युवा भारत पर खतरा : डिग्री होने के बावजूद रोजगार नहीं

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स्नेहा सिंह 
भारत में कामकाज की स्थिति और रोजगार के बारे में हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है। दुनिया के सबसे अधिक युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत में युवाओं की संख्या अधिक है, लेकिन स्थिति थोड़ी चिंताजनक है। भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है और वे कार्य करने योग्य वर्ग में आते हैं, लेकिन जब उनकी वास्तविक स्थिति देखी जाती है, तो तस्वीर बिलकुल विपरीत दिखाई देती है। भारत में युवाओं की संख्या अधिक है, उनके पास डिग्री है, उनके पास कौशल है, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है। देश के युवाओं के शिक्षा, रोजगार और श्रम बाजार की वास्तविकता पर यह रिपोर्ट प्रकाश डालती है, जो भारत के लिए चिंताजनक है।
जानकारों के अनुसार भारत के युवा शिक्षित हैं, उनके पास कौशल है, लेकिन अवसर कम हैं। पिछले चार दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का स्तर बड़े पैमाने पर बढ़ा है। भारत में विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इसके कारण अब उच्च शिक्षा में नामांकन अनुपात 28 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसमें लड़कियों की भागीदारी भी बड़े पैमाने पर बढ़ी है। दूसरी ओर लड़कों के पंजीकरण में कमी देखी जा रही है। 2017 में लड़कों का कुल पंजीकरण 38 प्रतिशत था, जो 2024 में 34 प्रतिशत हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए नौकरी और रोजगार के अवसर खोजने पड़ते हैं और इसके कारण उच्च शिक्षा संभव नहीं हो पाती।read more:https://khabarentertainment.in/awareness-program-in-composite-school-on-world-hand-hygiene-day/
यह परिवर्तन दर्शाता है कि समाज ऐसे चरण से गुजर रहा है जहां पढ़ाई जरूरी है, लेकिन साथ ही परिवार चलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा अब समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंच गई है, लेकिन जब रोजगार के अवसरों की बात आती है, तो उनका स्तर बहुत कम है। हाल ही में आई रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि 20 से 29 वर्ष की आयु के 6.3 करोड़ स्नातक युवाओं में से लगभग 1.20 करोड़ युवा बेरोजगार हैं। भारत जैसे देश के लिए यह वास्तव में चिंताजनक और निराशाजनक स्थिति है। युवा वर्षों खर्च करके पढ़ाई करते हैं और फिर भी उन्हें रोजगार के अवसर नहीं मिलते। इसके कारण उन्हें अपने कौशल से कम स्तर की, कम वेतन वाली नौकरियां स्वीकार करनी पड़ती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर मिलने वाली नौकरियों में से केवल 7 प्रतिशत युवाओं को ही स्थाई वेतन वाली नौकरी मिलती है। एक समय कहा जाता था कि शिक्षा ही बेरोजगारी का समाधान है, लेकिन वर्तमान स्थिति कुछ अलग ही दिशा में जा रही है।भारत की वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो 15 से 25 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 40 प्रतिशत है, जबकि 25 से 29 वर्ष के युवाओं में लगभग 20 प्रतिशत बेरोजगारी है। जिनके पास रोजगार है, उन्हें भी उनके शिक्षा, योग्यता और अपेक्षित वेतन के अनुसार नौकरी नहीं मिलती। यह स्पष्ट करता है कि भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच का संबंध अत्यंत कमजोर है। डिग्री होने के बावजूद नौकरी न मिलने के कारण युवा निराशा की ओर बढ़ रहे हैं। उनमें असंतोष बढ़ रहा है। आज के युवाओं के सामने बेरोजगारी के साथ-साथ अधूरी रोजगार (Underemployment) भी एक बड़ी समस्या है। देश में बड़ी संख्या में ऐसे युवा काम कर रहे हैं, जिन्हें उनके अध्ययन और कौशल के अनुसार रोजगार नहीं मिला है। जानकारों का मानना है कि यह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि व्यक्तिगत क्षमताओं और राष्ट्रीय संसाधनों का भी नुकसान है। शिक्षा में किया गया निवेश यदि अपेक्षित उत्पादकता नहीं देता, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता।जानकारों का मानना है कि देश में केवल शिक्षा का विस्तार पर्याप्त नहीं है। इसके साथ शिक्षा की गुणवत्ता और उपयोगिता में भी सुधार होना चाहिए। यदि 2010 से 2021 के बीच के समय की बात करें, तो प्रति एक लाख युवाओं पर विश्वविद्यालयों की संख्या 29 से बढ़कर 45 हो गई है। आईटीआई जैसी संस्थाओं की संख्या में भी कई गुना वृद्धि हुई है। इसके बावजूद रोजगार के मामले में क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं। दूसरी ओर शिक्षकों की कमी भी गंभीर समस्या है। सरकारी और निजी कालेजों तथा स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात बहुत अधिक है। इसके बावजूद इन संस्थानों से निकलने वाले युवाओं के कौशल में अपेक्षित विकास नहीं हो पाता।