वीरेंद्र बहादुर सिंह
आसमान से मानो आग के गोले बरस रहे हैं। दोपहर का समय कर्फ्यू जैसा हो गया है। ऐसी स्थिति में केवल वे लोग ही सड़कों पर दिखाई देते हैं, जिन्हें किसी मजबूरी में बाहर निकलना पड़ता है। ट्रैफिक सिग्नल पर एक मिनट रुकना भी दोपहिया वाहन चालकों के लिए कठिन हो जाता है। ऐसे समय में गिग वर्कर अपने काम के लिए दौड़ते-भागते नजर आते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें गर्मी नहीं लगती, बल्कि वे ठंड, गर्मी या बारिश की परवाह किए बिना अपना काम करते रहते हैं।
गिग वर्करों की परिभाषा काफी व्यापक है। संक्षेप में कहें तो कूरियर बॉय, जोमैटो-स्विगी-अमेजन-ब्लिंकिट जैसी सेवाओं के डिलीवरी बॉय, ओला-उबर की टैक्सी या ऑटो चलाने वाले ड्राइवर आदि सभी गिग वर्कर हैं। उनकी सेवाएं आपातकालीन नहीं होतीं, फिर भी वे लगातार अपनी कंपनी के लिए काम करते रहते हैं। दफ्तरों में बैठकर काम करने वालों की तुलना में उनका वेतन कम होता है, लेकिन कंपनी को चलाने में उनका बड़ा योगदान होता है।
गिग वर्करों की अपनी अलग दुनिया है। रात के ढाई बजे भी घर पर खाना पहुंचाने वाले आपके दरवाजे तक आ जाते हैं। आजकल जब भीषण गर्मी पड़ रही है, तब भी गिग वर्कर दोपहर की धूप में अपनी डिलीवरी पूरी करते दिखाई देते हैं। लगातार घूमते रहना उनकी नौकरी का हिस्सा है। तपती धूप में भी वे अपना काम नहीं छोड़ते।read more:https://pahaltoday.com/shri-shyam-parivars-public-service-campaign-begins-with-the-pledge-of-service-is-the-supreme-religion/
कुछ सोसायटियों में दोपहर 12 से 4 बजे तक कूरियर वालों के लिए नो-एंट्री होती है, इसलिए वहां रहने वालों तक पार्सल पहुंचाने के लिए उन्हें दोबारा जाना पड़ता है।सुबह जल्दी ही गिग वर्कर काम पर निकल जाते हैं। भीषण गर्मी में डिलीवरी करने वालों के प्रति आम लोग सहानुभूति रखते हैं, लेकिन उनकी कंपनी या सरकार उनका पर्याप्त ध्यान नहीं रखती। बहुत कम लोगों को पता होगा कि कूरियर देर से पहुंचने पर डिलीवरी बॉय के वेतन से कुछ राशि काट ली जाती है। इसी तरह फूड डिलीवरी भी समय पर करनी पड़ती है।10 मिनट में डिलीवरी के कॉन्सेप्ट का विरोध इसलिए हुआ था, क्योंकि समय बचाने के लिए डिलीवरी कर्मचारी वाहन तेज चलाते हैं, जो खतरनाक हो सकता है।गिग वर्कर के लिए एयर कंडीशनर का मतलब पेड़ की छांव है। तेज गर्मी में गिग वर्कर प्राकृतिक एसी की तलाश करता है। जिनके पास नौकरी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है, उनके लिए गिग वर्कर बने रहने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता।इंडियन फेडरेशन आफ ऐप बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स ने श्रम और रोजगार मंत्रालय को लिखा है कि हमें भी हीट वेव से सुरक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने कूलिंग ब्रेक की मांग की है। जब मौसम विभाग ऑरेंज अलर्ट या रेड अलर्ट जारी करे, तब गिग वर्करों की परेशानी का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।फेडरेशन ने जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और फ्रांस जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा है कि वहां गिग वर्करों को जो सुविधाएं मिलती हैं, वैसी ही भारत में भी लागू की जानी चाहिए। भारत में इस समय लगभग 77 लाख गिग वर्कर हैं। वर्ष 2029-30 तक यह संख्या 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।गिग वर्करों के फेडरेशन ने सरकार को लिखा है कि उन्हें गर्मी से बचाना जरूरी है। एक सुझाव यह भी दिया गया है कि गर्मी के प्रकोप के दौरान यदि किसी गिग वर्कर की तबीयत अचानक खराब हो जाए, तो हीट डिस्ट्रेस बटन जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।
समाज और व्यापार जगत में गिग वर्करों का महत्वपूर्ण योगदान है। कूरियर सेवाओं के कारण वर्षों पुरानी डाक सेवा भी प्रभावित हुई है, लेकिन गिग वर्करों को जितनी सुविधाएं मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिलतीं और न ही कंपनियां उनकी नौकरी स्थायी करती हैं।भारत की स्टार्टअप इकोसिस्टम में गिग इकोनॉमी महत्वपूर्ण बन चुकी है। राज्य सरकारों को भी गिग वर्करों को गर्मी में राहत देने के लिए गंभीर विचार-विमर्श करना चाहिए।