पाने के लिए अपनी बहन का कंकाल उठाकर चलना पड़ा ?कहना ग़लत नहीं होगा कि ओडिशा से आई यह घटना केवल एक व्यक्ति विशेष की नहीं है। दरअसल, यह उस खाई की कहानी है, जो ‘भारत’ और ‘इंडिया’ के बीच दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही है। वास्तव में सच तो यह है कि यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि समस्या सिर्फ भ्रष्टाचार या नियमों की जटिलता की नहीं है, बल्कि उस सोच की है, जहां सिस्टम इंसान के लिए नहीं, बल्कि इंसान सिस्टम के लिए बन गया है।जरूरत है ऐसे बदलाव की, जहां नियमों के साथ मानवीय विवेक भी हो, प्रक्रियाओं के साथ संवेदनशीलता भी हो और सबसे बढ़कर, हर अधिकारी के भीतर ‘इंसान’ या ‘इंसानियत’ जिंदा हो, क्योंकि जब एक गरीब आदिवासी व्यक्ति को अपनी सच्चाई साबित करने के लिए कब्र खोदनी पड़े, तो समझ लीजिए कि सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था कहीं न कहीं मर चुकी है, जहां संवेदशीलता है ही नहीं। और अगर अब भी हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेंगी-जहां इंसानियत कागज़ों में दफन होकर रह गई थी।नियम अपने स्थान पर ठीक हैं, लेकिन प्रक्रियाएं कभी भी इंसान और इंसानियत पर भारी नहीं पड़नी चाहिए। विकास के दावों के बीच आम आदमी पीछे नहीं छूटना चाहिए। आज हमें यह सोचने की जरूरत है कि हमारा समाज और हम स्वयं किस दिशा में जा रहे हैं।

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