ईमानदारी के सरकारी विज्ञापन

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कस्बे के सबसे पुराने सरकारी बैंक की मुख्य शाखा के भूमिगत तल में बने लॉकर रूम के बाहर लोहे की एक जंग लगी चाबी पिछले अठारह सालों से दीवार की खूंटी पर टँगी हुई थी क्योंकि सरकारी विभागों में चाबियाँ गुम हो जाती हैं पर जिम्मेदारियाँ कभी खूंटी से नीचे नहीं उतरतीं। उस चाबी की चमक वक्त की गर्द के नीचे पूरी तरह दब चुकी थी और उसका सिरा इतना घिस चुका था कि उस पर खुदा हुआ नंबर भी ठीक से पढ़ा नहीं जाता था ठीक वैसे ही जैसे ईमानदारी के सरकारी विज्ञापन में छपे शब्द धुंधले हो जाते हैं। उसी लॉकर रूम के भारी जालीदार लोहे के दरवाजे के ठीक सामने रखी लकड़ी की पुरानी बेंच पर हर महीने की पहली तारीख को रामचरण बाबू आकर बैठ जाते थे क्योंकि भारत में रिटायरमेंट के बाद केवल बेंच और स्मृतियाँ ही मुफ्त उपलब्ध होती हैं। सफेद खद्दर का धोती कुर्ता पहने और आँखों पर मोटा गोल चश्मा चढ़ाए रामचरण बाबू दिन भर उस खूंटी पर टँगी चाबी को एकटक निहारते रहते थे मानो वह चाबी न होकर स्वर्ग की सदस्यता का एकमात्र टोकन हो। बैंक में सुबह दस बजते ही किसानों के कर्जे जमा करने और पासबुक में एंट्री कराने वालों की भारी गहमागहमी शुरू हो जाती थी जो दरअसल यह प्रमाणित करने आते थे कि वे अभी भी कागजों पर जीवित और कर्जदार हैं। रामचरण बाबू को इस दुनियावी लेन देन से कोई सरोकार नहीं रहता था क्योंकि जो व्यक्ति मोहमाया त्याग दे वह या तो सन्यासी होता है या बैंक का पुराना पेंशनभोगी। जब भी कोई नया कैशियर अपनी फाइलों का पुलिंदा लेकर उधर से गुजरता तो वह इस बुजुर्ग को उस जंग लगी चाबी को टकटकी लगाकर देखते हुए पाकर अचरज में पड़ जाता था जैसे किसी आधुनिक मॉल में कोई पुराना मिट्टी का दीया जलता देख लिया हो। बैंक का पुराना चपरासी मंगतू जब भी साहब के केबिन में पानी की सुराही रखकर लौटता तो रामचरण बाबू बहुत ही सहेज कर पूछते कि क्यों रे मंगतू आज उस कोने वाले तिहत्तर नंबर लॉकर को खोलने का कोई हुक्म हुआ क्या या आज भी सिर्फ रजिस्टर पर तारीख ही बदली गई है। मंगतू बस अपनी नजरें झुका लेता क्योंकि सत्य बोलने से सरकारी नौकरी खतरे में पड़ जाती है और चुप रहने से कम से कम स्वाभिमान सुरक्षित रहता है।
बैंक में हाल ही में शहर के बड़े कॉरपोरेट दफ्तर से स्थानांतरित होकर आए नए शाखा प्रबंधक अभिनव त्रिवेदी बहुत ही कड़क और बैंकिंग नियमों के पक्के अफसर थे जो नियमों को गीता से ज्यादा पवित्र मानते थे बशर्ते वे नियम दूसरों पर लागू हों। अभिनव साहब को बैंक परिसर में किसी भी तरह की फालतू भीड़ या बिना काम के बैठे रहने वाले लोग बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं होते थे क्योंकि अनुशासन का मतलब अक्सर दूसरों की सुविधा का गला घोंटना होता है। जब उन्होंने लगातार चार महीनों तक हर पहली तारीख को रामचरण बाबू को उसी पुरानी बेंच पर चुपचाप बैठा देखा तो उनका प्रशासनिक माथा ठनक गया क्योंकि दफ्तरों में मुफ्त की हवा खाने का अधिकार सिर्फ पंखों को होता है। अभिनव साहब जब भी अपने वातानुकूलित केबिन से बाहर निकलकर लॉकर रूम का मुआयना करने आते तो उनकी नजर सबसे पहले उसी बूढ़े चेहरे पर जाकर टिक जाती थी जिसकी आँखों में एक अनजानी सी प्यास तैरती रहती थी मानो वे बैंक में कैश नहीं बल्कि खोई हुई आत्मा तलाश रहे हों। एक दिन दोपहर के वक्त जब बैंक का पब्लिक काउंटर बंद हुआ और दफ्तर में वह सन्नाटा पसरा जो केवल लंच ब्रेक और घूस की बातचीत के समय होता है तब अभिनव साहब सीधे रामचरण बाबू के पास पहुँच गए। अभिनव साहब ने अपनी रौबदार आवाज में बहुत ही तल्ख लहजे में पूछा कि काका आप हर महीने यहाँ आकर सरकारी दफ्तर का समय क्यों बर्बाद करते हैं अगर आपके लॉकर का कोई किराया बाकी है तो उसे तुरंत जमा कीजिए वरना कानून अपना काम करेगा और कानून का काम अक्सर गरीबों को बेघर करना ही होता है।
