इमाम हुसैन की शहादत की याद में निकाले जाते हैं ताजिये, मुहर्रम की दसवीं तारीख को होता है दफन

Share
गाजीपुर जमानियां। मुहर्रम के महीने में निकाले जाने वाले ताजियों की परंपरा और उसके ऐतिहासिक महत्व को लेकर शाही जामा मस्जिद के सेकेट्री मौलाना तनवीर रजा ने विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत में ताजियादारी की शुरुआत 14वीं शताब्दी के अंत में तुर्क-मंगोल शासक तैमूर लंग द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि वर्ष 1398 ईस्वी में भारत आने के बाद तैमूर दिल्ली में ठहरा था। उसी दौरान वह बीमार होने के कारण इराक स्थित कर्बला नहीं जा सका, जहां हजरत इमाम हुसैन का पवित्र रौजा मौजूद है। ऐसे में उसने भारत में ही इमाम हुसैन की शहादत की याद में बांस और रंगीन कागजों से प्रतीकात्मक मकबरे के रूप में पहला ताजिया बनवाया। मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसकी 10वीं तारीख यानी यौमे आशुरा को कर्बला की जंग हुई थी। इसी युद्ध में पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने जालिम शासक यजीद की बैअत स्वीकार करने के बजाय अपने परिवार और साथियों के साथ हक, इंसाफ और इंसानियत की रक्षा के लिए शहादत दी थी।read more:https://pahaltoday.com/luxury-mansions-growing-assets-and-questions-of-accountability/ उनकी इसी कुर्बानी की याद में दुनिया भर में मुहर्रम मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि इराक के कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के मकबरे की खूबसूरत और कलात्मक प्रतिकृति को ताजिया कहा जाता है। ताजिया शब्द की उत्पत्ति ‘अज़ा’ शब्द से मानी जाती है, जिसका अर्थ शोक या मातम मनाना होता है। ताजिया निर्माण में बांस, रंग-बिरंगे कागज, कपड़े और सजावटी सामग्री का उपयोग किया जाता है। मौलाना रजा ने बताया कि 18वीं और 19वीं शताब्दी में अवध के नवाबों, विशेषकर लखनऊ में शिया शासकों ने ताजियादारी की परंपरा को विशेष संरक्षण और भव्यता प्रदान की। इसके बाद यह परंपरा पूरे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में लोकप्रिय होती चली गई। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर हिंदू समुदाय के लोग भी मन्नत पूरी होने पर ‘मन्नती ताजिया’ बनवाते हैं, जो गंगा-जमुनी तहजीब और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। उन्होंने बताया कि मुहर्रम के पहले चांद से ही शोक का सिलसिला शुरू हो जाता है। छह मुहर्रम को घोड़ा दुलदुल के साथ रात्रि भर नौहा पढ़ा जाता है और लोगों को शरबत पिलाया जाता है। मुहर्रम के दस दिनों तक युवा लाठी और अन्य पारंपरिक करतब दिखाते हुए “या हुसैन” और “या इमाम” की सदाएं बुलंद करते हैं। दसवीं मुहर्रम यानी आशुरा के दिन सभी ताजियों को इमाम चौक से उठाकर कर्बला ले जाया जाता है, जहां उन्हें दफन किया जाता है। इस प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में “ताजिया ठंडा करना” भी कहा जाता है। इस अवसर पर अमन शांति एकता कमेटी के सरपरस्त नेसार खान वारसी, असलम पान वाले, माहिर कमाल अंसारी और खालिद अंसारी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *