आलेख – राष्ट्र का वह ऋषि, जिसने विचारों को तिरंगे में बदल दिया

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राष्ट्र केवल सीमाओं, शासन या संविधान से नहीं बनते; वे उन प्रतीकों से गढ़े जाते हैं जिनमें करोड़ों लोगों की साझा स्मृतियाँ, आकांक्षाएँ और विश्वास बसते हैं। इतिहासकारों के अनुसार राष्ट्र की आत्मा उसके साझा प्रतीकों में झलकती है। इतिहासकार बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को “कल्पित समुदाय” कहा—ऐसा समुदाय, जिसके अधिकांश लोग कभी एक-दूसरे से नहीं मिलते, फिर भी एक परिवार का हिस्सा मानते हैं। इस अदृश्य भाव को मूर्त रूप राष्ट्रीय ध्वज देता है। भारत को यह पहचान तिरंगे ने दी, किंतु उसे आकार देने वाले पिंगली वेंकैया लंबे समय तक राष्ट्रीय स्मृति के हाशिए पर रहे। 2 अगस्त केवल उनकी जयंती नहीं, बल्कि उस मनीषा को स्मरण करने का अवसर है जिसने भारत की राष्ट्रीय चेतना को तिरंगे में साकार किया।पिंगली वेंकैया का जीवन सिद्ध करता है कि असाधारण योगदान सत्ता के केंद्रों से नहीं, जिज्ञासा और समर्पण से जन्म लेते हैं। 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम के निकट भटलापेनुमरु में जन्मे वेंकैया भाषाओं के अध्येता, भूविज्ञान के विद्यार्थी और कृषि विज्ञान के शोधकर्ता थे। युवावस्था में ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ वे दक्षिण अफ्रीका पहुँचे, जहाँ महात्मा गांधी से हुई भेंट ने उनके चिंतन को नई दिशा दी। उन्होंने समझा कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि ऐसे राष्ट्रीय प्रतीकों पर भी टिकी है, जिनमें पूरा राष्ट्र स्वयं को पहचान सके। यही उनका जीवन-ध्येय बना। उन्होंने व्यक्तिगत उपलब्धियों से अधिक उस राष्ट्रीय पहचान को महत्व दिया, जो पीढ़ियों को एक सूत्र में बाँध सके।वेंकैया की सबसे बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने ध्वज का निर्माण भावनाओं से नहीं, गहन अध्ययन से किया। दो दशकों तक उन्होंने अनेक देशों के ध्वजों का तुलनात्मक अध्ययन कर समझा कि रंग, आकार और प्रतीक राष्ट्रीय चरित्र के वाहक कैसे बनते हैं। 1916 में प्रकाशित “ए नेशनल फ्लैग फ़ॉर इंडिया” उनके इसी शोध का दस्तावेज़ थी। यह केवल ध्वज का प्रारूप नहीं, भारतीय ध्वज की वैचारिक रूपरेखा थी। प्रारंभ में लाल और हरे रंग सामाजिक समरसता के प्रतीक थे। महात्मा गांधी के सुझाव पर सफेद रंग और चरखा जुड़े, जिससे सत्य, शांति, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता तिरंगे के मूल मूल्य बने। यही सिद्ध करता है कि राष्ट्रीय प्रतीक किसी एक व्यक्ति की कल्पना नहीं, सामूहिक मंथन और समय की आवश्यकताओं से आकार लेते हैं।1921 में विजयवाड़ा में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में वेंकैया ने अपना ध्वज-प्रारूप गांधीजी के सामने प्रस्तुत किया। वह कपड़े का टुकड़ा नहीं, स्वतंत्र भारत की भावी पहचान था। बाद में चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के सारनाथ स्तंभ से प्रेरित धर्मचक्र अपनाया गया। 24 तीलियों वाला धर्मचक्र गति, न्याय, कर्तव्य, संतुलन और निरंतर प्रगति की भारतीय जीवन-दृष्टि का प्रतीक है। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने संशोधित तिरंगे को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया। उस दिन केवल ध्वज नहीं, भारत की बहुलता, लोकतांत्रिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता भी स्वीकृत हुई। तभी से तिरंगा केवल स्वतंत्रता का प्रतीक नहीं, भारतीय सभ्यता के आत्मविश्वास का उद्घोष बन गया।