रामचरण बाबू ने अपने कांपते हाथों को बहुत ही आदर के साथ जोड़ा और अपने चेहरे पर एक हल्की सी कड़वी मुस्कान लाते हुए बोले कि मैनेजर साहब मैं यहाँ किसी सुरक्षा में सेंध लगाने नहीं आता क्योंकि इस बैंक में चुराने लायक अब सिर्फ फाइलें बची हैं। उन्होंने कहा कि मैं तो बस उस दिन की राह देख रहा हूँ जब इस लोहे की चाबी को अपनी मंजिल मिलेगी और इस बंजर दफ्तर में मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी कमाई की गवाही दर्ज होगी जो शायद ऑडिट रिपोर्ट से ज्यादा विश्वसनीय होगी। अभिनव साहब ने चिढ़कर उस खूंटी पर लटकी चाबी की तरफ इशारा किया और बोले कि काका यह तो किसी कबाड़ हो चुके पुराने ताले की जंग लगी चाबी है जिसमें कौन सी कमाई दर्ज हो सकती है क्योंकि बैंक में कमाई का मतलब सिर्फ ब्याज होता है जज्बात नहीं। पास ही काउंटर पर खड़े वयोवृद्ध एकाउंटेंट दीनानाथ जी जो पिछले तीस सालों से उसी बैंक में फाइलों के बीच अपनी जवानी दफन कर चुके थे वे तुरंत आगे बढ़े और बोले कि मैनेजर साहब काका की बात को यूँ ही हवा में मत उड़ाइए क्योंकि इस कस्बे में बैंक की यह नई इमारत बनने से पहले काका के इकलौते बेटे देवव्रत ने यहाँ एक ऐसा कीर्तिमान रचा था जिसे कोई कंप्यूटर रिकॉर्ड नहीं कर सकता। अभिनव साहब ने हैरान होकर पूछा कि देवव्रत ने ऐसा क्या किया था क्योंकि आधुनिक युग में कीर्तिमान केवल घोटाले ही होते हैं। दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा कि साहब देवव्रत पूरे जिले का सबसे होनहार छात्र था जिसने अपनी पढ़ाई के लिए काका की पूरी पुश्तैनी जमीन उस बैंक के नाम कर दी थी जो जमीन से ज्यादा कागजों को प्यार करता है।
रामचरण बाबू ने दीनानाथ जी की बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी कांपती उँगलियों से अपनी लाठी को कसकर पकड़ा और बहुत ही गर्व भरे लहजे में बोलना शुरू किया जो केवल उस व्यक्ति के पास होता है जिसका सब कुछ लुट चुका हो। उन्होंने कहा कि हाँ साहब मेरे देवव्रत ने मुझसे वादा किया था कि बापू तुम इस लॉकर की चाबी को कभी अपनी आँखों से ओझल मत होने देना क्योंकि यह चाबी हमारे आत्मसम्मान की रक्षा करेगी।read more:https://pahaltoday.com/woman-posing-as-a-bride-flees-after-administering-a-sedative-remains-at-large-even-after-a-month-and-a-half/जिस दिन मैं शहर से अपनी पहली बड़ी कामयाबी और इस बैंक का सारा कर्ज चुकाने का चेक लेकर आऊँगा उसी दिन हम दोनों मिलकर इस लॉकर को खोलेंगे और अपनी गरीबी की उस आखिरी निशानी को इस अंधेरे से आजाद कराएँगे जो शायद अब तक बैंक के भ्रष्टाचार से भी ज्यादा पुरानी हो गई है। अभिनव साहब ने अचरज से पूछा कि तो क्या अठारह सालों में देवव्रत वह कर्ज चुकाने नहीं आया क्या वह शहर जाकर इतना बड़ा अफसर बन गया कि अपने इस बूढ़े बाप और इस छोटे से कस्बे के बैंक को हमेशा के लिए भूल गया क्योंकि प्रगति अक्सर पुरानी यादों की बलि देकर ही आती है। काका की आँखों में आँसू छलक आए और उन्होंने अपने कुर्ते के छोर से अपनी पलकें पोंछते हुए कहा कि नहीं साहब मेरा बेटा कोई बेईमान या मतलबी इंसान नहीं था वह तो दिन रात मेहनत करके उस मुकाम तक पहुँचा है जहाँ आज बड़े बड़े उद्योगपति उसके आगे हाथ जोड़ते हैं ठीक वैसे ही जैसे चुनाव के समय नेता जनता के आगे जोड़ते हैं।