नितिन गुप्ता/प्रणव कुमार फिल्म आयाम, दिल्ली एवं भारतीय चित्र साधना के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित विशेष फिल्म आस्वादन कार्यक्रम में हिंदी लघु फिल्मों ‘एक कदम’ और ‘दृष्टांत’ के माध्यम से सामाजिक चेतना, आत्मनिर्भरता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा जीवन के विविध पहलुओं को सिनेमाई अभिव्यक्ति प्रदान की गई। कार्यक्रम का उद्देश्य दर्शकों को फिल्मों की विषयवस्तु, निर्देशन, पात्रों के मनोविज्ञान और उनके अंतर्निहित संदेशों से परिचित कराना रहा। इस पहल ने लघु सिनेमा की सार्थकता और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की उसकी क्षमता को रेखांकित किया। कार्यक्रम में प्रदर्शित ‘एक कदम’ का निर्देशन राजीव उपाध्याय ने किया है, जबकि अमृत्ता डोडानी इसकी निर्माता है। लगभग 20–21 मिनट की इस फिल्म में अभिनेत्री रेणुका शहाणे ने अनुराधा सोलंकी तथा राजेश तैलंग ने महेन्द्र सोलंकी की भूमिका निभाई है। कहानी एक ऐसी गृहिणी के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका जीवन लंबे समय तक पारिवारिक निर्भरता और सीमित निर्णय-स्वतंत्रता के बीच सिमटा रहता है। परिस्थितियां उस समय बदलती है, जब उनके पति दुर्घटना के कारण चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते है। इसके बाद अनुराधा को घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ बाहरी दुनिया के कार्य भी स्वयं संभालने पड़ते है। प्रारंभिक झिझक, असफलताओं और कठिनाइयों से गुजरते हुए वह धीरे-धीरे आत्मविश्वास अर्जित करती है तथा अपनी क्षमताओं को पहचानने लगती है।read more :https://pahaltoday.com/mobile-court-visits-ballia-to-hear-grievances-of-persons-with-disabilities-state-commissioner-issues-strict-directives/ यह कथानक संदेश देता है कि आत्मविश्वास, अनुभव और दृढ़ संकल्प के सहारे व्यक्ति अपनी सीमाओं को पार कर सकता है।वहीं ‘दृष्टांत’ लघु फिल्म का निर्देशन डॉ. रमेश विश्वकर्मा ने किया है। इसमें अभिनेता अमित बहल और अभिनेत्री पल्लवी राव ने अहम भूमिका निभाई है। फिल्म को कार्यक्रम के अंतर्गत प्रस्तुत कर दर्शकों के समक्ष सिनेमा की उस भूमिका को रेखांकित किया गया, जिसके माध्यम से सामाजिक अनुभवों, विचारों और जीवन से जुड़े प्रश्नों पर संवाद स्थापित किया जा सकता है। इसकी प्रस्तुति ने दर्शकों को फिल्म की विषयवस्तु, पात्रों के चित्रण तथा रचनात्मक दृष्टिकोण पर विचार करने का अवसर दिया। फिल्म आस्वादन की अवधारणा केवल किसी रचना को देखना नहीं, बल्कि उसके कथ्य, शिल्प, संवाद, दृश्य-संयोजन और सामाजिक प्रभाव को समझना भी है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों, सिनेमा प्रेमियों तथा रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों में आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने के साथ-साथ सार्थक फिल्म निर्माण के प्रति रुचि बढ़ाने में सहायक होते है। समग्र रूप से यह आयोजन लघु फिल्मों को मनोरंजन से आगे बढ़कर सामाजिक विमर्श, मानवीय मूल्यों और वैचारिक जागरूकता का माध्यम बनाने की दिशा में एक सार्थक पहल रहा। दोनों फिल्मों ने दर्शकों को जीवन की परिस्थितियों, व्यक्तिगत क्षमताओं और समाज के प्रति अपने दृष्टिकोण पर विचार करने का अवसर प्रदान किया।