आत्माराम यादव
मेरे जीवन में ‘बड़े भाग्य मानुष तन पावा’ वाली कहावत चरितार्थ कर गई जब इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से मैंने सपत्नी पहली बार इंडिगो जेट यान से हवाई यात्रा का सौभाग्य प्राप्त किया। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि ‘सकल पदार्थ है जग माहीं’ और उन सकल पटार्थों में मुझे पहली बार जीवन में हवाई यात्रा का सुख प्राप्त हुआ, चूंकि उस दिन यात्रा में मेरे साथ मेरी पत्नी ओर बेटी को यात्रा करनी थी किंतु यात्रा के चार दिन पूर्व ही बेटी के एक एक्जाम की तिथि डिक्लेयर होने के कारण वह नहीं आ सकी परिणामस्वरूप मैंने पत्नी के साथ यह यात्रा तो पूर्ण की किन्तु चार दिन पूर्व बेटी की यात्रा निरस्त कराने के बाद इंडगों कंपनी ने टिकट वापसी की कोई राशि नहीं लौटाई ओर पहली हवाई यात्रा में एक टिकट की राशि 9 हजार रुपए की हानि होने से हवाई यात्रा मैं कुछ समय के लिए बेटी के न आने का दुख महसूस हुआ वही पत्नी के मन ओर मस्तिष्क में टिकिट की राशि वापसी न होने का प्रभाव दिखाई दे रहा था … यानि हवाई अड्डे से प्लेन के उड़ान भरने के बाद आकाश की उचाइयों को छूने तक उदासी चेहरे पर थी जो बाद में ऊंचाई पर होने के बाद उनका मन धरती पर छोटे छोटे दृश्यों में खो गया।सच पूछा जाए तो हवाई यात्रा मेरे लिए एक ऐसा सपना था जो मैं जीते जी नहीं देख सकता था,किन्तु पत्रकारिता के जीवन में वर्षो लिखने के बाद हिंदुस्तान समाचार एजेंसी के अध्यक्ष पद पर आरके सिन्हा जी के आते ही इस समाचार एजेंसी में सेवाए देने वाले सभी सम्पूर्ण भारत के सभी प्रदेशों के प्रत्येक जिला- संभाग के प्रतिनिधियों, संवाददाताओं, ब्यूरो, ब्यूरो चीफ आदि सभी को 4 दिवसीय कार्यशाला के लिए पूरे परिवार सहित देहारादून आमंत्रित किया गया था जिसमें शामिल होने के लिए ट्रेनों के सभी दर्जों के टिकिट सहित हवाई यात्रा का भुगतान किया गया। कार्यशाला में आने वाले हर पत्रकार के लिए ठहरने, खाने-पीने, नास्ता आदि के साथ कार्यशाला में मिनिट टू मिनिट कार्यक्रम में प्रशिक्षण, संभाषण, केंद्रीय सरकार के मंत्रियों के उद्बोधन के साथ साथ रात्रि 9 से 11 बजे तक कत्थक नृत्य, कबीर नाटिका सहित काबी सम्मेलन आदि का आनंद भी सभी को उठाना था ओर विशेषकर देश के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों आदि के सानिग्ध का लाभ उठाने के लिए एक महीने पूर्व से ही तैयारी की गई थी जिसमें शामिल होने वालों के लिए सभी सुविधाए थी, जिस हेतु मैंने भी परिवार में पत्नी और बेटी के साथ आने की स्वीकृति दी थी लेकिन बेटी यात्रा का हिस्सा न बन सकी ओर मैं ओर पत्नी यात्रा के साथ अन्य कार्यक्रमों के हिस्सेदार बन सके ।