धरोहर की जीवंत लिपि डाक्टर शुभदा पाण्डेय की पंक्तियों में प्रकृति और आस्था का समागम 

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संतकबीरनगर: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जन्मी और नागपुर विश्वविद्यालय से पीएचडी एवं एमइडी की शिक्षा प्राप्त प्रख्यात साहित्यकार चार बार की विश्व रिकार्ड होल्डर डाक्टर शुभदा पांडेय का व्यक्तित्व स्वतंत्रता सेनानी माता-पिता के आदर्शों से सिंचित है। 35 मौलिक पुस्तकों की लेखिका डॉ० पांडेय ने पिछले चार दशकों से अध्यापन, प्रशासन और शोध निर्देशन के क्षेत्र में मील के पत्थर स्थापित किए हैं। उनकी लेखनी में जहाँ एक ओर लोक परंपराओं का सम्मान झलकता है, वहीं दूसरी ओर मणिपुर के संगाई हिरणों जैसे दुर्लभ विषयों पर उनकी काव्य-दृष्टि उन्हें एक ‘अद्वितीय शिल्पकार’ के रूप में प्रतिष्ठित करती है। वर्तमान में उनकी साहित्यिक यात्रा और सांस्कृतिक योगदान नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रेरणा का एक अक्षय स्रोत बना हुआ है। प्रख्यात कवयित्री डाक्टर शुभदा पाण्डेय ने अपनी नवीनतम रचना ‘मैं इस लिपि को’ के माध्यम से मानवीय जिजीविषा और सांस्कृतिक विरासत को एक नई साहित्यिक ऊंचाई प्रदान की है। शबरी शिक्षा समाचार के ताज़ा अंक में प्रकाशित यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास की गाथा है जो पतझड़ के बाद वसंत के पुनरागमन की प्रतीक्षा करती है। कवयित्री ने प्रकृति के माध्यम से जीवन के दर्शन को उकेरा है, जहाँ शीर्ष तक सूख चुका वृक्ष भी अपना आत्म-विश्वास नहीं खोता। उनकी कल्पना में ‘हरियाली का हीमोग्लोबिन’ शिराओं में दौड़ने का रूपक न केवल नवीन है, बल्कि साहित्य में एक ताज़ा प्राणवायु का संचार करता है। यह कविता पाठक को एक ऐसे धरातल पर ले जाती है जहाँ धैर्य और आशा की लिपि हर मुश्किल परिस्थिति को मात देने का सामर्थ्य रखती है। उनकी पंक्तियाँ यह विश्वास दिलाती हैं कि भले ही परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों, लेकिन जीवन की शिराओं में उम्मीद का संचार कभी थमता नहीं है। यह रचना पाठक को उस ‘लिपि’ को पढ़ने के लिए आमंत्रित करती है, जो समय के उतार-चढ़ाव के बावजूद अपनी आस्था और अस्मिता को खोने नहीं देती।read more:https://khabarentertainment.in/awareness-program-in-composite-school-on-world-hand-hygiene-day/
     रचना के दूसरे भाग में शुभदा जी मालवा की समृद्ध विरासत और निमाड़ी माटी की सोंधी खुशबू को समाहित करती हैं। वे बिछुए से लेकर बिंदी तक के प्रतीकों के जरिए लोक संस्कृति को नमन करती हैं और नर्मदा के पवित्र जल में अपनी अटूट आस्था प्रकट करती हैं। कविता में ‘दधीचि’ का संदर्भ देकर उन्होंने त्याग की पराकाष्ठा और परोपकार की उस परंपरा को रेखांकित किया है, जो स्वयं को गलाकर भी दूसरों के जीवन में खुशियाँ बिखेरती है। विंध्य की हवाओं से त्याग और प्रसन्नता का प्रस्ताव ग्रहण करती यह कृति वास्तव में समय के शिलापट्ट पर उकेरी गई एक ऐसी लिपि है, जिसे केवल आँखों से नहीं बल्कि अंतर्मन से पढ़ा जा सकता है। यह रचना साहित्य प्रेमियों के लिए एक अनूठा उपहार है, जो परंपरा और आधुनिक चेतना का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है।

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