मैनेजर अभिनव साहब तुरंत रिकॉर्ड रूम में पहुँचे और उन्होंने चपरासी मंगतू को उस अठारह साल पुराने लॉकर अलॉटमेंट रजिस्टर को तलाशने का हुक्म दिया क्योंकि सरकारी व्यवस्था में फाइलें मरती नहीं बस कोमा में चली जाती हैं। लगभग दो घंटे की कड़ी मशक्कत और धूल भरे बस्तों को खंगालने के बाद आखिरकार वह लाल कपड़े में बंधी पुरानी फाइल मिल गई जो इतिहास की तरह बदबू दे रही थी। जैसे ही अभिनव साहब ने उस फाइल के आखिरी पन्नों को खोला और उसमें लगे सरकारी दस्तावेजों को पढ़ा तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि सच अक्सर सरकारी फाइलों में ही कैद होता है। उस फाइल में एक बहुत ही चौंकाने वाला कानूनी दस्तावेज लगा था जिसमें लिखा था कि अठारह साल पहले ही देवव्रत ने शहर पहुँचकर अपनी पहली ही तनख्वाह से उस पूरे एजुकेशन लोन का एक एक पैसा ब्याज समेत चुकता कर दिया था क्योंकि ईमानदार लोग बैंक को कभी मुनाफा कमाने का मौका नहीं देते। अभिनव साहब ने जब उस फाइल के सबसे अंतिम पन्ने पर उस समय के क्षेत्रीय निदेशक के दस्तखत और पते को देखा तो उनका पूरा शरीर ठंडे पसीने से तर बतर हो गया क्योंकि वह पता उसी देवव्रत की बहुमंजिला आलीशान इमारत का था जो अब उसी बैंक का सबसे बड़ा शेयरधारक और मालिक बन चुका था।अभिनव साहब कांपते कदमों से दौड़ते हुए बाहर लॉकर रूम के पास पहुँचे जहाँ रामचरण बाबू अपनी लाठी के सहारे उस खूंटी पर टँगी जंग लगी चाबी को निहार रहे थे जो अब एक पवित्र अवशेष बन चुकी थी। अभिनव साहब ने बहुत ही रुँधे गले से काका के पैर छुए और बिलखते हुए बोले कि काका आप जिस देवव्रत के लौटने की राह देख रहे हैं उसने तो अठारह साल पहले ही अपनी पहली कमाई से इस बैंक का सारा कर्ज चुका दिया था और आज वह शहर का इतना बड़ा रईस बन चुका है कि हमारा पूरा बैंक उसी की उँगलियों के इशारे पर नाचता है। फिर आप अठारह सालों से इस जंग लगी चाबी के सामने बैठकर किसका मातम मना रहे हैं क्योंकि सफलता का अर्थ तो संबंधों की समाप्ति ही होता है। काका ने अपनी धुंधली आँखों से मैनेजर साहब को देखा और उनके चेहरे पर एक ऐसी दिल दहला देने वाली कड़वी मुस्कान तैर गई जिसने पूरी बैंकिंग व्यवस्था और आधुनिक समाज के मुँह पर तमाचा जड़ दिया। काका ने अपनी जेब से एक पुराना मुड़ा हुआ कागज निकाला और रोते हुए बोले कि मैनेजर साहब मुझे सब पता था कि देवव्रत ने कर्ज चुका दिया था और वह बहुत बड़ा रईस बन चुका है क्योंकि रईस होने की पहली शर्त ही अपनों को भूलना है।अभिनव साहब ने स्तब्ध होकर पूछा कि तो फिर काका आप इस लॉकर को खोलते क्यों नहीं। काका ने बिलखते हुए भरे गले से कहा कि अठारह साल पहले जब उसने इस लॉकर में अपनी उस फटी हुई स्कूल की वर्दी और मेरी गिरवी रखी पगड़ी को बंद किया था तो उसने मुझसे कहा था कि वह अपनी जड़ों को कभी नहीं भूलेगा पर शहर जाकर वह इतना संवेदनहीन और सफल हो गया कि उसने मुझे इसी बैंक के पते पर अपने वकील का यह नोटिस भेज दिया कि अगर मैं कभी उसके नए बंगले की तरफ गया तो वह मुझे पुलिस से पकड़वा देगा क्योंकि गरीबी अब उसके प्रोफाइल के लिए एक खतरा थी। काका ने उस जंग लगी चाबी की तरफ देखते हुए कहा कि मैं अठारह सालों से यहाँ किसी बेटे का इंतजार नहीं कर रहा बल्कि रोज यहाँ आकर यह देखने आता हूँ कि क्या इंसानियत की तिजोरी में उस पगड़ी का मोल आज भी बचा है या वह भी इस लोहे की तरह पूरी तरह जंग खा चुकी है क्योंकि आज के दौर में पगड़ी से ज्यादा कीमती तो बैंक का सिक्योरिटी गार्ड होता है। अभिनव साहब सुन्न होकर उस खूंटी को ताकते रह गए और पूरा बैंक परिसर उस बेबस बाप के आंसुओं के सन्नाटे में डूब गया जहाँ केवल फाइलों के सरसराने की आवाज थी जो बता रही थी कि रिश्ते भले ही जंग खा जाएं पर बैंक का ब्याज कभी नहीं रुकता।

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