20 जून को नर्मदापुरम से दिल्ली के लिए मैं पत्नी के साथ निकलने के कुछ घंटे पहले ही मेरे मित्र संतोष जायसवाल, नवीन तिवारी घर पर गए ओर हवाई यात्रा के नियम तथा आवश्यक सभी जानकारी एकत्र करने करने की बात कर उत्साहित करते रहे। इस यात्रा से मेरे दोनों बेटे ओर बेटी खुश थे ओर मैं जिस मकान में किराएदार था उस मकान मालिक के बेटे आनंद, चिंटू अमित ओर बहुए चर्चा कर खुशी से भरे हुये थे। संतोष ओर नवीन तो टिकिट बुकिंग के बाद पंडित से मुहूर्त निकलवाकर घर से निकलने की सलाह देने लगे थे ओर उसी के अनुसार वे चौघड़िया देख आटो वाले को बुलवा लिए ताकि मुहूर्त में स्टेशन पहुचा जा सके। इस खुशी में ट्रेन आने के आधे घंटे पहले ही स्टेशन पर मैंने परिवार सहित डेरा दाल लिया था। गोंडवाना एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी के सीट दिल्ली तक रिजर्व थी उसके अगले दिन 21 जून को दिल्ली से देहरादून की यात्रा करनी थी। नियत समय पर ट्रेन आने पर हम पति पत्नी ट्रेन में अपनी सीट पर थे और अगले दिन दिल्ली में थे। दिल्ली पहुचकर मैंने अपने भतीजे अभिलाश जो द्वारकरपुरी में निवास करता था ओर इंद्रिरागांधी हवाई अड्डे पर सबइंस्पेक्टर की पोस्ट पर सुरक्षा में था को आठ दिन पूर्व ही अपने कार्यक्रम की पूर्व सूचना दे रखी थी से मोबाइल पर चर्चा की कि कहा आना है ओर कैसे आना है, ट्रेन स्टेशन पर लग चुकी है तब उसके द्वारा बताया गया कि मैं मामा के घर शादी के लिए नर्मदापुरम निकल चुका हूँ ओर अभी ट्रेन में हूँ। बस मैंने तुरंत स्टेशन से बाहर निकलते ही पहाड़गंज में एक होटल में कमरा लिया ओर वही ठहर गए। मुझे अगर भतीजा अपने नर्मदापुरम के कार्यक्रम की पूर्व सूचना दे देता तो मैं एक दिन पूर्व दिल्ली नहीं आता, चूकी समयपर खबर होती तो मैं किसी भी गेस्टहाउस में व्यवस्था करवा लेता, होटल की नौबत नहीं आती।होटल में ठहरने के दरम्यान मुझे ज्ञात हुआ कि नर्मदापुरम के प्रख्यात कवि सुरेश उपाध्याय जी के सुपुत्र अभिनव उपाध्याय उस समय जीन्यूज में एंकर है ओर नोयडा में निवास करते है। आदरणीय सुरेश उपाध्याय तत्कालीन कवियों के साथ बड़े मंचों पर व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर रहे है ओर देश के कई बड़ी पत्रकाओं धर्मयुग, रविवार, दिनमान सहित समाचारपत्रों में नर्मदापुरम को अपनी लेखनी से गौरवान्वित करते रहे है। 1998 से 2009 तक वे मेरे समाचार पत्र में एक नियमित कालम दिया करते थे इसलिए चालीस वर्षों से उनसे मेरी घनिष्ठता थी, यही नहीं उनके पिताजी का स्नेह भी मुझे निरंतर मिलता रहा था।read more:https://pahaltoday.com/cji-told-why-he-brought-a-mobile-phone-to-the-courtroom-for-the-first-time-in-his-life/उनसे चर्चा के बाद उन्होने दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया तब मैं सपत्नी मेट्रो से नोयडा पहुचा ओर टेक्सी कर उनके घर पहुचा। उपाध्याय जी ओर भाभी जी ने आत्मीय स्वागत करते हुये कहा, बिना कोई ओपचारिकता निभाए पहले भोजन कीजिये