यह स्थिति दर्शाती है कि आज भी हमारी शिक्षा प्रणाली केवल डिग्री तक सीमित है। यहां डिग्री पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि कौशल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता और इसके कारण रोजगार का सही सृजन नहीं हो पाता। दूसरी ओर गरीब परिवारों के युवा भी अब उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। वे किसी भी तरह उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। 2007 में उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों के युवाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 8 प्रतिशत था, जो 2017 में 15 प्रतिशत हो गया और अब इससे भी अधिक हो गया है। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उन्हें पर्याप्त रोजगार नहीं मिलता।भारत की अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव हो रहा है। युवा अब खेती छोड़कर सेवा क्षेत्र और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हो रहे हैं। आईटी, आटोमोबाइल और पेशेवर सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ रही है। पेशेवर क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों के बीच का अंतर कम हुआ है। लेकिन इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की गति बहुत धीमी है। एक ओर उच्च कौशल वाली नौकरियां कम हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर सामान्य कौशल वाली नौकरियों में वेतन कम और अस्थिरता अधिक है। इस असंतुलन के कारण युवाओं के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। वे अपने कौशल का सही उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें उचित वेतन भी नहीं मिलता।चिंताजनक बात यह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए केवल 2030 तक का समय है। इसके बाद कार्यशील युवाओं की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगेगी। वर्तमान में जो देश ‘युवा देश’ कहलाता है, उसमें परिवर्तन आने लगेगा। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले वर्षों में यदि पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं दिए गए और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो समस्या और गंभीर हो जाएगी। अगले पांच वर्षों में रोजगार सृजन की गति बढ़ानी होगी। बेरोजगारी और अधूरी रोजगार से असंतुष्ट युवा सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का कारण बन सकते हैं। बेरोजगारी केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट रोजगार और शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एक-दो क्षेत्रों में सुधार से स्थिति नहीं बदलेगी। इसके लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। सबसे पहले शिक्षा, उद्योग और रोजगार के बीच मजबूत समन्वय स्थापित करना होगा। शिक्षा, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों को वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार विकसित करना होगा। शिक्षा के साथ कौशल विकास को प्राथमिकता देनी होगी। प्रशिक्षण कार्यक्रमों की गुणवत्ता में सुधार करना होगा। शिक्षा के साथ रोजगार सृजन को भी सरकारी नीतियों के केंद्र में रखना होगा। केवल विकास दर बढ़ने से वास्तविक विकास नहीं होता। रोजगार आधारित विकास की दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके साथ उद्यमिता को भी बढ़ावा देना होगा। युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनाना होगा। उन्हें रोजगार सृजन के क्षेत्र में सक्रिय करना और दूसरों को प्रेरित करना आवश्यक है।  साथ ही क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताओं को कम करने के लिए नीतियां बनानी होंगी। भारत के युवाओं की वर्तमान स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट भी है।  सबसे पहले यह समझना होगा कि केवल डिग्री हासिल कर लेना ही शिक्षा नहीं है। इससे कौशल विकास होना या रोजगार मिलना सुनिश्चित नहीं होता। शिक्षा केवल रोजगार के लिए एक साधन और तैयारी है।  यदि इस तैयारी के बाद भी रोजगार नहीं मिलता, तो सामाजिक असंतोष और असंतुलन बढ़ेगा और युवाओं में निराशा फैल जाएगी।यदि शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को कम नहीं किया गया और पर्याप्त रोजगार सृजित नहीं किए गए, तो देश का सबसे बड़ा संसाधन उसके युवा ही उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएंगे।

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