15 अगस्त 1947 को जब तिरंगा स्वतंत्र भारत के आकाश में लहराया, तब करोड़ों लोगों ने उसमें अपनी आशाओं का भविष्य देखा। किंतु उस क्षण के पीछे खड़े पिंगली वेंकैया का जीवन किसी विजेता का नहीं, कर्मयोगी का रहा। यह विडंबना केवल भारत की नहीं। इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने लिखा है कि राष्ट्र अपने प्रतीकों को सहेज लेते हैं, पर उन्हें गढ़ने वाले व्यक्तित्व स्मृति से ओझल हो जाते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/meritorious-students-honored-at-klgm-inter-college-incentive-amount-of-%e2%82%b961000-distributed/वेंकैया भी इसी विडंबना के शिकार बने। अंतिम वर्षों में उन्हें सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली, जिसके वे अधिकारी थे। 1963 में उनका निधन हुआ, किंतु बाद में देश ने जाना कि तिरंगे के पीछे एक ऐसा साधक था, जिसने अपना सर्वस्व भारत को समर्पित किया, बदले में कुछ नहीं माँगा।किसी भी राष्ट्र की परिपक्वता का माप उसके स्मारकों या उत्सवों से नहीं, बल्कि गुमनाम निर्माताओं की स्मृति से होता है। हम ध्वज को सलामी देते हैं, राष्ट्रगान पर खड़े होते हैं और राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं, किंतु इन प्रतीकों के सर्जकों को कम जानते हैं। यह विस्मृति केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं, इतिहास-बोध का अभाव है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक विमर्श में पिंगली वेंकैया को तथ्य नहीं, प्रेरणा के रूप में स्थान मिलना चाहिए। जब युवा जानेंगे कि एक बहुभाषी, शोधप्रिय और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न भारतीय ने दीर्घ अध्ययन के बाद तिरंगे की परिकल्पना की, तब वे समझेंगे कि राष्ट्र निर्माण केवल रणभूमि में नहीं, विचार, शोध और सृजन में भी होता है।तिरंगे की सबसे बड़ी शक्ति उसके रंगों में नहीं, बल्कि उनसे जुड़े मूल्यों में है। केसरिया त्याग और निर्भीकता, श्वेत सत्य, संतुलन और पारदर्शिता, हरा जीवन, विश्वास और समृद्धि का प्रतीक है; जबकि अशोक चक्र बताता है कि ठहराव किसी सभ्यता का स्वभाव नहीं हो सकता। भारतीय दर्शन में धम्मचक्र केवल गति नहीं, बल्कि न्याय, कर्तव्य और मानवीय मूल्यों से संचालित नैतिक गति का प्रतीक है। इसलिए तिरंगे का सम्मान केवल उसे फहराने में नहीं, बल्कि उन आदर्शों को जीवन और सार्वजनिक आचरण में उतारने में है, जिनका वह मौन संदेश देता है।पिंगली वेंकैया की जयंती केवल एक महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि यह पूछने का समय भी है कि क्या हमने अपने इतिहास के मौन शिल्पियों को उनका उचित स्थान दिया है। तिरंगा विश्व के हर मंच पर भारत की पहचान है, पर उसकी वास्तविक शक्ति विविध भाषाओं, संस्कृतियों, आस्थाओं और परंपराओं को एक सूत्र में बाँधने में है। यही वेंकैया की सबसे बड़ी देन है। उन्होंने केवल ध्वज नहीं गढ़ा, भारतीयता को दृश्य रूप दिया। जब भी तिरंगा आकाश में लहराए, हमारी स्मृति उसके रंगों के साथ उस साधक तक भी पहुँचे, जिसने अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत को समर्पित कर दी। राष्ट्रों की आत्मा ऐसे ही मौन योगदानों पर टिकी होती है; इसलिए इतिहास उन्हें कभी विस्मृत नहीं करता।

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