केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह उस स्वप्न की सुबह है, जिसके लिए असंख्य भारतवासियों ने अपनी जवानी, अपने सुख, अपना घर-परिवार और अंततः अपना जीवन तक राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया। यह वह दिन है जब तिरंगा केवल आकाश में नहीं लहराता, बल्कि इतिहास के उन पन्नों को भी खोलता है, जिन पर हमारे रणबांकुरों ने अपने रक्त से स्वतंत्रता की इबारत लिखी थी।आज जब हम स्वतंत्रता की खुली हवा में सांस लेते हैं, तब शायद यह भूल जाना आसान है कि इस हवा की कीमत क्या थी। किसी ने फांसी का फंदा चूमा, किसी ने जेल की काल कोठरी में वर्षों बिताए, किसी ने अंग्रेजी हुकूमत की गोलियां अपने सीने पर झेलीं और किसी ने अपना सर्वस्व छोड़कर क्रांति की मशाल थाम ली। आजादी किसी एक नेता, एक दल या एक आंदोलन की देन नहीं थी; यह करोड़ों भारतीयों के त्याग, तपस्या और अदम्य संकल्प का सामूहिक परिणाम थी।पूर्वांचल की धरती इस बलिदानी गाथा में विशेष स्थान रखती है। गंगा-जमुनी संस्कृति की इस माटी ने ऐसे अनेक सपूत पैदा किए, जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिलाने में अपनी भूमिका निभाई। जौनपुर भी इस संघर्ष से अछूता नहीं रहा। यहां की गलियों, गांवों और कस्बों में स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना ने लोगों को आंदोलित किया। असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक पूर्वांचल के सामान्य नागरिकों ने भी अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने में पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।पूर्वांचल की धरती के महान क्रांतिकारियों में चंद्रशेखर आजाद का नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है। भले ही उनका प्रमुख कर्मक्षेत्र अलग-अलग स्थानों पर रहा, लेकिन उनकी क्रांतिकारी चेतना ने पूरे उत्तर भारत के युवाओं को झकझोरा। उनका वह अडिग आत्मविश्वास—कि अंग्रेज उन्हें जीवित नहीं पकड़ सकते—आज भी स्वतंत्रता के अर्थ को परिभाषित करता है। इसी क्षेत्र से जुड़े राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी कविता और क्रांति दोनों से युवाओं में राष्ट्रभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की। उनका जीवन बताता है कि कलम और क्रांति, दोनों जब राष्ट्र के लिए समर्पित हों तो इतिहास की दिशा बदल सकते हैं।पूर्वांचल की वीरांगना ऊदा देवी का स्मरण भी स्वतंत्रता संग्राम की उस अदम्य स्त्री-शक्ति की याद दिलाता है, जिसने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।read more:https://pahaltoday.com/jan-adhikar-party-demands-caste-census-and-other-measures/वहीं बाबू अमर सिंह, मंगल पांडेय और अनेक अनाम-अपरिचित सेनानियों ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजाओं और बड़े नेताओं का आंदोलन नहीं था; इसमें खेतों में हल चलाने वाला किसान, मजदूर, विद्यार्थी, साधु, व्यापारी और सामान्य गृहस्थ भी समान रूप से सहभागी था।जौनपुर की धरती का इतिहास भी इस राष्ट्रीय जागरण से गहराई से जुड़ा रहा। यहां के स्वतंत्रता सेनानियों और आंदोलनकारियों ने सत्याग्रह, बहिष्कार, जनजागरण और आंदोलनों के माध्यम से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध वातावरण तैयार किया। श्री कृष्ण दत्त पालीवाल जैसे पूर्वांचल के राष्ट्रवादी नेताओं ने पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। जौनपुर और आसपास के क्षेत्रों में कांग्रेस के आंदोलनों से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं, सत्याग्रहियों और युवाओं ने जेल यात्राएं कीं और ब्रिटिश सत्ता के दमन का सामना किया।लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिनके बलिदान पर राष्ट्र खड़ा हुआ, उनमें से अधिकांश के नाम धीरे-धीरे हमारी सामूहिक स्मृति से धुंधले पड़ते जा रहे हैं। हम कुछ बड़े नामों को तो जानते हैं, पर उन हजारों-लाखों लोगों को भूलते जा रहे हैं जिनकी कुर्बानियों के बिना आजादी की कहानी अधूरी है।इसलिए 15 अगस्त का उत्सव केवल ध्वजारोहण, राष्ट्रगान और मिठाई बांटने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का भी दिन होना चाहिए। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि जिन लोगों ने स्वतंत्र भारत का सपना देखा था, क्या आज का भारत उनकी कल्पनाओं के अनुरूप बन पाया है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति है, या गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, अन्याय, भेदभाव और अवसरों की असमानता से मुक्ति भी उसका हिस्सा है?आजादी के रणबांकुरों ने हमें केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं दी; उन्होंने हमें यह जिम्मेदारी भी सौंपी कि हम लोकतंत्र, संविधान और राष्ट्र की गरिमा की रक्षा करें। उनके सपनों का भारत वही होगा, जहां नागरिक को सम्मान मिले, युवा को अवसर मिले, किसान को अपने श्रम का उचित मूल्य मिले, गरीब को न्याय मिले और शिक्षा तथा स्वास्थ्य हर व्यक्ति की पहुंच में हों।आज जब तिरंगा हवा में लहराता है तो उसकी हर फड़फड़ाहट में भगत सिंह की निर्भीकता, चंद्रशेखर आजाद का स्वाभिमान, बिस्मिल की कविता, गांधी का सत्य, सुभाष का संकल्प और उन अनगिनत अनाम सेनानियों की आहट सुनाई देती है।जौनपुर की माटी से लेकर गंगा के कछार तक, पूर्वांचल की हवाओं में आज भी उन बलिदानियों की स्मृतियां बसी हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम उन्हें इतिहास की किताबों में बंद न रखें, बल्कि अपने वर्तमान के आचरण में जीवित रखें।इस 15 अगस्त पर तिरंगे को सलाम करते हुए आइए उन रणबांकुरों को भी नमन करें, जिन्होंने अपने आज को हमारे कल के लिए कुर्बान कर दिया। क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता—राष्ट्र उन स्मृतियों, संकल्पों और बलिदानों से बनता है जिन्हें पीढ़ियां अपने हृदय में संजोकर आगे बढ़ाती हैं।आजादी हमें विरासत में मिली है, लेकिन उसकी गरिमा बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।
डॉ सुनील कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर।