भारत के लिए अमेरिका सदैव ट्रबलसम फ्रेंड्(दुखदाई मित्र)

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भारत के लिए अमेरिका सदैव ट्रबलसम फ्रेंड्(दुखदाई मित्र)।  भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका तथा रूस से अपने संबंध विस्तारित करने का प्रयास किया पर रूस ने सदैव एक सच्चे मित्र की भूमिका निभाई पर कई सोपनो में अमेरिका केवल अपनी आर्थिक नीतियों को मजबूत करने के लिए भारत से संबंध बनाते रहा है एवं भारत से ज्यादा पड़ोसी पाकिस्तान देश को वरीयता प्रदान करता रहा है एवं उसे आर्थिक तथा सामरिक मदद भी करता रहा। अमेरिका का सदैव यह प्रयास रहा कि भारत में अंदरूनी तथा बाहरी अस्थिरता बनी रहे और यही कारण है कि वह पाकिस्तान को सदैव भारत के खिलाफ भड़काता उकसाता रहा है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक मित्रता में अमेरिका का आर्थिक पढ़ला  हमेशा भारी रहा है यह अलग बात है कि भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और अपनी स्वायत्त छवि को विदेशों में कायम रखा और एक स्वतंत्र गुटनिरपेक्ष नीति पर आगे चला रहा। विश्व राजनीति में अमेरिका एक ऐसी महाशक्ति के रूप में स्थापित रहा है जिसकी विदेश नीति का मूल आधार आदर्शवाद से अधिक राष्ट्रीय हित और आर्थिक लाभ रहा है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों का मानना है कि कोई भी राष्ट्र स्थायी मित्र या शत्रु नहीं रखता, बल्कि उसके स्थायी हित होते हैं। अमेरिका ने भी अपने राष्ट्रीय हितों, आर्थिक प्रभुत्व और सामरिक वर्चस्व को सर्वोपरि रखते हुए विश्व के देशों के साथ संबंध स्थापित किए हैं। यही कारण है कि अनेक बार वह मित्र दिखाई देता है, तो कई बार उसके निर्णय मित्र देशों के लिए भी असहज और चिंताजनक साबित होते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/meritorious-students-honored-at-klgm-inter-college-incentive-amount-of-%e2%82%b961000-distributed/द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने स्वयं को वैश्विक आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया। उसने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं, व्यापारिक समझौतों और सुरक्षा गठबंधनों के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार किया। अमेरिका की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विश्व बाजारों तक पहुंच बनाए रखना, ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षा करना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना रहा है।
इराक, अफगानिस्तान, लैटिन अमेरिका, पश्चिम एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेपों का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दों के साथ-साथ आर्थिक और सामरिक हित भी उसकी नीतियों के केंद्र में रहे हैं। इसलिए आलोचक अमेरिका को “हित-आधारित मित्र” या “ट्रबलसम फ्रेंड” की संज्ञा देते हैं।भारत के संदर्भ में अमेरिकी दृष्टिकोण भारत की स्वतंत्रता के बाद अमेरिका और भारत के संबंध सदैव सरल नहीं रहे। शीतयुद्ध काल में भारत ने गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई, जबकि अमेरिका पाकिस्तान को अपने सामरिक सहयोगी के रूप में देखता था। पाकिस्तान को सैन्य सहायता, आधुनिक हथियारों और आर्थिक सहयोग ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को प्रभावित किया।1965 और 1971 के युद्धों के दौरान भी अमेरिकी नीतियों को लेकर भारत में अनेक प्रश्न उठे। विशेष रूप से 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के समय अमेरिकी प्रशासन का झुकाव पाकिस्तान की ओर दिखाई दिया। इससे भारतीय जनमानस में यह धारणा मजबूत हुई कि अमेरिका दक्षिण एशिया में भारत की अपेक्षा पाकिस्तान को सामरिक दृष्टि से अधिक महत्व देता है।हालांकि यह भी सत्य है कि समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में नई निकटता आई। सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार, रक्षा, शिक्षा और परमाणु सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों ने उल्लेखनीय साझेदारी विकसित की। 2008 का असैनिक परमाणु समझौता इस संबंध का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। विश्वास और सावधानी के बीच भारतभारत और अमेरिका आज रणनीतिक साझेदार हैं, किंतु यह साझेदारी पूर्ण विश्वास पर नहीं बल्कि पारस्परिक हितों पर आधारित है। अमेरिका जहां चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत को महत्वपूर्ण साझेदार मानता है, वहीं भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है।रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान के प्रश्न और वैश्विक व्यापारिक नीतियों पर कई बार दोनों देशों के दृष्टिकोण अलग दिखाई देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत को अमेरिका के साथ सहयोग तो बढ़ाना चाहिए, लेकिन अपनी विदेश नीति का निर्धारण राष्ट्रीय हितों और आत्मनिर्भर सामरिक क्षमता के आधार पर करना चाहिए।वैसे भी विदेश नीति परिपेक्ष में किसी भी देश के साथ अमेरिका अमेरिका को भी केवल मित्र या शत्रु की संकीर्ण परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। वह एक ऐसी महाशक्ति है जो अपने राष्ट्रीय, आर्थिक और सामरिक हितों के अनुसार निर्णय लेती है। भारत के लिए भी आवश्यक है कि वह भावनाओं के बजाय यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विश्वास से अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित और सामरिक संतुलन होते हैं।भारत को अमेरिका सहित सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित संबंध रखते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करना होगा। यही वह मार्ग है जो भारत को वैश्विक मंच पर सम्मानजनक, सुरक्षित और प्रभावशाली स्थिति प्रदान कर सकता है।

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