नशा एक भीषण महामारी, इसे जड़ से खत्म करना होगा।

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नशा मानव जीवन की उन कमजोरियों में से एक है, जिसने युगों–युगों से व्यक्ति, परिवार और समाज को भीतर से क्षीण किया है। यह केवल आधुनिक समय की समस्या नहीं है, बल्कि इसके बीज पौराणिक काल तक फैले हुए दिखाई देते हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि भारतीय पौराणिक परंपरा ने नशे को कभी जीवन–मूल्य नहीं माना, बल्कि उसे पतन का कारण बताया और आत्मसंयम को श्रेष्ठ गुण के रूप में प्रतिष्ठित किया। पौराणिक काल में नशे का उल्लेख प्रतीकात्मक और सीमित रूप में मिलता है। देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त ‘सुरा’ और ‘सोम’ का प्रसंग प्रसिद्ध है। किंतु यह समझना आवश्यक है कि सोम कोई सामान्य नशीला पेय नहीं था, बल्कि वह यज्ञीय और औषधीय प्रयोजनों से जुड़ा दिव्य तत्व था, जिसका प्रयोग केवल विशेष अवसरों पर और संयमित रूप में होता था। इसके विपरीत, जब सुरा का प्रयोग असंयम और भोग के लिए हुआ, तो उसका परिणाम विनाशकारी सिद्ध हुआ। पुराणों में असुरों का पतन अक्सर उनकी भोगवादी प्रवृत्ति और मद्यपान से जोड़ा गया है, जो यह संकेत देता है कि नशा विवेक और मर्यादा के क्षय का कारण बनता है। महाभारत में यदुवंश का विनाश नशे के दुष्परिणामों का सबसे सशक्त उदाहरण है। द्वारका में यादवों के बीच मद्यपान से उत्पन्न उन्माद ने उन्हें आपस में ही विनाश की ओर धकेल दिया। यह प्रसंग स्पष्ट संदेश देता है कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे वंश और समाज को नष्ट कर सकता है। रामायण में भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन पूर्ण संयम और आत्मनियंत्रण का आदर्श है। वहाँ नशा कहीं भी आदर्श जीवन का अंग नहीं बनता, बल्कि त्याग, तप और संयम को ही श्रेष्ठ माना गया है। बौद्ध और जैन परंपराओं ने तो नशे के विरुद्ध और भी स्पष्ट रुख अपनाया। भगवान बुद्ध के पंचशील में नशा न करने की प्रतिज्ञा आत्मिक जागरण की अनिवार्य शर्त है। महावीर स्वामी ने इंद्रिय संयम को मोक्ष का द्वार बताया। इन सभी परंपराओं का मूल संदेश यही है कि नशा मनुष्य को उसके लक्ष्य से भटका देता है और आत्मविकास के मार्ग में बाधा बनता है। आज के समय में नशे की समस्या कहीं अधिक विकराल रूप ले चुकी है। शराब, तंबाकू, गुटखा, अफीम और सिंथेटिक ड्रग्स ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है, विशेषकर युवा पीढ़ी को। नशा आज केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि संगठित अपराध, बेरोजगारी, पारिवारिक विघटन और मानसिक रोगों का कारण बन चुका है। इसका प्रभाव राष्ट्र की उत्पादकता और सामाजिक ताने-बाने पर भी पड़ता है।read more:https://pahaltoday.com/smart-village-bharatpur-is-on-its-way-to-becoming-a-reality-the-dreams-of-the-displaced-are-taking-new-flight/नशे के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, सामाजिक चेतना का निर्माण करना होगा। पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया जा सकता है कि नशा सदैव पतन का कारण रहा है। शिक्षा संस्थानों में नैतिक शिक्षा, योग, ध्यान और जीवन–कौशल को अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि युवा तनाव से निपटने के लिए नशे का सहारा न लें।
दूसरे, परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संवादहीनता और भावनात्मक रिक्तता नशे की ओर पहला कदम होती है। यदि परिवार बच्चों को समय, स्नेह और सही मार्गदर्शन दे, तो नशे की संभावना स्वतः कम हो जाती है। तीसरे, शासन और समाज को मिलकर नशे के व्यापार पर कठोर नियंत्रण करना होगा। केवल कानून नहीं, बल्कि पुनर्वास और परामर्श केंद्रों का विस्तार भी आवश्यक है, ताकि नशे में फँसे व्यक्ति को अपराधी नहीं, रोगी समझकर उपचार दिया जा सके।अंततः, नशे के विरुद्ध संघर्ष एक निरंतर अभियान है, न कि एक बार का कार्यक्रम। पौराणिक काल से लेकर आज तक का अनुभव यही सिखाता है कि जहाँ संयम, विवेक और मूल्य रहे, वहाँ समाज फला-फूला; और जहाँ नशा जीवन–शैली बना, वहाँ विनाश अवश्यंभावी हुआ। आज आवश्यकता है कि हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों की ओर लौटते हुए नशा-मुक्त, स्वस्थ और सशक्त समाज के निर्माण का संकल्प लेना होगा।

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