फिर बैठकर चर्चा होगी, उनका कहना था की नोयडा में भोजन बनाने वाली बाई के घर जाने का समय हो चुका है आज उसे देर तक रोक रखा था ताकि वह खाना बनाए ओर आप गरमागरम खाना खा सको। अभिनय रिपोर्टिंग के लिए स्टुडियो गया हुआ था ओर बहू किसी काम से गई हुई थी जो शाम 4 बजे लौटे तब उनसे भेंट के बाद पूरे परिवार का ग्रुप फोटो के बाद मैं वापसी पहाड़गंज होटल लौट आया तब तक हल्की हल्की बरसात शुरू हो गई थी।22 जून होने से आज जल्द ही मैंने ओर पत्नी ने स्नान कर होटल का बिल भुगतान कर एक आटो पकड़ा ओर दिल्ली मेट्रो स्टेशन पहुच गए जहां से दो घंटे का मेट्रो का सफर कर इन्दिरा गाँधी एअरपोर्ट का उतरे ओर अपनी अटैची ओर बैग उठाकर एअरपोर्ट के भीतर प्रवेश किया। वहाँ पहुँचकर मैंने स्वागत कक्ष में अपने इंडिगो हवाई जहाज की जानकारी ली, चुकीं जानकारी डिसप्ले पर भी दिखाई जा रही थी। दोपहर 1 बजे का समय हो चुका था सुबह होटल से चाय पीकर निकलने के कारण भूख सताने लगी थी किन्तु एयरपोर्ट पर जो भी खानेपीने का सामान था वह खरीदने का प्रयास किया किन्तु पत्नी ने महंगा कहकर मना कर दिया, बाजार में 40 रुपए में मिलने वाली लस्सी वहाँ 200 रुपए में थी ओर एक कप चाय की कीमत 100 रुपए होने से पत्नी ने एक दिन भूखा रहकर उपवास करना स्वीकारा किन्तु दुकान पर जाने से मना करती रही ओर मैं चुप रहा। कुछ समय बाद एयरपोर्ट पर टिकिट ओर सामान जांच कराने की उद्घोषणा के बाद हम दोनों लाइन में लग गए। आधा घंटे बाद सुरक्षाकर्मियों के पास पहुचे, उन्होने मेटल डीडेक्टर से जांच की ओर सामान की पर्ची थमाकर उसे मशीन से स्केन के बाद अंदर जाने की अनुमति दी। अंदर हाल में हमारे पास सामान नही था, जमा कर लिया था इसलिए हम हल्के से एयरपोर्ट के भीतर बने प्रतीक्षालय सहित सभी प्रकार के बाज़ारों में भ्रमण करने लगे, जहां जैसे ही पत्नी ने चाय की होटल पर भोजन करते लोगों को मांसाहार करते देखा ओर होटल के बोर्ड पर पढ़ा तो चाय की उनकी भूख भी चली गई। कुछ समय बाद हवाई पट्टी पर जाने की बात शुरू हुई तब एक स्टोर से कुछ हल्दीराम के नमकीन ओर बिस्कुट देखकर खरीदे ओर पेट की आग शांत करने के लिए इनका होम लगाकर कुछ भूख से राहत प्राप्त की ही थी की देहारादून जाने वाले इंडिगो जहाज के लिए हवाईपट्टी प्रवेश के लिए लाइन लग गई ओर हम लाइन में खड़े थे। हवाई पट्टी पर खड़ी बस में हम सभी को बैठकर सामने कुछ ही दूरी पर खड़े हमारे इंडिगो हवाई जहाज तक पहुचाया गया। जीवन में पहली बार हवाई जहाज को इतने करीब पाकर मन रोमांचित था, मोबाइल से कुछ फोटो लेने के बाद हम हवाई जहाज के भीतर पहुंचे। भीतर पहुँचते ही एक सुंदर सी महिला ने वेलकम कर नमस्ते की ओर टिकिट दिखने को कहा, जैसे ही मैंने उन्हे टिकिट दिखाया तो उस सुंदरी ने हमें आरक्षित सीट पर बैठकर बेल्ट बांधने का तरीका बताकर अगले यात्री की अगवानी में चली