झारखंड में सामाजिक सुधार और महिलाओं की स्थिति

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डॉ पंखुड़ी

झारखंड सन 2000 में बिहार राज्य से पृथक होकर एक स्वतंत्र राज्य बना, आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और सामाजिक विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। किंतु इस समृद्धि के बावजूद यहाँ की महिलाएँ खासकर आदिवासी और दलित समुदाय में शैक्षिक पिछड़ेपन, सामाजिक भेदभाव और आर्थिक असमानता की शिकार हैं। झारखंड में महिला सशक्तिकरण तभी संभव है जब शिक्षा को सामाजिक सुधार की व्यापक सरकारी नीतियों के साथ जोड़ा जाए।झारखंड भारत के उन राज्यों में से एक है जहाँ जनजातीय जनसंख्या लगभग 27 प्रतिशत है। जिनमें संथाल, मुंडा, उराँव, हो और खड़िया जैसी प्रमुख जनजातियाँ अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान रखती हैं। किंतु ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों की महिलाएँ शिक्षा से वंचित रही हैं। औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के पश्चात् तक, उनकी शैक्षिक और सामाजिक स्थिति में सुधार की गति अत्यंत धीमी रही है।शिक्षा को सदैव सामाजिक परिवर्तन के सबसे शक्तिशाली साधनों में से एक माना गया है। झारखंड राज्य गठन के बाद से सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों ने महिला शिक्षा में कुछ सुधार लाए हैं, परंतु समग्र सशक्तिकरण अभी भी एक लंबी यात्रा है।झारखंड में औपचारिक शिक्षा का प्रारंभ मुख्यतः ईसाई मिशनरियों के प्रयासों से हुआ। 19वीं शताब्दी में जर्मन गोस्पेल मिशन (1845) और कैथोलिक ईसाइयों छोटा नागपुर क्षेत्र में विद्यालयों की स्थापना की। इन मिशनरी स्कूलों ने न केवल साक्षरता का प्रसार किया, बल्कि आदिवासी भाषाओं को लिपिबद्ध करने और स्थानीय संस्कृति को संरक्षित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।मिशनरी शिक्षा का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि उसने लड़कियों के लिए भी विद्यालय खोले। यद्यपि इसके पीछे धर्मांतरण का उद्देश्य भी था, तथापि इसने आदिवासी महिलाओं को पहली बार औपचारिक शिक्षा से जोड़ा। मिशन स्कूलों की बालिकाओं ने आगे चलकर शिक्षिका, नर्स और समाजसेविका के रूप में अपनी भूमिका निभाई।पृथक राज्य झारखंड के लिए होने वाले आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भूमिका रही। फूलो-झानो मुर्मू, जो संथाल महिलाओं की प्रतीक हैं, और अन्य अनाम आदिवासी महिलाओं ने रैलियों, धरनों और जन-जागरण अभियानों में भाग लिया। इस आंदोलन ने महिलाओं को राजनीतिक चेतना से जोड़ा और उन्हें यह अहसास दिलाया कि वे केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं।झारखंड में स्वयं सहायता समूहों ने महिला सशक्तिकरण में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। झारखंड राज्य लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी के अंतर्गत लाखों महिलाएँ जुड़ी हैं। ये समूह केवल बचत और ऋण तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्होंने महिलाओं को नेतृत्व, संचार और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान की है।सखी मंडल कार्यक्रम के तहत झारखंड में 2.5 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह कार्यरत हैं जिनमें करोड़ों महिलाएँ जुड़ी हैं। इस कार्यक्रम ने ग्रामीण महिलाओं को न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी सशक्त बनाया है।2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड की महिला साक्षरता दर 56.2 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय औसत 65.5 प्रतिशत से काफी कम है। अनुसूचित जनजाति की महिलाओं में यह दर और भी कम; 49.7 प्रतिशत थी। हाल में आए अकड़ो के अनुसार महिलाओं की साक्षरता दर मुश्किल से 72 प्रतिशत तक पहुँची है। जो बेहद चिंताजनक है।केंद्र और राज्य सरकार की अनेक योजनाओं ने महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, मुख्यमंत्री सुकन्या योजना, और सावित्री बाई फुले किशोरी समृद्धि योजना जैसी पहलें झारखंड में महिला शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला रही है। इन योजनाओं के अंतर्गत छात्रवृत्तियाँ, साइकिल वितरण, और आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई है।झारखंड में महिला शिक्षा और सशक्तिकरण के मार्ग में अनेक बाधाएँ हैं। भौगोलिक दृष्टि से राज्य का एक बड़ा भाग वनाच्छादित और दुर्गम है, जहाँ विद्यालय पहुँचना कठिन है। सामाजिक दृष्टि से बाल विवाह की प्रथा लाभग 32 प्रतिशत है। आर्थिक दृष्टि से गरीबी के कारण परिवार लड़कियों को स्कूल भेजने के बजाय घरेलू कार्य या श्रम में लगाते हैं।read more:https://pahaltoday.com/the-b-v-sena-held-a-two-hour-silent-protest-against-the-deteriorating-power-supply/वही पलायन की समस्या भी गंभीर है। झारखंड से बड़ी संख्या में परिवार रोजगार के लिए पलायन करते हैं, जिससे बालिकाओं की शिक्षा बाधित होती है। इसके अतिरिक्त, मानव तस्करी एक गंभीर समस्या है जो विशेषतः आदिवासी बालिकाओं को प्रभावित करती है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विद्यालयों का अभाव और भय का वातावरण भी शिक्षा में रुकावट पैदा करता है।आजीविका संवर्धन हुनर अभियान जैसी पहल महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में ले जा रही हैं। शिक्षा, सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हैं। शिक्षा महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता देती है, सामाजिक सुधार सांस्कृतिक बाधाओं को तोड़ता है, और सशक्तिकरण महिलाओं को निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। झारखंड के संदर्भ में इस त्रिकोण की एक विशेषता यह है कि यहाँ सामुदायिक और जनजातीय पहचान भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।पारंपरिक आदिवासी ग्राम सभाओं में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है, परंतु शिक्षा के प्रसार के साथ यह बदल रहा है। पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण ने आदिवासी महिलाओं को स्थानीय शासन में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर दिया है, यद्यपि श्सरपंच पतिश् जैसी समस्याएँ अभी भी बनी हैं।झारखंड में शिक्षा, सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण की यात्रा एक जटिल किंतु आशाजनक कहानी है। ऐतिहासिक रूप से मिशनरी शिक्षा से आरंभ होकर, आदिवासी आंदोलनों से गुजरते हुए, समकालीन सरकारी योजनाओं और जन-आंदोलनों तक इस यात्रा में अनेक पड़ाव आए हैं। द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा सबसे बड़ा सामाजिक परिवर्तन है। समग्र सशक्तिकरण तभी संभव है जब शिक्षा को सामाजिक सुधार की व्यापक नीतियों के साथ समन्वित किया जाए। भूमि अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक स्वावलंबन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व यह सभी आयाम एक साथ सुदृढ़ होने चाहिए। झारखंड की आदिवासी महिला न केवल विकास की लाभार्थी है, बल्कि वह इस परिवर्तन की सबसे सशक्त वाहक भी है। वर्तमान सरकार महिलाओं के तरफ विशेष ध्यान देंगी तो निश्चित ही झारखंड में महिलाओं की स्थिति में अमूलचुल परिवर्तन आएगा।

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