गई। हवाई जहाज में बड़ा विचित्र अनुभव होने लगा पत्नी विस्मित आंखो से सभी ओर देखते हुये कहने लगी, डर लग रहा है, मैंने कहा अभी इसे उड़ान भरने दे ओर जब आकाश में हो तब डरने की बात समझ आती। हवाई जहाज की सीट पर मुझे खिड़की बाली सीट मिली जैस्पर मैंने पत्नी को बैठाकर बीच वाली सीट पर बैठा ओर मेरे बगल में एक सहयात्री ओर था। थोड़ी देर बार घोषणा हुई। सभी यात्री सावधान हो जायें और अपनी-अपनी सीट पर बैल्ट बांध लें विमान उड़ान भरने वाला है। विमान आकाश में उड़ा और मैं अपनी पहली यात्रा का आनन्द भरपूर ले रहा था और अपने मोबाइल से वीडियो क्लिप के साथ फोटो भी ले रहा था, तभी एक सुन्दर-मी बाला ने मेरे आगे जूस का गिलास कर दिया, मुझे वह जूस पीकर बहुत आनंद आया। इसके बाद चाकलेट दी गयी, फिर कॉफी का नम्बर आया। तभी विमान में घोषणा हुई कि सभी यात्री अपनी सीट पर वैल्ट बाँध लें, विमान नीचे उतरने वाला है। सभी यात्रियों के साथ-साथ मैंने भी बैल्ट बाँध ली और हवाई जहाज आकाश से पहाड़ी वादियों के बीच के नगर देहरादून में नीचे जमीन पर उतरने लगा था जो वीडियो बनाने ओर इस यात्रा के अद्भुत अनुभव को आत्मसात करने का सुनहरा अवसर था जिसे मैं गवाना नहीं चाहता था … धीरे धीरे रनवे पर हवाई जहाज थम चुका था जहां से बस से सभी को हवाई अड्डे पहुचाया गया और यात्रियों को उनका सामान सौंप दिया गया। जैसे ही मैं पत्नी सहित हवाई अड्डे से बाहर निकला तो देहरादून की धरती पर मेरे सौभाग्य के पल प्रतीक्षा करते दिखे जब मुझे महामंडलेश्वर अवधेशानंद जी भी उसी हवाई जहाज से उतरकर वहाँ मिले, जिनसे आत्मीय चर्चा के साथ उनके साथ फोटो खिंचवाने का अवसर मेरे लिए किसी तीर्थयात्रा से कम न था। देहरादून हवाई अड्डे पर पहुँचने के बाद आयोजको ने जो कारें भेजी थी उसमें चेन्नई के पत्रकारों के टीम बैठ सकी तक एक प्रायवेट कार से आयोजन स्थल के लिए मैं ओर मेरी पत्नी तथा एक हैदराबाद के पत्रकार के साथ निकले तब संध्या का समय था ओर हल्का सा अंधेरा होने लगा था। हवाई अड्डे से देहरादून 30 किलोमीटर के सफर के लिए मुश्किल से 40-मिनिट लगता है किन्तु हमे दो घंटे हो गए देहारादून की जगह हम ऋषिकेश पहुँच गए तब कारचालक की नीयत पर शक होने पर मैंने तत्काल आयोजको को इसकी जानकारी दी तब उन्होने ड्राइवर को बुरी तरह डपट लगाई ओर कहा तुम्हारा भुगतान हम करेंगे, बेबजह बिल बनाने के चक्कर में तुम हमारे अतिथि को धोखा दे रहे हो, फिर क्या था कारचालक ने माफी मांगते हुये उसकी शिकायत न करने का कहकर रात साढ़े नौ बजे हमें देहारादून अपने गंतव्य तक पहुचाया जहा से हम अपनी उपस्थिती की सूचना देकर अपने कमरे की ओर प्रस्थान कर गए । चार दिवसीय कार्यशाला के समापन के पश्चात पाँच बसों में देशभर से आए पत्रकारों व उनके परिवारों ने दो दिवसीय बद्रीनाथ की यात्रा पूर्ण कर अपने अपने घरो की वापसी की।